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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

DevanagariHindipublished178 pages
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॥ श्रीहरिः ॥
विषय-सूची
विषय पृष्ठ-संख्या
प्रार्थना और निवेदन ........................................ ५
देवर्षि नारद ..................................................... १२
१-प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप .............................. २१
२-प्रेममें अनन्यता ............................................ ३०
३-प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण.......... ३८
४-प्रेमरूपा भक्ति फलरूपा है.......................... ५३
५-प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा .. ६०
६-प्रेमरूपा भक्तिमें प्रधान बाधा कुसंगति है ...... ८०
७-मायासे कौन तरता है .................................... ८५
८-प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप .... ९५
९-भक्तिकी सुलभता और महत्ता...................... १०५
१०-भक्तिके साधन और अन्तराय ...................... १०८
११-प्रेमी भक्तोंकी महिमा ................................. १२५
१२-वाद-विवादरूपी विघ्न ................................. १३६
१३-भक्तिके प्रधान सहायक ............................. १४०
१४-प्रेमा-भक्तिका फल और भक्तिकी
सर्वश्रेष्ठता .................................................... १६५
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इस पृष्ठ पर केवल भगवान श्रीकृष्ण (वेणुगोपाल/मुरलीधर) का रेखाचित्र (चित्र) दिया गया है।

इस पृष्ठ पर कोई श्लोक, सूत्र, अन्वय, अनुवाद अथवा व्याख्यात्मक पाठ (Text) उपलब्ध नहीं है।

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॥ श्रीहरिः ॥
प्रार्थना और निवेदन
नवजलधरवर्णं चम्पकोद्भासिकर्णं
विकसितनलिनास्यं विस्फुरन्मन्दहास्यम्।
कनकरुचिदुकूलं चारुबर्हावचूलं
कमपि निखिलसारं नौमि गोपीकुमारम्॥
मुखजितशरदिन्दुः केलिलावण्यसिन्धुः
करविनिहतकन्दुः वल्लवीप्राणबन्धुः।
वपुरुपसृतरेणुः कक्षनिक्षिप्तवेणु-
र्वचनवशगधेनुः पातु मां नन्दसूनुः॥
त्वां च वृन्दावनाधीश त्वां च वृन्दावनेश्वरि।
काकुभिर्वन्दमानोऽयं मन्दः प्रार्थयते जनः॥
योग्यता मे न काचिद्वां कृपालाभाय यद्यपि।
महाकृपालुमौलित्वात्तथापि कुरुतं कृपाम्॥
अयोग्ये सापराधेऽपि दृश्यन्ते कृपयाकुलाः।
महाकृपालवो हन्त लोके लोकेशवन्दितौ॥
भक्तेर्वा करुणाहेतोर्लेशाभासोऽपि नास्ति मे।
महालीलेश्वरतया तथाप्यत्र प्रसीदतम्॥
यदक्षम्यं नु युवयोः सकृद्भक्तिलवादपि।
तदागः क्वापि नास्त्येव कृत्वाशां प्रार्थये ततः॥
एष पापी रुदन्नुच्चैरादाय रदनैस्तृणम्।
हा नाथौ नाथति प्राणी सीदत्यत्र प्रसीदतम्॥

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[ ६ ]


हाहारावमसौ कुर्वन् दुर्भगो भिक्षते जनः।
एतां मे शृणुत काकुं काकुं शृणुतमीश्वरौ॥
वाचेह दीनया याचे साक्रन्दमतिमन्दधीः।
किरत करुणस्वान्तौ करुणोर्मिच्छटामपि॥
मधुराः सन्ति यावन्तो भावाः सर्वत्र चेतसः।
तेभ्योऽपि प्रेम मधुरं प्रसादीकुरुतं निजम्॥
नाथितं परमेवेदमनाथजनवत्सलौ।
स्वं साक्षाद्दास्यमेवास्मिन् प्रसादीकुरुतं जने॥
अंजलिं मूर्ध्नि विन्यस्य दीनोऽयं भिक्षते जनः।
अस्य सिद्धिरभीष्टस्य सकृदप्युपपाद्यताम्॥
(स्तवपुष्पांजलि)
सन् १९१६ ई० में सबसे पहले मैंने देवर्षि नारदके सूत्रोंकी
एक बँगलामें छपी हुई पुस्तक देखी थी। उस समय मैं एकान्तवासमें
था। भगवान्‌की कृपासे परमार्थ-साधनकी ओर कुछ मन लगता
था, उसमें देवर्षिके सूत्रोंसे बड़ी सहायता मिली। वहीं सूत्रोंपर
विचार करते-करते उनका भावार्थ लिखनेकी इच्छा हुई और कुछ
समय बाद भावार्थ लिखा भी गया। छपानेकी न उस समय इच्छा
थी और न सुविधा ही। लगभग सन् १९२० ई० में मैं बम्बईमें
था, वहाँ एक दिन श्रीवेंकटेश्वरप्रेसके स्वामी स्व० सेठ
खेमराजजीसे बातों-ही-बातोंमें सूत्रोंकी चर्चा चल गयी। उन्होंने
बड़े आग्रहसे पाण्डुलिपि मुझसे ले ली और छापनेके लिये उसे
प्रेसमें भी दे दिया; परन्तु असावधानतावश वहाँ पड़ी रह गयी।
मुझे कोई विशेष आग्रह था नहीं, इससे मैंने कोई ताकीद नहीं
की। सेठजीका स्वर्गवास हो गया। उसके अनन्तर कई वर्षों बाद
मैं वहाँसे उस प्रतिको वापस माँग लाया। छपवानेका मन नहीं
था। संकोच था कि भक्तिशास्त्रपर मैं टीका लिखनेवाला कौन?

