प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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अमृतस्वरूपा च ॥ ३ ॥
३-और अमृतस्वरूपा ( भी ) है।
भगवान्में अनन्य प्रेम ही वास्तवमें अमृत है; वह सबसे
अधिक मधुर है और जिसको यह प्रेमामृत मिल जाता है वह उसे
पानकर अमर हो जाता है। लौकिक वासना ही मृत्यु है। अनन्य
प्रेमी भक्तके हृदयमें भगवत्प्रेमकी एक नित्य नवीन, पवित्र वासनाके
अतिरिक्त दूसरी कोई वासना रह ही नहीं जाती। इसी परम दुर्लभ
वासनाके कारण वह भगवान्की मुनिमनहारिणी लीलाका एक
साधन बनकर कर्मबन्धनयुक्त जन्म-मृत्युके चक्करसे सर्वथा छूट
जाता है। वह सदा भगवान्के समीप निवास करता है और
भगवान् उसके समीप। प्रेमीभक्त और प्रेमास्पद भगवान्का यह
नित्य अटल संयोग ही वास्तविक अमरत्व है। इसीसे भक्तजन
मुक्ति न चाहकरभक्ति चाहते हैं।
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥
यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो
भवति ॥ ४ ॥
४-जिसको ( परम प्रेमरूपा और अमृतरूपा भक्तिको )
पाकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, ( और )
तृप्त हो जाता है।
जिसने भगवत्-प्रेमामृतका पान कर लिया, वही सिद्ध है।
'सिद्ध' शब्दसे यहाँ अणिमादि सिद्धियोंसे अभिप्राय नहीं है।
प्रेमी भक्त, इन सिद्धियोंकी तो बात ही क्या, मोक्षरूप सिद्धि भी
नहीं चाहता। ये सिद्धियाँ तो ऐसे प्रेमी भक्तकी सेवाके
लिये अवसर ढूँढ़ा करती हैं, परन्तु वह भगवत्प्रेमके सामने
अत्यन्त तुच्छ समझकर इनको स्वीकार ही नहीं करता। स्वयं
भगवान् कहते हैं—