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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

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परन्तु ज्यों-ज्यों प्रसिद्धि बढ़ने लगी, वह सात्त्विक संकोच हटने
लगा और अन्तमें छपानेकी बात स्थिर हो गयी। मैंने फिरसे उसे
पढ़ा; उसमें कई जगह परिवर्तन-परिवर्द्धनकी आवश्यकता जान
पड़ी, इससे छपानेका काम रुक गया। इस बार भगवत्-प्रेरणासे
पुनः उसकी देख-भाल हुई और कुछ सुधार-बिगाड़ करनेके बाद
कल्याणमें क्रमशः सब सूत्र छप गये। उसका कुछ परिवर्तित और
परिवर्द्धित रूप इस पुस्तकमें है।
जिस समय सन् १९१६ में इसका भावार्थ लिखा गया था,
उस समय हिन्दीमें शायद एक-दो टीकाएँ इसपर हुई होंगी। अब
तो कई टीकाएँ हो चुकी हैं। इतना होनेपर भी इस टीकाको
छपानेमें दो ही कारण हो सकते हैं—पहला तो मान-बड़ाईकी
छिपी हुई कामना और दूसरा भक्तिशास्त्रकी आलोचनासे अपने
कल्याणकी आशा। वस्तुतः भक्तिकी जितनी चर्चा हो उतना ही
मंगल है। क्योंकि भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये भक्ति ही सर्वप्रधान
साधन है और साध्यरूपमें वही भगवत्प्रेम है। आशा है कि भक्त
और विद्वान् पाठकगण इस प्रकार विचारकर मेरे इस कार्यको
नितान्त निन्दनीय नहीं समझेंगे और मेरी धृष्टतापर क्षमा करेंगे,
साथ ही मेरी भूलोंके लिये क्षमा करेंगे। प्रेममें भाषाकी अपेक्षा
भावका ही विशेष मूल्य हुआ करता है। यद्यपि भक्तिशास्त्रपर
कुछ भी व्याख्यारूपसे लिखनेका मुझे अधिकार नहीं, तथापि
आशा है कि इस कार्यमें मेरी जो प्रवृत्ति हुई, उसको विज्ञ
महानुभाव भगवत्-प्रेरणा और भगवत्कृपा समझकर मुझपर
प्रसन्न होंगे। क्योंकि भगवत्कृपा बिना मनुष्यकी उत्तम कार्यमें
प्रवृत्ति नहीं होती। भक्तिशास्त्रकी आलोचना उत्तम-से-उत्तम कार्य
है ही। कारण, इसमें भगवान्‌के दिव्य गुण, भगवान्‌के अलौकिक
प्रेम, भगवान्‌की भक्ति, भगवत्प्रेम-प्राप्तिके साधन और अन्ततः