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[७]

परन्तु ज्यों-ज्यों प्रसिद्धि बढ़ने लगी, वह सात्त्विक संकोच हटने
लगा और अन्तमें छपानेकी बात स्थिर हो गयी। मैंने फिरसे उसे
पढ़ा; उसमें कई जगह परिवर्तन-परिवर्द्धनकी आवश्यकता जान
पड़ी, इससे छपानेका काम रुक गया। इस बार भगवत्-प्रेरणासे
पुनः उसकी देख-भाल हुई और कुछ सुधार-बिगाड़ करनेके बाद
कल्याणमें क्रमशः सब सूत्र छप गये। उसका कुछ परिवर्तित और
परिवर्द्धित रूप इस पुस्तकमें है।
जिस समय सन् १९१६ में इसका भावार्थ लिखा गया था,
उस समय हिन्दीमें शायद एक-दो टीकाएँ इसपर हुई होंगी। अब
तो कई टीकाएँ हो चुकी हैं। इतना होनेपर भी इस टीकाको
छपानेमें दो ही कारण हो सकते हैं—पहला तो मान-बड़ाईकी
छिपी हुई कामना और दूसरा भक्तिशास्त्रकी आलोचनासे अपने
कल्याणकी आशा। वस्तुतः भक्तिकी जितनी चर्चा हो उतना ही
मंगल है। क्योंकि भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये भक्ति ही सर्वप्रधान
साधन है और साध्यरूपमें वही भगवत्प्रेम है। आशा है कि भक्त
और विद्वान् पाठकगण इस प्रकार विचारकर मेरे इस कार्यको
नितान्त निन्दनीय नहीं समझेंगे और मेरी धृष्टतापर क्षमा करेंगे,
साथ ही मेरी भूलोंके लिये क्षमा करेंगे। प्रेममें भाषाकी अपेक्षा
भावका ही विशेष मूल्य हुआ करता है। यद्यपि भक्तिशास्त्रपर
कुछ भी व्याख्यारूपसे लिखनेका मुझे अधिकार नहीं, तथापि
आशा है कि इस कार्यमें मेरी जो प्रवृत्ति हुई, उसको विज्ञ
महानुभाव भगवत्-प्रेरणा और भगवत्कृपा समझकर मुझपर
प्रसन्न होंगे। क्योंकि भगवत्कृपा बिना मनुष्यकी उत्तम कार्यमें
प्रवृत्ति नहीं होती। भक्तिशास्त्रकी आलोचना उत्तम-से-उत्तम कार्य
है ही। कारण, इसमें भगवान्‌के दिव्य गुण, भगवान्‌के अलौकिक
प्रेम, भगवान्‌की भक्ति, भगवत्प्रेम-प्राप्तिके साधन और अन्ततः

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[ ८ ]

भगवान्‌के पवित्र नामोंकी तो चर्चा हुई है। इससे अवश्य ही मेरे
नीरस और भक्तिशून्य हृदयमें कुछ रसका और भक्तिका संचार
हुआ होगा। एक महात्मा भक्तके इन वचनोंपर हमें दृढ़ विश्वास
करना चाहिये कि भगवान्‌के पवित्र नाम-गुणोंके स्मरण और
कीर्तनसे मनुष्यका कलुषित हृदय भी क्रमशः पवित्र होकर
शिशुकी भाँति सरल हो जाता है। भगवान्‌के गुण और नामोंका
कीर्तन हृदयकी सारी कालिमाओंको निःशेषरूपसे धो डालता है
और प्रेमावेशके कारण शुद्ध और शान्तिमय दिव्य भावोंकी
उत्पत्ति होकर उसके जन्म और जीवनको सफल कर देती है।
महापातकयुक्तोऽपि ध्यायन्निमिषमच्युतम्।
पुनस्तपस्वी भवति पङ्क्तिपावनपावनः॥
‘महापातकी व्यक्ति भी यदि निमेषमात्र श्रीभगवान्‌का ध्यान
करे तो वह पुनः पवित्र होकर पवित्र करनेवालोंको भी पवित्र
कर सकता है।’
फिर इस ग्रन्थमें व्याख्यारूपसे जो कुछ लिखा गया है सो
सभी सन्तोंकी जूठन-प्रसादी है। मेरा वस्तुतः इसमें कुछ है भी
नहीं। इसलिये पाठकोंको मेरी ओर न देखकर सूत्रकार, सूत्र और
सूत्रकी व्याख्यारूपमें लिखे हुए शास्त्रों और सन्तोंके भावोंपर
ध्यान देना चाहिये।
षड्दर्शनोंकी भाँति भक्तिसूत्र भी एक दर्शन माना गया है। इसे
भक्तगण सप्तम दर्शन कहते हैं। ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न पुरुष ही
वास्तवमें भगवत्प्रेमके प्रकृत अधिकारी होते हैं। देवर्षिने चौरासी
सूत्रोंमें ही भक्तितत्त्वकी व्याख्या, भक्तिके अन्तराय, भक्तिके
साधन, भक्तिकी महिमा और भक्तोंका महत्त्व भलीभाँति प्रकट
कर दिया है। अवश्य ही इसमें भगवान्‌के सगुण साकार दिव्य
स्वरूपकी भक्तिका वर्णन है, परन्तु यह नहीं समझना चाहिये कि

