प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
DevanagariHindipublished178 pages
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अन्तमें मैं अत्यन्त विनम्रभावसे भगवान्के प्रेमी समस्त
भक्तोंके चरणकमलोंमें यही प्रार्थना करता हूँ कि आपलोग सब
मिलकर मुझको कृपापूर्वक ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मेरा मन-
मधुकर सदा श्रीभगवान्के चरणकमलोंमें ही विहरण करनेवाला
बन जाय। क्योंकि मनुष्यको तभीतक भय, शोक, स्पृहा, परिभव
या लोभ रहता है जबतक कि वह भगवान्के चरणोंका आश्रय
नहीं ले लेता—
तावद्भयं द्रविणगेहसुहृन्निमित्तं
शोकः स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभः।
तावन्ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं
यावन्न तेऽङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोकः॥
(श्रीमद्भागवत ३।९।६)
भक्तोंके चरणरजका दासानुदास
—हनुमानप्रसाद पोद्दार
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