मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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About this granth
This is Bharatendu Harishchandra's Hindi rendering of Vishakhadatta's Sanskrit play Mudrarakshasa (मुद्राराक्षस). Bharatendu (1850–1885), often called the father of modern Hindi literature, described it as a remarkable drama on politics, and his translation is one of the important early works of Hindi theatre.
The play follows Chanakya's scheme, after the fall of the Nanda dynasty, to bring the Nanda minister Rakshasa over to Chandragupta's side. The cast list names Chandragupta, Rakshasa, Chanakya, Malayaketu, Chanakya's agent Siddharthaka, Rakshasa's friend the jeweller Chandanadasa, Shakatadasa, and the spy Viradhagupta disguised as a snake-charmer.
This printing was compiled by Babu Ramdin Singh, editor of the Kshatriya Patrika, published by Rai Ramranvijay Singh Bahadur and printed at the Khadgavilas Press, Bankipur; the title page marks it as the eighth printing and carries the year 1925. Bharatendu dedicated the work to Raja Shivaprasad "Sitara-e-Hind". At about 173 pages, it shows the Hindi of the Bharatendu era and its approach to translating Sanskrit drama.
चतुर्थे अङ्क । ६१
चतुर्थे अङ्क । ६१
(आकाश की ओर देख कर) अजी क्या कहा, कि क्यों हटाते हो ? अमात्य राक्षस के सिर में पीडा सुन कर कुमार मलयकेतु उन को देखने को इधर ही आते हैं (जाता है)।
(भागुरायण और कञ्चुकी के साथ मलयकेतु आता है)। ५
मलयकेतु ।—(लम्बी सास लेकर—आप ही आप) हा ! देखो पिता को मरे आज दस महीने हुए और व्यर्थ वीरता का अभिमान कर के अब तक हम लोगों ने कुछ भी नहीं किया, बरन तर्पण करना भी छोड़ दिया। या क्या हुआ, मैं ने तो पहिले यही प्रतिज्ञा ही किया है। १०
कर वलय उर ताड़त गिरे, आचरहु की सुधि नहि परी ।
मिलि करहि आरतनाद हाहा, अलक खुलि रज सों भरी ॥
जो शोक सों भइ मात गन की दशा सो उलटाइ है ।
करि रिपु जुवतिगन की सोई गति पितहि तृप्ति कराइ है ॥
और भी— १५
रन मरि पितु ढिग जात हम, बीरन की गति पाइ ।
कै माता दृग जल भग्न, रिपु जुवती मुख लाइ ॥
(प्रकाश) अजी जाजले ! सब राजा लोगों से कहो कि “मैं बिना कहे सुने राक्षस मन्त्री के पास अकेला जाकर उन को प्रसन्न करू गा” इस से वे सब लोग उधर ही २० ठहरैं ।
कञ्चुकी । जो आज्ञा (घूमते २ नेपथ्य की ओर देख कर ।)
अजी राजा लोग ! सुनो, कुमार की आज्ञा है कि मेरे साथ कोई न चलै (देख कर आनन्द से) महाराजकुमार ! आप देखिये । आप की आज्ञा सुनते ही सब राजा रुक गए— २५
अति चपल जे रथ चलत ते, सुनि चित्र से तुरतहि भए ।
जे खुरन खोदत नभ पर्थाहि, ते बाजिगन झुकि रुक गए ॥
६२ मुद्राराक्षस -
जे रहे धावत ठिठकि ते, गज मूक घण्टा सह सधे ।
मरजाद तुव नहिं तजहि नृपगण, जलधि से मानहु बँधे ।
मलयकेतु ।—अजी जाजले ! तुम भी सब लोगों को लेकर जाओ, एक केवल भागुरायण मेरे संग रहे ।
