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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 14 of 178

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देवर्षि नारद

अहो देवर्षिर्धन्योऽयं यत्कीर्तिं शार्ङ्गधन्वनः।
गायन्माद्यन्निदं तन्त्र्या रमयत्यातुरं जगत्॥
(श्रीमद्भागवत १। ६। ३९)
‘अहो! ये देवर्षि नारदजी धन्य हैं, जो वीणा बजाते, हरिगुण
गाते और मस्त होते हुए इस आतुर जगत्को आनन्दित करते
फिरते हैं।’
कारक पुरुष जगत्में वैसे ही लोककल्याणार्थ आते और
विचरते हैं, जैसे स्वयं भगवान् अवतीर्ण होते हैं। श्रीभगवान्‌की
पवित्र लीलाके लिये भूमि तैयार कर देना, उनकी लीलाके लिये
वैसे ही लीलोपयोगी उपकरणोंका संग्रह करना, लीलामें सहायक
होना, यह उनका स्वाभाविक कार्य होता है। ऐसे महापुरुष मुक्त
होनेपर भी मुक्त न होकर जगत्में जीवोंके साथ उनके कल्याणार्थ
विराजते हैं। यों तो इनका कार्य सदा ही अबाधितरूपसे चलता
रहता है, परन्तु किसी खास भगवदवतारके समय इनका कार्य
विशेषरूपसे बढ़ जाता है। इनका मंगलमय जीवन जगत्के महान्
मंगलके लिये होता है। अविद्या, अहंकार, ममत्व, आसक्ति
आदिसे सर्वथा रहित ये महापुरुष यन्त्री भगवान्‌के हाथोंमें यन्त्रवत्
कार्य करते रहते हैं। इनके सारे कार्य भगवान्‌के ही कार्य होते
हैं। ऐसे ही महापुरुषोंमें देवर्षि नारदजी एक हैं। सभी युगोंमें, सभी
लोकोंमें, सभी शास्त्रोंमें, सभी समाजोंमें और सभी कार्योंमें
नारदजीका प्रवेश है। आप सत्ययुगमें भी थे; त्रेता, द्वापरमें भी
और इस घोर कलिकालमें भी, कहते हैं कि अधिकारी भक्तोंको
आपके शुभ दर्शन हुआ करते हैं। गोलोक, वैकुण्ठलोक,
ब्रह्मलोक आदिसे लेकर तल-अतलादि पातालतक सर्वत्र आपका