प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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योग्यता ही है। हाँ, हमारी दृष्टिमें तो हमें एक ही नारद दिखायी
देते हैं, जिन्होंने भिन्न-भिन्न कल्पों और युगोंमें भगवान्के
यन्त्रकी हैसियतसे विभिन्न कार्य किये हैं और कर रहे हैं। यहाँ
तो हमें नारदजीके उस कार्यके सम्बन्धमें कुछ कहना है जिसका
सम्बन्ध भक्तिसे है और वास्तवमें यही नारदजीका प्रधान कार्य
है। समस्त शास्त्रोंके सुपण्डित तथा समस्त तत्त्वोंके ज्ञाता और
व्याख्याता होकर भी अन्तमें नारदजी भगवान्की भक्तिका ही
उपदेश करते हैं। वाल्मीकि, व्यास, शुकदेव, प्रह्लाद, ध्रुव आदि
महान् महात्माओंको भगवद्भक्तिमें लगाते हैं। इतना ही नहीं,
स्वयं वीणा हाथमें लेकर सभी युगों और सभी समाजोंमें निर्भय
और निश्चिन्त हुए सदा-सर्वदा भगवान्के पवित्र नामोंका गान
करते हुए सारे विश्वके नर-नारियोंको पवित्र और भगवन्मुखी
करते रहते हैं। इन भगवान् श्रीनारदने अपने दो कल्पोंके चरित्रका
कुछ स्वयं वर्णन किया है। भागवतमें उक्त प्रसंग बड़ा ही सुन्दर
है। अपने और पाठकोंके मनोरंजनके लिये उसका कुछ मर्म नीचे
दिया जाता है।
दिव्यदृष्टिसम्पन्न महर्षि व्यासजीने लोगोंके कल्याणके लिये
वेदोंके चार विभाग किये। पंचम वेदरूप नानाख्यानोंसे पूर्ण
महाभारतकी रचना की। पुराणोंका निर्माण किया। इस प्रकार
सब प्राणियोंके कल्याणमें प्रवृत्त होनेपर भी व्यासभगवान्को
तृप्ति नहीं हुई, उनके चित्तमें पूर्ण शान्ति न हुई, उन्हें अपने
अन्दर कुछ कमी-सी प्रतीत होती ही रही; तब वे कुछ
उदास-से होकर सरस्वती नदीके तटपर बैठकर विचारने
लगे—'मैंने सब कुछ किया, तथापि मुझे अपने अन्दर कुछ
अभावका-सा अनुभव क्यों हो रहा है? क्या मैंने भागवतधर्मोंका
विस्तारसे निरूपण नहीं किया? क्योंकि भागवतधर्म ही परमेश्वर