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[ ९ ]

ज्ञानसे इस भक्तिका कोई विरोध है। वरं स्वयं देवर्षिने
व्रजगोपियोंका उदाहरण देकर उनके मनमें श्रीभगवान्‌के
माहात्म्यका ज्ञान होना सिद्ध किया है। श्रीभगवान्‌का ज्ञान ही न
हो तो प्रेम किसमें हो। और यह तत्त्व सत्य ही है कि अभिन्न
अखण्ड अनन्य अविकारी प्रेम होनेपर ही हृदयके असली
तत्त्वका—प्रियतमके मनकी बातका पता लगता है। अतएव
ज्ञान और भक्तिका इसमें कोई विरोध नहीं समझना चाहिये।
इसी प्रकार कर्मका भी विरोध नहीं है। भगवान्‌के लिये
निष्काम कर्म करनेकी तो आज्ञा ही दी है। और कर्मोंका
सर्वथा त्यागी भक्त भी अहर्निश भगवान्‌के प्रेममें मस्त
होकर भगवच्चिन्तनरूपी कर्म तो छोड़ ही नहीं सकता।
इसलिये देवर्षिकथित भक्तिमें ज्ञान और कर्म दोनों ही हैं,
अवश्य ही वे होने चाहिये भक्तिके अनुकूल। शुष्क ज्ञान और
कर्मको इसमें स्थान नहीं है। इसमें ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर
सर्वत्र रस-ही-रस है। भगवान् रसमय हैं ही और उसी रसमें परम
आनन्द है।
श्रुति भी यही कहती है—
‘रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।’
भक्तिसे ही उस रसमय भगवान्‌के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।
भक्तिसे ही वह ऋषि-मुनि-देवदुर्लभ परमानन्द मिलता है।
अतएव भक्तिका ही आश्रय सबको लेना चाहिये। श्रीमद्भागवतमें
कहा गया है—
सूर्यभगवान् रोज-रोज उदय और अस्त होते हैं, इसमें
मनुष्योंकी आयु वृथा ही नष्ट होती है। बस, उतना ही समय
सफल होता है जिसमें हरिचर्चा की जाती है। संसारमें जीते रहना
और खाना-पीना कोई महत्त्वकी बात नहीं है। जैसे मनुष्य जीते

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[ १० ]

हैं, वैसे ही क्या जड वृक्ष नहीं जीवित रहते ? लोहारकी धौंकनी
क्या मनुष्योंके समान ही साँस नहीं लेती ? गाँवोंके पशु, कुत्ते,
सूअर आदि क्या भोजन नहीं करते और मलमूत्रका त्याग नहीं
करते ? कुत्ते जिस प्रकार दर-दर भटकते हुए लाठियाँ खाते हैं,
गाँवोंके सूअर जैसे असार वस्तु ग्रहण करते हैं, ऊँट जैसे काँटे
खाता है और गदहा जैसे केवल बोझ ढोता है, ठीक वैसे ही
भगवान्‌की भक्तिसे हीन मनुष्य कुत्तेके समान सब ओरसे
तिरस्कार पाता है, सूअरके समान असार विषयोंको ग्रहण करता
है, ऊँटके समान दुःखभरे विषयरूपी काँटोंको खा-खाकर सदा
दुःखी रहता है और गदहेके समान संसारके भारको ढोता और
रोता रहता है। मनुष्यके वे कान साँपके बिलके समान हैं, जिनमें
भगवान् श्रीकृष्णकी लीला नहीं जाकर विषयवार्तारूपी साँप जाते
हैं। वह जीभ मेंढककी जीभके समान है जो भगवान्‌के नाम-गुण
नहीं गाती। वह सिर सुन्दर बालों और साजोंसे सजा हुआ होनेपर
भी भाररूप है जो श्रीहरिके सामने नहीं झुकता। वे हाथ मुर्देके
हाथोंके समान हैं जो सोनेके गहनोंसे सजे होनेपर भी कभी
श्रीहरिकी सेवा नहीं करते। मनुष्यकी वे आँखें मोरकी पाँखोंमें
दीखनेवाली आँखोंके समान वृथा हैं जो भगवान्‌की पवित्र
मूर्तियोंका दर्शन नहीं करतीं। वे पैर पेड़ोंके समान व्यर्थ हैं जो
भगवान्‌के पवित्र स्थानों (मन्दिरों और तीर्थों)-में नहीं जाते। वह
मनुष्य जीता ही मरेके समान है जो श्रीभगवान्‌की चरणधूलिको
सिरपर नहीं धारण करता या भगवान्‌के चरणोंपर चढ़ी हुई
तुलसीकी गन्धको नहीं सूँघता। और वह हृदय तो वज्रका ही है
जो श्रीहरिनामोंको सुनकर उमड़ नहीं आता, गद्गद नहीं
होता, जिससे रोमांच नहीं होता और नेत्रोंमें आनन्दके आँसू नहीं
भर आते।'

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[ ११ ]
अन्तमें मैं अत्यन्त विनम्रभावसे भगवान्‌के प्रेमी समस्त
भक्तोंके चरणकमलोंमें यही प्रार्थना करता हूँ कि आपलोग सब
मिलकर मुझको कृपापूर्वक ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मेरा मन-
मधुकर सदा श्रीभगवान्‌के चरणकमलोंमें ही विहरण करनेवाला
बन जाय। क्योंकि मनुष्यको तभीतक भय, शोक, स्पृहा, परिभव
या लोभ रहता है जबतक कि वह भगवान्‌के चरणोंका आश्रय
नहीं ले लेता—
तावद्भयं द्रविणगेहसुहृन्निमित्तं
शोकः स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभः।
तावन्ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं
यावन्न तेऽङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोकः॥
(श्रीमद्भागवत ३।९।६)
भक्तोंके चरणरजका दासानुदास
—हनुमानप्रसाद पोद्दार
🞎 🞎