५ कचुकी ।—जो आज्ञा (सब को लेकर जाता है ) ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! जब मैं यहां आता था तो भद्रभट प्रभृति लोगों ने मुझ से निवेदन किया कि “हम राक्षस मन्त्री के द्वारा कुमार के पास नहीं रहना चाहते, कुमार के सेनापति शिखरसेन के द्वारा रहेंगे । दुष्ट मन्त्री १० ही के डर से तो चन्द्रगुप्त को छोड़ कर यहां सब बात का सुभीता जान कर कुमार का आश्रय लिया है ।” सो उन लोगों की बात का मैं ने आशय नहीं समझा ।*
भागुरायण ।—कुमार ! यह तो ठीक ही है क्योंकि अपने कल्याण के हेतु सब लोग स्वामी का आश्रय हित और १५ प्रिय के द्वारा करते हैं ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! तो फिर राक्षस मन्त्री तो हम लोगों का परमप्रिय और बड़ा हित है ।
भागुरायण ।—ठीक है, पर बात यह है कि अमात्य राक्षस का बैर चाणक्य से है, कुछ चन्द्रगुप्त से नहीं है, इस से जो २० चाणक्य की बातों से रूठ कर चन्द्रगुप्त उन से मन्त्री का काम ले ले और नन्दकुल की भक्ति से “यह नन्द ही के वश का है” यह सोच कर राक्षस चन्द्रगुप्त से मिल जाय और चन्द्रगुप्त भी अपने बड़े लोगों का पुराना मन्त्री समझ कर उस को मिला ले, तो ऐसा न हो कि कुमार हम लोगों पर भी विश्वास न करें ।
२५
* चाणक्य के मन्त्रणी से लगाने मलयकेतु से ऐसा कहा था ।
चतुर्थ अङ्क । ६३
चतुर्थ अङ्क । ६३
मलयकेतु ।—ठीक है, मित्र भागुरायण ! राक्षस मन्त्री का घर
कहा है ?
भागुरायण ।—इधर कुमार इधर [ दोनों घूमते हैं ] कुमार !
यही राक्षस मन्त्री का घर है—चलिए ।
मलयकेतु ।—चले ( दोनों राक्षस के निकट जाते हैं )। ५
राक्षस ।—अहा ! स्मरण आया ( प्रकाश ) कहो जी ! तुम ने
कुसुमपुर में स्तनकलस वैतालिक को देखा था ?
करभक ।- क्यों नही ?
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! जब तक कुसुमपुर की बाते
हों तब तक हम लोग इधर ही ठहर कर सुनें कि क्या १०
बात होती है, क्योंकि—
भेद न कछु जामै खुले, याहीं भय सब ठौर ।
नृप सों मन्त्री जन कहहि, बात और की और ॥
भागुरायण ।—जो आज्ञा ( दोनों ठहर जाते हैं )।
राक्षस ।—क्यो जी ! काम सिद्ध हुआ ? १५
करभक ।—अमात्य की कृपा से सब काम सिद्ध ही है ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! वह कौन सा काम है ?
भागुरायण । कुमार ! मन्त्री के जी की बातें बडी गुप्त हैं।
कौन जान ? इस से देखिये अभी सुन लेते हैं कि क्या
कहते हैं । २०
राक्षस ।—अजी, भली भांति कहो ।
करभक ।—सुनिये—जिस समय आप ने आज्ञा दिया कि
करभक, तुम जाकर वैतालिक स्तनकलस से कह दो कि
जब २ चाणक्य चन्द्रगुप्त की आज्ञा भङ्ग करे तब तब तुम
ऐसे श्लोक पढो जिस से उस का जी और भी फिर जाय । २५
राक्षस ।—हा, तब ?
करभक ।- तब मै ने पटने में जाकर स्तनकलस से आप का
सन्देसा कह दिया ।
६४ मुद्राराक्षस—
राक्षस ।—तब ?
करभक ।—इस के पीछे नन्दकुल के विनाश से दु खी लोगो का जी बहलाने के हेतु चन्द्रगुप्त ने कुसुमपुर मे कौमुदी-महोत्सव होने की डौंडी पिटा दी और उस को बहुत दिन से बिछुडे हुए मित्रों के मिलाप की भांति पुर के निवासियोँ ने बडी प्रसन्नतापूर्वक स्नेह से मान लिया ।
राक्षस ।—(आंसू भर कर) हा देव नन्द !
यद्यपि उदित कमुदन सहित, पाइ चादनी चान्द ।
तदपि न तुम बिन लसत हे, नृपससि ! जगदानन्द ॥
हा, फिर क्या हुआ ?
