प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
Page 17 of 178
Read in context[ १५ ]
और परमहंस भक्तोंके प्रिय हैं।' वे इस प्रकार सोच ही रहे
थे कि हरिगुण गाते प्रसन्नवदन श्रीनारदजी— वहाँ आ पहुँचे।
आवभगत और कुशल-समाचार पूछने-कहनेके बाद श्रीव्यासजीने
अपनी स्थिति बतलाकर देवर्षिसे उसके लिये उपाय पूछा।'
तब श्रीनारदजी कहने लगे—
हे मुनिवर्य! आपने अपने ग्रन्थोंमें जिस प्रकार अन्यान्य
धर्मोंका वर्णन किया है, उस प्रकार भगवान्की कीर्तिका
कीर्तन नहीं किया। इसीलिये आपके मनमें उदासी छायी है।
जिस वाणीमें—जिस कवितामें जगत्को पवित्र करनेवाले भगवान्
श्रीवासुदेवकी महिमा और कीर्तिका वर्णन नहीं किया गया
है, वह वाणी या कविता मृदु, मधुर और चित्र-विचित्र
पदोंवाली (काव्यगुणसम्पन्न) होनेपर भी सारासारको जाननेवाले
ज्ञानीलोग उसे 'काकतीर्थ' के नामसे पुकारते हैं। अर्थात् जैसे
विष्ठापर चोंच मारनेवाले कौओंके समान मलिन विषयभोगी
कामी मनुष्योंका मन उस कवितामें रमता है, वैसे मानसरोवरमें
विहरण करनेवाले राजहंसोंके समान परमहंस भागवतोंका मन
उसमें कभी नहीं रमता। परन्तु सुननेमें कठोर और काव्यालंकारादिसे
रहित एवं पद-पदपर व्याकरणादिसे अशुद्ध होनेपर भी वह
वाणी परम रम्य और जनसमूहके पापोंको नाश करनेवाली
होती है, जिसमें भगवान्के नाम और भगवान्के गुणोंकी चर्चा
भरी होती है। अतएव उस भगवद्गुणनामसे पूर्ण वाणीको
साधु-महात्मागण सुनते हैं, सुनाते हैं और कीर्तन करते हैं।
हे मुनिवर! आप अमोघदर्शी हैं, आपसे कुछ भी छिपा नहीं
है। इसलिये अब आप संसारके कल्याणके लिये श्रीहरिकी
लीलाओंका वर्णन कीजिये। विद्वानोंने मनुष्यके तप, श्रवण,
नित्य धर्म और तीक्ष्ण बुद्धि आदिका परम फल केवल