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देवर्षि नारद

अहो देवर्षिर्धन्योऽयं यत्कीर्तिं शार्ङ्गधन्वनः।
गायन्माद्यन्निदं तन्त्र्या रमयत्यातुरं जगत्॥
(श्रीमद्भागवत १। ६। ३९)
‘अहो! ये देवर्षि नारदजी धन्य हैं, जो वीणा बजाते, हरिगुण
गाते और मस्त होते हुए इस आतुर जगत्को आनन्दित करते
फिरते हैं।’
कारक पुरुष जगत्में वैसे ही लोककल्याणार्थ आते और
विचरते हैं, जैसे स्वयं भगवान् अवतीर्ण होते हैं। श्रीभगवान्‌की
पवित्र लीलाके लिये भूमि तैयार कर देना, उनकी लीलाके लिये
वैसे ही लीलोपयोगी उपकरणोंका संग्रह करना, लीलामें सहायक
होना, यह उनका स्वाभाविक कार्य होता है। ऐसे महापुरुष मुक्त
होनेपर भी मुक्त न होकर जगत्में जीवोंके साथ उनके कल्याणार्थ
विराजते हैं। यों तो इनका कार्य सदा ही अबाधितरूपसे चलता
रहता है, परन्तु किसी खास भगवदवतारके समय इनका कार्य
विशेषरूपसे बढ़ जाता है। इनका मंगलमय जीवन जगत्के महान्
मंगलके लिये होता है। अविद्या, अहंकार, ममत्व, आसक्ति
आदिसे सर्वथा रहित ये महापुरुष यन्त्री भगवान्‌के हाथोंमें यन्त्रवत्
कार्य करते रहते हैं। इनके सारे कार्य भगवान्‌के ही कार्य होते
हैं। ऐसे ही महापुरुषोंमें देवर्षि नारदजी एक हैं। सभी युगोंमें, सभी
लोकोंमें, सभी शास्त्रोंमें, सभी समाजोंमें और सभी कार्योंमें
नारदजीका प्रवेश है। आप सत्ययुगमें भी थे; त्रेता, द्वापरमें भी
और इस घोर कलिकालमें भी, कहते हैं कि अधिकारी भक्तोंको
आपके शुभ दर्शन हुआ करते हैं। गोलोक, वैकुण्ठलोक,
ब्रह्मलोक आदिसे लेकर तल-अतलादि पातालतक सर्वत्र आपका

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[ १३ ]
प्रवेश है और योगबलसे मन करते ही तुरन्त कहाँ-से-कहाँ पहुँच
जाते हैं। वेद, स्मृति, पुराण, संहिता, ज्योतिष, संगीत आदि सभी
शास्त्रोंमें आप दृष्टिगोचर होते हैं। साक्षात् भगवान् विष्णु, शिव
आदिसे लेकर घोर राक्षसतक आपका सम्मान, विश्वास और
आदर करते हैं। देवराज इन्द्र भी आपके वचनोंका आदर करते
हैं और देवशत्रु हिरण्यकशिपुकी पत्नी कयाधू भी आपकी
बातपर विश्वास कर आपके आश्रममें अपनेको सुरक्षित समझती
है। कहीं आप व्यास, वाल्मीकि, शुकदेव-सरीखे महापुरुषोंको
परमतत्त्वका उपदेश देते दिखायी देते हैं तो कहीं दो पक्षोंमें
कलह और विवाद खड़ा कर देनेके प्रयासमें लगे दीखते हैं।
वास्तवमें आप अपने लिये कुछ भी नहीं करते। जिस कार्यसे
जिसका मंगल देखते हैं और भगवान्‌की लीलाका एक सुन्दर
दृश्य सामने ला पाते हैं, उसी कार्यको करने लगते हैं। इनका
विवाद और कलह कराना भी लोकहितार्थ और भगवान्‌की
लीलाके साधनार्थ ही हुआ करता है। क्योंकि इनकी प्रत्येक
चेष्टा भगवान्‌की ही चेष्टा होती है। इनको तो वस्तुतः भगवान्‌का
'मन' ही समझना चाहिये; गम्भीर दृष्टिसे विचार करनेपर
भगवत्कृपासे यह बात स्पष्ट दीखती है। कुछ लोग कहते हैं कि
नारद नामके कई भिन्न-भिन्न व्यक्ति हुए हैं। उनमें वे सात
मुख्य मानते हैं—१-ब्रह्माके मानस पुत्र, २-पर्वत ऋषिके मामा,
३-वसिष्ठपत्नी अरुन्धतीके भाई या सत्यवती नामक स्त्रीके
स्वामी, ४-यहाँकी वहाँ करके आपसमें लोगोंको भिड़ा देनेवाले,
५-कुबेरके सभासद्, ६-भगवान् श्रीरामकी सभाके आठ
धर्मशास्त्रियोंमेंसे एक और ७-जनमेजयके सर्पयज्ञके एक सदस्य।
यहाँपर हमें न तो इस विवादमें पड़ना है कि नारद एक थे
या अनेक और न विवाद करके इसका निर्णय करनेकी हममें