करभक ।—तब चाणक्य दुष्ट ने सब लोगों के नेत्र के परमानन्ददायक उस उत्सव को रोक दिया और उसी समय स्तनकलस ने ऐसे ऐसे श्लोक पढे कि राजा का भी मन फिर जाय ।
राक्षस ।—वाह मित्र स्तनकलस, वाह क्योँ न हो ! अच्छे समय में भेदबीज बोया है, फल अवश्य होगा । क्योँकि—
नृप रूठे अचरज कहा, सकल लोग जा सङ्ग ।
छोटे हू मानैँ बुरो परे रंग में भङ्ग ॥
मलयकेतु ।—ठीक हे (नृप रूठे यह दोहा फिर पढता है)
राक्षस ।—हा, फिर क्या हुआ ?
करभक ।—तब आज्ञाभङ्ग से रुष्ट हो कर चन्द्रगुप्त ने आप की बड़ी प्रशंसा की और दुष्ट चाणक्य से अधिकार ले लिया ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! देखो प्रशंसा कर के राक्षस मे चन्द्रगुप्त ने अपनी भक्ति दिखायी ।
भागुरायण ।—गुण प्रशंसा से बढ़ कर चाणक्य का अधिकार लेने से ।
चतुर्थ अङ्क । ६५
चतुर्थ अङ्क । ६५
राक्षस ।—क्यों जी, एक कौमुदीमहोत्सव के निषेध ही से
चाणक्य चन्द्रगुप्त मे बिगाड़ हुआ कि कोई और
कारण भी है ?
मलयकेतु ।—क्यों मित्र भागुरायण ! अब और बेर मे यह
क्या फल निकालैंगे ? ५
भागुरायण ।—यह फल निकाला है कि चाणक्य बड़ा बुद्धि-
मान् है, वह व्यर्थ चन्द्रगुप्त को क्रोधित न करावैगा और
चन्द्रगुप्त भी उस की बातै जानता है, वह भी बिना बात
चाणक्य का ऐसा अपमान न करैगा, इससे उन लोगों
मे बहुत झगड़े से जो बिगाड़ होगा तो पक्का होगा । १०
करभक ।—आर्य्य ! और भी कई कारण है ।
राक्षस ! कौन ?
करभक ।—कि जब पहिले यहा से राक्षस और कुमार मलय-
केतु भागे तब उस ने क्यों नही पकड़ा ?
राक्षस ।—( हर्ष से ) मित्र शकटदास ! अब तो चन्द्रगुप्त १५
हाथ मे आ जायगा ।
शकटदास ।—अब चन्दनदास छूटैगा, और आप कुटुम्ब से
मिलगे, वैसे ही जीवसिद्धि इत्यादि लोग क्लेश से छूटैंगे ।
भागुरायण । ( आप ही आप ) हा, अवश्य जीवसिद्धि
का क्लेश छूटा । २०
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! अब मेरे हाथ चन्द्रगुप्त
आवैगा, इस मे इन का क्या अभिप्राय है ?
भागुरायण ।—और क्या होगा ? यही होगा कि यह चाणक्य
से छूटे चन्द्रगुप्त के उद्धार का समय देखते हैं *
* राक्षस ने तो 'चन्द्रगुप्त हाथ में आवैगा' इस आशय से कहा था कि चन्द्रगुप्त जीता जायगा पर भागुरायण ने भेद कराने को मलयकेतु को उस का उलटा अर्थ समझाया ।
६६ मुद्राराक्षस-
राक्षस ।-अजी, अब अधिकार छिन जाने पर वह ब्राह्मण कहां है ?
करभक ।-अभी तो पटने ही में है ।
राक्षस ।-( घबडा कर ) हैं ! अभी वहीं है ? तपोबन नहीं चला गया ? या फिर कोई प्रतिज्ञा नहीं की ?
करभक । - अब तपोबन जायगा -ऐसा सुनते हैं ।
राक्षस । -(घबडा कर ) शकटदास, यह बात तो काम की नहीं,
देव नन्द को नहि गन्यो जिन भीतर अपमान ।
सो निज कृत नृप चन्द की बात न सहिहै जान ॥
१० मलयकेतु । मित्र भागुरायण ! चाणक्य के तपोबन जाने वा फिर प्रतिज्ञा करने से कौन कार्यसिद्धि निकाली है ?
