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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 19 of 178

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पापहीन बालकरूप दास समझकर दीनोंपर दया करनेवाले
उन महात्माओंने गाँवसे जाते समय परम कृपा करके साक्षात्
भगवान्के द्वारा कहा हुआ गुह्यतम ज्ञान मुझसे कहा, जिस ज्ञानके
द्वारा मैं भगवान् वासुदेवकी मायाके प्रभावको जान गया,
जिसके जाननेसे पुरुष परमात्माके परमपदको प्राप्त होता है।*
इसके अनन्तर मुझे ज्ञानोपदेश करनेवाले महात्मा तो दूसरी
जगह चले गये। मैं उनके बतलानेके अनुसार भजन करता रहा।
मेरी माताके मैं ही एकमात्र पुत्र था, जिससे मुझपर माताका बड़ा
भारी स्नेह था। वह मुझको ही अनन्य गति समझती थी। एक
दिन कालप्रेरित सर्पने मेरी स्नेहमयी माताको डस लिया, जिससे
उसकी मृत्यु हो गयी। तब 'भक्तोंका कल्याण चाहनेवाले
भगवान्ने मुझपर कृपा की' ऐसा मानकर मैं उत्तर दिशाकी ओर
चल दिया और वहाँ एक घने वनमें पहुँचकर नदी-किनारे एक
पीपलके वृक्षकी जड़में बैठकर भगवान्का चिन्तन और चित्तको
एकाग्र करके भक्तिपूर्वक भगवान्के चरण-कमलोंका ध्यान करने

  • प्रसिद्ध गीताके टीकाकार महात्मा श्रीमधुसूदन सरस्वतीजीने अपने भक्तिरसायन-
    ग्रन्थमें देवर्षि नारदजीके इसी क्रमका अनुसरण करते हुए भक्तिकी ग्यारह भूमिकाएँ
    बतलायी हैं—
    प्रथमं महतां सेवा तद्दयापात्रता ततः।
    श्रद्धाऽथ तेषां धर्मेषु ततो हरिगुणश्रुतिः॥
    ततो रत्यंकुरोत्पत्तिः स्वरूपाधिगतिस्ततः।
    प्रेमवृद्धिः परानन्दे तस्याथ स्फुरणं ततः॥
    भगवद्धर्मनिष्ठातः स्वस्मिंस्तद्गुणशालिता।
    प्रेम्णोऽथ परमा काष्ठेत्युदिता भक्तिभूमिकाः॥
    १-प्रथम महापुरुषोंकी सेवा, २-तदनन्तर उनकी दयापात्रता, ३-उससे इनके
    धर्मोंपर श्रद्धा, ४-श्रद्धासे हरिगुणका श्रवण, ५-श्रवणसे प्रेमके अंकुरकी उत्पत्ति,
    ६-प्रेमसे स्वरूपप्राप्ति, ७-उससे परानन्दस्वरूपमें प्रेमवृद्धि, ८-प्रेमवृद्धिसे परमानन्दका
    स्फुरण, ९-उससे भागवतधर्ममें निष्ठा, १०-उससे अपनेमें उन गुणोंका प्राकट्य और
    ११-उससे प्रेमकी पराकाष्ठा। इस प्रकार भक्तिकी भूमिकाएँ कही गयी हैं।
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar · Page 19 of 178 · SarvaKosh