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[ १४ ]

योग्यता ही है। हाँ, हमारी दृष्टिमें तो हमें एक ही नारद दिखायी
देते हैं, जिन्होंने भिन्न-भिन्न कल्पों और युगोंमें भगवान्‌के
यन्त्रकी हैसियतसे विभिन्न कार्य किये हैं और कर रहे हैं। यहाँ
तो हमें नारदजीके उस कार्यके सम्बन्धमें कुछ कहना है जिसका
सम्बन्ध भक्तिसे है और वास्तवमें यही नारदजीका प्रधान कार्य
है। समस्त शास्त्रोंके सुपण्डित तथा समस्त तत्त्वोंके ज्ञाता और
व्याख्याता होकर भी अन्तमें नारदजी भगवान्‌की भक्तिका ही
उपदेश करते हैं। वाल्मीकि, व्यास, शुकदेव, प्रह्लाद, ध्रुव आदि
महान् महात्माओंको भगवद्भक्तिमें लगाते हैं। इतना ही नहीं,
स्वयं वीणा हाथमें लेकर सभी युगों और सभी समाजोंमें निर्भय
और निश्चिन्त हुए सदा-सर्वदा भगवान्‌के पवित्र नामोंका गान
करते हुए सारे विश्वके नर-नारियोंको पवित्र और भगवन्मुखी
करते रहते हैं। इन भगवान् श्रीनारदने अपने दो कल्पोंके चरित्रका
कुछ स्वयं वर्णन किया है। भागवतमें उक्त प्रसंग बड़ा ही सुन्दर
है। अपने और पाठकोंके मनोरंजनके लिये उसका कुछ मर्म नीचे
दिया जाता है।
दिव्यदृष्टिसम्पन्न महर्षि व्यासजीने लोगोंके कल्याणके लिये
वेदोंके चार विभाग किये। पंचम वेदरूप नानाख्यानोंसे पूर्ण
महाभारतकी रचना की। पुराणोंका निर्माण किया। इस प्रकार
सब प्राणियोंके कल्याणमें प्रवृत्त होनेपर भी व्यासभगवान्‌को
तृप्ति नहीं हुई, उनके चित्तमें पूर्ण शान्ति न हुई, उन्हें अपने
अन्दर कुछ कमी-सी प्रतीत होती ही रही; तब वे कुछ
उदास-से होकर सरस्वती नदीके तटपर बैठकर विचारने
लगे—'मैंने सब कुछ किया, तथापि मुझे अपने अन्दर कुछ
अभावका-सा अनुभव क्यों हो रहा है? क्या मैंने भागवतधर्मोंका
विस्तारसे निरूपण नहीं किया? क्योंकि भागवतधर्म ही परमेश्वर

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[ १५ ]

और परमहंस भक्तोंके प्रिय हैं।' वे इस प्रकार सोच ही रहे
थे कि हरिगुण गाते प्रसन्नवदन श्रीनारदजी— वहाँ आ पहुँचे।
आवभगत और कुशल-समाचार पूछने-कहनेके बाद श्रीव्यासजीने
अपनी स्थिति बतलाकर देवर्षिसे उसके लिये उपाय पूछा।'
तब श्रीनारदजी कहने लगे—
हे मुनिवर्य! आपने अपने ग्रन्थोंमें जिस प्रकार अन्यान्य
धर्मोंका वर्णन किया है, उस प्रकार भगवान्‌की कीर्तिका
कीर्तन नहीं किया। इसीलिये आपके मनमें उदासी छायी है।
जिस वाणीमें—जिस कवितामें जगत्‌को पवित्र करनेवाले भगवान्
श्रीवासुदेवकी महिमा और कीर्तिका वर्णन नहीं किया गया
है, वह वाणी या कविता मृदु, मधुर और चित्र-विचित्र
पदोंवाली (काव्यगुणसम्पन्न) होनेपर भी सारासारको जाननेवाले
ज्ञानीलोग उसे 'काकतीर्थ' के नामसे पुकारते हैं। अर्थात् जैसे
विष्ठापर चोंच मारनेवाले कौओंके समान मलिन विषयभोगी
कामी मनुष्योंका मन उस कवितामें रमता है, वैसे मानसरोवरमें
विहरण करनेवाले राजहंसोंके समान परमहंस भागवतोंका मन
उसमें कभी नहीं रमता। परन्तु सुननेमें कठोर और काव्यालंकारादिसे
रहित एवं पद-पदपर व्याकरणादिसे अशुद्ध होनेपर भी वह
वाणी परम रम्य और जनसमूहके पापोंको नाश करनेवाली
होती है, जिसमें भगवान्‌के नाम और भगवान्‌के गुणोंकी चर्चा
भरी होती है। अतएव उस भगवद्गुणनामसे पूर्ण वाणीको
साधु-महात्मागण सुनते हैं, सुनाते हैं और कीर्तन करते हैं।
हे मुनिवर! आप अमोघदर्शी हैं, आपसे कुछ भी छिपा नहीं
है। इसलिये अब आप संसारके कल्याणके लिये श्रीहरिकी
लीलाओंका वर्णन कीजिये। विद्वानोंने मनुष्यके तप, श्रवण,
नित्य धर्म और तीक्ष्ण बुद्धि आदिका परम फल केवल

