प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in context॥ श्रीहरिः ॥
प्रेम-दर्शन
(देवर्षि नारदरचित भक्तिसूत्र)
प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
१-अब हम भक्तिकी व्याख्या करेंगे।
इस सूत्रके 'अथ' और 'अतः' शब्दसे यह प्रतीत होता है
कि भक्तिमार्गके आचार्य परम भक्तशिरोमणि, सर्वभूतहितमें
रत, दयानिधि देवर्षि नारदजी अन्यान्य सिद्धान्तोंकी व्याख्या तो
कर चुके; अब जीवोंके कल्याणार्थ परम कल्याणमयी भक्तिके
स्वरूप और साधनोंकी व्याख्या आरम्भ करते हैं। नारदजी
कहते हैं—
सा त्वस्मिन्* परमप्रेमरूपा ॥ २ ॥
२-वह ( भक्ति ) ईश्वरके प्रति परम प्रेमरूपा है।
भक्तिके अनेक प्रकार बतलाये गये हैं, परंतु नारदजी जिस
भक्तिकी व्याख्या करते हैं वह प्रेमस्वरूपा है। भगवान्में अनन्य
प्रेम हो जाना ही भक्ति है। ज्ञान, कर्म आदि साधनोंके आश्रयसे
रहित और सब ओरसे स्पृहाशून्य होकर चित्तवृत्ति अनन्य भावसे
जब केवल भगवान्में ही लग जाती है; जगत्के समस्त पदार्थोंसे
तथा परलोककी समस्त सुखसामग्रियोंसे, यहाँतक कि मोक्ष-
सुखसे भी चित्त हटकर एकमात्र अपने परम प्रेमास्पद भगवान्में
लगा रहता है; सारी ममता और आसक्ति सब पदार्थोंसे सर्वथा
निकलकर एकमात्र प्रियतम भगवान्के प्रति हो जाती है, तब उस
स्थितिको 'अनन्य प्रेम' कहते हैं।
- पाठभेद "कस्मै"।