प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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समस्त शास्त्रोंके पूर्ण पण्डित, विधिका उपदेश करनेवाले, समस्त
सद्गुणोंके आधार और अपार तेजस्वी थे। वे ज्ञानके स्वरूप,
विद्याके भण्डार, आनन्दके समूह, सदाचारके आधार, सब भूतोंके
अकारण प्रेमी, विश्वके सहज ही हितकारी, भक्तिके महान्
स्वरूप और आचार्य थे।
ऐसे देवर्षि नारदजीने सब कुछ उपदेश करनेके बाद ‘अथातो
भक्तिं व्याख्यास्यामः’ कहकर अन्तमें भक्तितत्त्वका उपदेश
किया। इससे सिद्ध होता है कि भक्तिका दर्जा बहुत ही
ऊँचा है।
इस प्रकार लोगोंपर अकारण कृपाके कारण हरिगुण गाते हुए
त्रिलोकीमें घूमनेवाले देवर्षि नारदजीके चरणोंमें प्रणामकर हमलोगोंको
उनके परम प्रिय भक्तिके अनुपम उपदेशोंको ध्यानसे पढ़कर
तदनुसार जीवन बनानेकी चेष्टा करनी चाहिये।