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[ १६ ]
एकमात्र भक्तिपूर्वक श्रीहरिका गुण वर्णन करना ही बतलाया
है। मेरे पूर्वजन्मका इतिहास सुनकर उसका विचार कीजिये
कि श्रीहरिके गुणश्रवणसे मैं क्या-से-क्या हो गया।
हे महामुनि! मैं पूर्वकालमें एक दासीपुत्र था। एक समय
चातुर्मास्य बितानेके लिये वर्षाकालमें हमारे गाँवमें बहुत-से
महात्मा पधारे। मैं छोटा बालक था। मेरी माताने मुझे उन
महापुरुषोंकी सेवामें लगा दिया। मैं उन महात्माओंके सामने
किसी प्रकारका लड़कपन नहीं करता था, सब खेलोंको
छोड़कर शान्तिके साथ उनके चरणोंमें बैठा रहता था और
बहुत ही कम बोलता था। इन्हीं सब कारणोंसे वे महात्मा
समदृष्टि होनेपर भी मुझपर प्रसन्न होकर विशेष कृपा रखने
लगे। उन मुनियोंकी आज्ञासे मैं उनके पत्तोंमें बची हुई जूठन
खा लेता था। इसीके प्रभावसे मेरे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गये।
ऐसा करते-करते कुछ समयमें मेरा चित्त शुद्ध हो गया
जिससे उनके धर्ममें (भागवतधर्ममें) मेरी रुचि हो गयी। वहाँ
वे लोग नित्य श्रीकृष्णकी कथाएँ गाते थे और मैं उन
महात्माओंके अनुग्रहसे उन मनोहर कथाओंको श्रद्धाके साथ
सुनता था। ऐसा करते-करते श्रीभगवान्में मेरी भक्ति हो
गयी। हे महामुनि! पहले भगवान्में मेरी रुचि हुई, फिर मेरी
स्थिर दृढ़ मति हो गयी। उस विशुद्ध दृढ़ बुद्धिके प्रभावसे
मैं अपने मायारहित शुद्ध परब्रह्मरूपमें समस्त सत्-असत्
प्रपंचको मायासे कल्पित देखने लगा। इस प्रकार वर्षा और
शरद् दोनों ऋतुओंभर वे महात्मा प्रतिदिन भगवान्के निर्मल
यशका गान करते रहे, जिसके सुननेसे मेरे हृदयमें रजोगुण
और तमोगुणको नाश करनेवाली सात्त्विकी भक्ति उत्पन्न हो
गयी। मुझको अनुरागी, आश्रित, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु और

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[ १७ ]
पापहीन बालकरूप दास समझकर दीनोंपर दया करनेवाले
उन महात्माओंने गाँवसे जाते समय परम कृपा करके साक्षात्
भगवान्के द्वारा कहा हुआ गुह्यतम ज्ञान मुझसे कहा, जिस ज्ञानके
द्वारा मैं भगवान् वासुदेवकी मायाके प्रभावको जान गया,
जिसके जाननेसे पुरुष परमात्माके परमपदको प्राप्त होता है।*
इसके अनन्तर मुझे ज्ञानोपदेश करनेवाले महात्मा तो दूसरी
जगह चले गये। मैं उनके बतलानेके अनुसार भजन करता रहा।
मेरी माताके मैं ही एकमात्र पुत्र था, जिससे मुझपर माताका बड़ा
भारी स्नेह था। वह मुझको ही अनन्य गति समझती थी। एक
दिन कालप्रेरित सर्पने मेरी स्नेहमयी माताको डस लिया, जिससे
उसकी मृत्यु हो गयी। तब 'भक्तोंका कल्याण चाहनेवाले
भगवान्ने मुझपर कृपा की' ऐसा मानकर मैं उत्तर दिशाकी ओर
चल दिया और वहाँ एक घने वनमें पहुँचकर नदी-किनारे एक
पीपलके वृक्षकी जड़में बैठकर भगवान्का चिन्तन और चित्तको
एकाग्र करके भक्तिपूर्वक भगवान्के चरण-कमलोंका ध्यान करने

  • प्रसिद्ध गीताके टीकाकार महात्मा श्रीमधुसूदन सरस्वतीजीने अपने भक्तिरसायन-
    ग्रन्थमें देवर्षि नारदजीके इसी क्रमका अनुसरण करते हुए भक्तिकी ग्यारह भूमिकाएँ
    बतलायी हैं—
    प्रथमं महतां सेवा तद्दयापात्रता ततः।
    श्रद्धाऽथ तेषां धर्मेषु ततो हरिगुणश्रुतिः॥
    ततो रत्यंकुरोत्पत्तिः स्वरूपाधिगतिस्ततः।
    प्रेमवृद्धिः परानन्दे तस्याथ स्फुरणं ततः॥
    भगवद्धर्मनिष्ठातः स्वस्मिंस्तद्गुणशालिता।
    प्रेम्णोऽथ परमा काष्ठेत्युदिता भक्तिभूमिकाः॥
    १-प्रथम महापुरुषोंकी सेवा, २-तदनन्तर उनकी दयापात्रता, ३-उससे इनके
    धर्मोंपर श्रद्धा, ४-श्रद्धासे हरिगुणका श्रवण, ५-श्रवणसे प्रेमके अंकुरकी उत्पत्ति,
    ६-प्रेमसे स्वरूपप्राप्ति, ७-उससे परानन्दस्वरूपमें प्रेमवृद्धि, ८-प्रेमवृद्धिसे परमानन्दका
    स्फुरण, ९-उससे भागवतधर्ममें निष्ठा, १०-उससे अपनेमें उन गुणोंका प्राकट्य और
    ११-उससे प्रेमकी पराकाष्ठा। इस प्रकार भक्तिकी भूमिकाएँ कही गयी हैं।
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[ १८ ]

