नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
by देवर्षि नारद
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
Page 110 of 304
Read in contextगुप्त रूप से ऋण के लेन देन के साक्षी का साक्ष्य तीन वर्षों तक मान्य रहता
है, इस अवधि के उपरान्त उसका साक्ष्य महत्त्वहीन हो जाता है। उत्तर-साक्षी-
साक्षी के मुख से उच्चरित को उद्धृत करने वाले-के वचन की प्रामाणिकता एक
वर्ष के लिए है, अर्थात् यदि एक वर्ष के भीतर सुने-देखे का विवरण दिया जा रहा
है, तो ठीक है, परन्तु यदि सुने देखे को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है,
तो उसे नितान्त सत्य नहीं माना जा सकता।
अथवा कालनियमो न दृष्टः साक्षिणं प्रति।
स्मृत्यपेक्षं हि साक्षित्वमाहुः शास्त्रविदो जनाः ॥ 170 ॥
कतिपय शास्त्रकारों और विधिवेत्ताओं की यह भी मान्यता है कि साक्ष्य में
समय की सीमा को आड़े नहीं आने देना चाहिए। यदि साक्षी चरित्रवान् व सत्यनिष्ठ
है, उसके वचन शास्त्र सम्मत तथा तथ्यों पर आदृत हैं, तो काल की अवधि की
उपेक्षा करते हुए उसे यथोचित गौरव देना ही चाहिए।
अभिप्राय यह है सत्यनिष्ठ को महत्त्व देना चाहिए, समय-सीमा को गौण ही
मानना चाहिए।
यस्य नोपहता बुद्धिः स्मृतिः श्रोत्रं च साक्षिणः ।
सुदीर्घेणापि कालेन स साक्षी साक्ष्यमर्हति ॥ 171 ॥
जिस व्यक्ति की बुद्धि, स्मृति और श्रवणशक्ति अप्रतिहत है, जो सभी बातों
को ठीक ढंग से यथावत् समझता है, सही तौर पर देखता-सुनता है और जिसे
वर्षों-पूर्व घटित घटनाओं की यथावत् स्मृति है, जो कुछ भी नहीं भूला है, समग्रतः
जिसकी इन्द्रियां अविकल एवं अक्षुण्ण हैं, ऐसा व्यक्ति कितने भी पुराने मामले में
साक्ष्य दे सकता है। ऐसे व्यक्ति के साक्ष्य को समय-सीमा अमान्य नहीं बना
सकती।
असाक्षिप्रत्ययास्त्वन्ये षड्विवादाः प्रकीर्तिताः ।
लक्षणान्येव साक्षित्वे येषामाहुर्मनीषिणः ॥ 172 ॥
निम्नोक्त छह विवादों में किसी प्रकार के साक्ष्य की कोई आवश्यकता ही
नहीं। व्यक्ति के लक्षण (रंगे हाथों पकड़ा जाना) उसके अपराधी होने के प्रत्यक्ष
एवं प्रबल प्रमाण होते हैं। विद्वानों ने प्रत्यक्ष चिह्नों को ही साक्षी-रूप में स्वीकार
किया है।
उल्काहस्तोऽग्निदो ज्ञेयः शस्त्रपाणिस्तु धानकः ।
केशाकेशिगृहीतश्च युगपत्पारदारिकः ॥ 173 ॥
छह विवाद इस प्रकार हैं—
- हाथ में जलती हुई लकड़ी लिये पकड़ा जाने वाला निश्चित रूप से आग
लगाने वाला है।
108 / नारदस्मृति