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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 20 of 178

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[ १८ ]

लगा। उस समय प्रेमावेशसे मेरी आँखोंमें आनन्दके आँसू भर
आये और मैंने देखा, मेरे हृदयमें भगवान् श्रीहरि प्रकट हो गये।
भगवान्‌के दर्शन पाते ही प्रेमकी बाढ़-सी आ गयी। मेरे रोम खड़े
हो गये। मैं आनन्दके समुद्रमें डूब गया और संसारसहित अपने-
आपको भूल गया।
सहसा भगवान्‌का वह मनमोहन परम सुन्दर रूप अन्तर्हित हो
गया। तब मुझे बड़ा दुःख हुआ। मैं पुनः दर्शनार्थ चेष्टा करने
लगा, तब मैंने आकाशवाणीसे सुना कि 'हे बालक! इस जन्ममें
तुझको मेरे दर्शन नहीं होंगे, प्रेम बढ़ानेके लिये मैंने एक बार तुझे
दर्शन दिये हैं। अल्पकालके सत्संगके प्रतापसे तेरी मुझमें दृढ़
भक्ति हुई है। तू इस शरीरको छोड़कर मेरा निजजन होगा, मुझमें
तेरी अचल बुद्धि होगी और मेरी कृपासे कल्पान्तमें भी तुझे इस
जन्मकी बातें याद रहेंगी।' तब मैंने अपनेको भगवान्‌का कृपापात्र
जाना और झुककर प्रणाम किया और लज्जा छोड़कर भगवान्‌के
परम गुप्त कल्याणमय नाम और गुणोंका कीर्तन और स्मरण
करता हुआ सन्तोषके साथ अहंकार और ईर्ष्या त्यागकर निरीह
हुआ संसारमें विचरने लगा। मैंने श्रीकृष्णमें मन लगाकर संसारका
संग त्याग दिया। यथासमय मेरा वह शरीर नष्ट हो गया और
मुझे शुद्ध दिव्य पार्षददेहकी प्राप्ति हुई।
तदनन्तर कल्पके अन्तमें संसारको अपनेमें लीन करके
प्रलयसमुद्रमें शयन करनेवाले ब्रह्माजीके हृदयमें श्वासके साथ
मैंने प्रवेश किया। सहस्र युगके उपरान्त जब ब्रह्माजी जगत्‌की
रचना करने लगे, तब मरीचि आदि ऋषियोंके साथ उनके
श्वाससे मैं उत्पन्न हो गया।
तबसे अखण्ड ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करके मैं तीनों लोकोंमें
बाहर-भीतर चाहे जहाँ विचरता हूँ। भगवान्‌की कृपासे मेरे लिये