लगा। उस समय प्रेमावेशसे मेरी आँखोंमें आनन्दके आँसू भर
आये और मैंने देखा, मेरे हृदयमें भगवान् श्रीहरि प्रकट हो गये।
भगवान्‌के दर्शन पाते ही प्रेमकी बाढ़-सी आ गयी। मेरे रोम खड़े
हो गये। मैं आनन्दके समुद्रमें डूब गया और संसारसहित अपने-
आपको भूल गया।
सहसा भगवान्‌का वह मनमोहन परम सुन्दर रूप अन्तर्हित हो
गया। तब मुझे बड़ा दुःख हुआ। मैं पुनः दर्शनार्थ चेष्टा करने
लगा, तब मैंने आकाशवाणीसे सुना कि 'हे बालक! इस जन्ममें
तुझको मेरे दर्शन नहीं होंगे, प्रेम बढ़ानेके लिये मैंने एक बार तुझे
दर्शन दिये हैं। अल्पकालके सत्संगके प्रतापसे तेरी मुझमें दृढ़
भक्ति हुई है। तू इस शरीरको छोड़कर मेरा निजजन होगा, मुझमें
तेरी अचल बुद्धि होगी और मेरी कृपासे कल्पान्तमें भी तुझे इस
जन्मकी बातें याद रहेंगी।' तब मैंने अपनेको भगवान्‌का कृपापात्र
जाना और झुककर प्रणाम किया और लज्जा छोड़कर भगवान्‌के
परम गुप्त कल्याणमय नाम और गुणोंका कीर्तन और स्मरण
करता हुआ सन्तोषके साथ अहंकार और ईर्ष्या त्यागकर निरीह
हुआ संसारमें विचरने लगा। मैंने श्रीकृष्णमें मन लगाकर संसारका
संग त्याग दिया। यथासमय मेरा वह शरीर नष्ट हो गया और
मुझे शुद्ध दिव्य पार्षददेहकी प्राप्ति हुई।
तदनन्तर कल्पके अन्तमें संसारको अपनेमें लीन करके
प्रलयसमुद्रमें शयन करनेवाले ब्रह्माजीके हृदयमें श्वासके साथ
मैंने प्रवेश किया। सहस्र युगके उपरान्त जब ब्रह्माजी जगत्‌की
रचना करने लगे, तब मरीचि आदि ऋषियोंके साथ उनके
श्वाससे मैं उत्पन्न हो गया।
तबसे अखण्ड ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करके मैं तीनों लोकोंमें
बाहर-भीतर चाहे जहाँ विचरता हूँ। भगवान्‌की कृपासे मेरे लिये

१. प्रथम प्रकरण: पराभक्ति स्वरूप, लक्षण एवं अमृतत्व प्राप्ति (सूत्र १-२४)

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[ १९ ]

कहीं भी रुकावट नहीं है। स्वयं भगवान्‌की दी हुई इस स्वरमय
ब्रह्मसे विभूषित वीणाको बजाकर हरिगुण गाता हुआ मैं सर्वत्र
विचरता हूँ। भगवान्‌की मुझपर इतनी अपार कृपा है कि जब
मैं प्रेमसे गद्गद होकर भगवान्‌की लीला गाता हूँ, तभी
मंगलकीर्ति पूज्यचरण भगवान् उसी क्षण प्रकट होकर मुझे ऐसे
दर्शन देते हैं, जैसे कोई किसीके पुकारते ही शीघ्र आ जाता है।
जो लोग भोगोंकी इच्छासे बार-बार व्यग्रचित्त होकर संसारके
विषय-भोगोंमें आसक्त हैं, उनके संसारसागरसे तरनेके लिये
केवल श्रीहरिचर्चा ही दृढ़ नौका है। इसीलिये मैं अपने और
लोगोंके कल्याणके लिये सदा-सर्वदा हरिगुणगान करता हुआ
विचरण करता हूँ। 'भगवान् श्रीहरिके भजनसे विषयी पुरुषोंका
चित्त जितना शीघ्र शान्त होता है उतना योगादिके द्वारा
नहीं होता।' इतना कहकर हरिगुण गाते हुए श्रीनारदजी वहाँसे
चल दिये।
महाभारतमें कहा है कि देवर्षि नारदजी समस्त वेदोंके
तत्त्वज्ञ, देवताओंके पूज्य, इतिहास-पुराणोंके विशेषज्ञ, अतीत
कल्पोंकी बातोंको जाननेवाले, धर्म-तत्त्वके ज्ञाता, शिक्षा-कल्प-
व्याकरणके असाधारण पण्डित, संगीतविशारद, परस्पर-विरुद्ध
विधिवाक्योंकी मीमांसा जाननेवाले, वाक्योंका पृथक्करण करनेमें
पूर्ण योग्य, प्रभावशाली, व्याख्यानदाता, मेधावी, स्मृतिवान्,
नीतिशील, कवि, ज्ञानी, समस्त प्रमाणोंद्वारा वस्तुका विचार
करनेमें समर्थ, बृहस्पति-जैसे विद्वानोंकी शंकाओंका समाधान
करनेवाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले, योगबलसे
समस्त दिशाओंसे परिपूर्ण भूमण्डलके प्रत्यक्षदर्शी, मोक्षाधिकारके
ज्ञाता, कल्याणके लिये विवाद खड़ा कर देनेवाले, सन्धि और
विग्रहके सिद्धान्तोंके ज्ञाता, अनुमानसे ही कार्यका तत्त्व जाननेवाले,

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[ २० ]
समस्त शास्त्रोंके पूर्ण पण्डित, विधिका उपदेश करनेवाले, समस्त
सद्गुणोंके आधार और अपार तेजस्वी थे। वे ज्ञानके स्वरूप,
विद्याके भण्डार, आनन्दके समूह, सदाचारके आधार, सब भूतोंके
अकारण प्रेमी, विश्वके सहज ही हितकारी, भक्तिके महान्
स्वरूप और आचार्य थे।
ऐसे देवर्षि नारदजीने सब कुछ उपदेश करनेके बाद ‘अथातो
भक्तिं व्याख्यास्यामः’ कहकर अन्तमें भक्तितत्त्वका उपदेश
किया। इससे सिद्ध होता है कि भक्तिका दर्जा बहुत ही
ऊँचा है।
इस प्रकार लोगोंपर अकारण कृपाके कारण हरिगुण गाते हुए
त्रिलोकीमें घूमनेवाले देवर्षि नारदजीके चरणोंमें प्रणामकर हमलोगोंको
उनके परम प्रिय भक्तिके अनुपम उपदेशोंको ध्यानसे पढ़कर
तदनुसार जीवन बनानेकी चेष्टा करनी चाहिये।

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॥ श्रीहरिः ॥
प्रेम-दर्शन
(देवर्षि नारदरचित भक्तिसूत्र)
प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
१-अब हम भक्तिकी व्याख्या करेंगे।
इस सूत्रके 'अथ' और 'अतः' शब्दसे यह प्रतीत होता है
कि भक्तिमार्गके आचार्य परम भक्तशिरोमणि, सर्वभूतहितमें
रत, दयानिधि देवर्षि नारदजी अन्यान्य सिद्धान्तोंकी व्याख्या तो
कर चुके; अब जीवोंके कल्याणार्थ परम कल्याणमयी भक्तिके
स्वरूप और साधनोंकी व्याख्या आरम्भ करते हैं। नारदजी
कहते हैं—
सा त्वस्मिन्* परमप्रेमरूपा ॥ २ ॥
२-वह ( भक्ति ) ईश्वरके प्रति परम प्रेमरूपा है।
भक्तिके अनेक प्रकार बतलाये गये हैं, परंतु नारदजी जिस
भक्तिकी व्याख्या करते हैं वह प्रेमस्वरूपा है। भगवान्में अनन्य
प्रेम हो जाना ही भक्ति है। ज्ञान, कर्म आदि साधनोंके आश्रयसे
रहित और सब ओरसे स्पृहाशून्य होकर चित्तवृत्ति अनन्य भावसे
जब केवल भगवान्में ही लग जाती है; जगत्के समस्त पदार्थोंसे
तथा परलोककी समस्त सुखसामग्रियोंसे, यहाँतक कि मोक्ष-
सुखसे भी चित्त हटकर एकमात्र अपने परम प्रेमास्पद भगवान्में
लगा रहता है; सारी ममता और आसक्ति सब पदार्थोंसे सर्वथा
निकलकर एकमात्र प्रियतम भगवान्के प्रति हो जाती है, तब उस
स्थितिको 'अनन्य प्रेम' कहते हैं।

  • पाठभेद "कस्मै"।
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२२ प्रेम-दर्शन
अमृतस्वरूपा च ॥ ३ ॥
३-और अमृतस्वरूपा ( भी ) है।
भगवान्में अनन्य प्रेम ही वास्तवमें अमृत है; वह सबसे
अधिक मधुर है और जिसको यह प्रेमामृत मिल जाता है वह उसे
पानकर अमर हो जाता है। लौकिक वासना ही मृत्यु है। अनन्य
प्रेमी भक्तके हृदयमें भगवत्प्रेमकी एक नित्य नवीन, पवित्र वासनाके
अतिरिक्त दूसरी कोई वासना रह ही नहीं जाती। इसी परम दुर्लभ
वासनाके कारण वह भगवान्की मुनिमनहारिणी लीलाका एक
साधन बनकर कर्मबन्धनयुक्त जन्म-मृत्युके चक्करसे सर्वथा छूट
जाता है। वह सदा भगवान्के समीप निवास करता है और
भगवान् उसके समीप। प्रेमीभक्त और प्रेमास्पद भगवान्का यह
नित्य अटल संयोग ही वास्तविक अमरत्व है। इसीसे भक्तजन
मुक्ति न चाहकरभक्ति चाहते हैं।
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥
यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो
भवति ॥ ४ ॥
४-जिसको ( परम प्रेमरूपा और अमृतरूपा भक्तिको )
पाकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, ( और )
तृप्त हो जाता है।
जिसने भगवत्-प्रेमामृतका पान कर लिया, वही सिद्ध है।
'सिद्ध' शब्दसे यहाँ अणिमादि सिद्धियोंसे अभिप्राय नहीं है।
प्रेमी भक्त, इन सिद्धियोंकी तो बात ही क्या, मोक्षरूप सिद्धि भी
नहीं चाहता। ये सिद्धियाँ तो ऐसे प्रेमी भक्तकी सेवाके
लिये अवसर ढूँढ़ा करती हैं, परन्तु वह भगवत्प्रेमके सामने
अत्यन्त तुच्छ समझकर इनको स्वीकार ही नहीं करता। स्वयं
भगवान् कहते हैं—