भागुरायण ।-कुमार ! यह तो कोई कठिन बात नहीं है, इस का आशय तो स्पष्ट ही है कि चन्द्रगुप्त से जितनी दूर चाणक्य रहेगा उतनी ही कार्यसिद्धि होगी ।
१५ शकटदास । अमात्य ! आप व्यर्थ सोच न करें, क्योंकि देखें
सबहि भाँति अधिकार लहि, अभिमानी नृप चन्द ।
नहि सहिहै अपमान अब, राजा होइ स्वच्छन्द ॥
तिमि चाणक्यहु पाइ दुख एक प्रतिज्ञा पारि ।
अब दूजो करिहै न कछु उद्यम निज मद चूरि ॥
२० राक्षस । - ऐसाही होगा । मित्र शकटदास ! जाकर करभक को डेरा इत्यादि दो ।
शकटदास ।-जो आज्ञा ।
( करभक को लेकर जाता है )
राक्षस ।-इस समय कुमार से मिलने की इच्छा है ।
२५ मलयकेतु ।-(आगे बढ कर ) मै आप ही आप से मिलने को आया हूँ ।
चतुर्थ अङ्क । ६७
चतुर्थ अङ्क । ६७
राक्षस ।- (स भ्रम से उठ कर ) अरे कुमार आप ही आ गए !
आइए, इस आसन पर बैठिए ।
मलयकेतु ।—मैं बैठता हूँ आप विराजिए ।
( दोनों बैठते हैं )
मलयकेतु ।—इस समय सिर की पीड़ा कैसी है ? ५
राक्षस ।—जब तक कुमार के बदले महाराज कह कर आप
को नही पुकार सकते तब तक यह पीड़ा कैसे छूटेगी *।
मलयकेतु ।—आप ने जो प्रतिज्ञा की है तो सब कुछ होईगा ।
परन्तु सब सेना सामन्त के होते भी अब आप किस बात
का आसरा देखते हैं ? १०
राक्षस ।—किसी बात की नही, अब चढ़ाई कीजिए ।
मलयकेतु ।—अमात्य ! क्या इस समय शत्रु किसी सङ्कट
में है ?
राक्षस ।—बड़े ।
मलयकेतु ।—किस सङ्कट में ? १५
राक्षस ।—मन्त्रीसङ्कट में ।
मलयकेतु ।—मन्त्रीसङ्कट तो कोई सङ्कट नही है ।
राक्षस ।—और किसी राजा को न हो तो न हो, पर चन्द्रगुप्त
का तो अवश्य है ।
मलयकेतु ।—आर्य्य ! मेरी जान में चन्द्रगुप्त को और भी २०
नहीं है ।
राक्षस ।—आप ने कैसे जाना कि चन्द्रगुप्त को मन्त्रीसङ्कट
सङ्कट नही है ?
मलयकेतु ।—क्योंकि चन्द्रगुप्त के लोग तो चाणक्य के कारण
उस से उदास रहते हैं, जब चाणक्य ही न रहेगा तब २५
उस के सब कामों को लोग और भी सन्तोष से करेंगे ।
* अर्थात् - द्रगुप्त को जीत कर जब आप को महाराज बना लेगे तब स्वस्थ होगे ।
६८ मुद्राराक्षस-
राक्षस ।—कुमार, ऐसा नही है, क्योंकि यहा दो प्रकार
के लोग हैं—एक चन्द्रगुप्त के साथी, दूसरे नन्दकुल के
मित्र, उन मे जो चन्द्रगुप्त के साथी हैं उन को चाणक्य
ही से दुख या कुछ नन्दकुल के मित्रों को नही, क्योकि
५ वह लोग तो यही सोचते है कि इसी कृतघ्न चन्द्रगुप्त ने
राज के लोभ से अपना पितृकुल नाश किया है, पर क्या
करें उन का कोई आश्रय नही है इस से चन्द्रगुप्त
के आसरे पडे है, जिस दिन आप को शत्रु के नाश
म और अपने पक्ष के उद्धार में समर्थ देखेंगे उसी दिन
१० चन्द्रगुप्त को छोड कर आप से मिल जायंगे, इस के
उदाहरण हमी लोग हैं ।
मलयकेतु ।- आर्य्य । चन्द्रगुप्त के हाग्ने का एक यही कारण
है कि कोई और भी है ?
राक्षस ।—और बहुत क्या होंगे एक यही बडा भारी ह ।
१५ मलयकेतु ।—क्यों आर्य्य । यही क्या प्रधान है ? क्या चन्द्र
गुप्त और मन्त्रियों से आप अपना काम करने मे असमर्थ
है ?
राक्षस ।—निरा असमर्थ है ।
मलयकेतु ।—क्यो ?
२० राक्षस ।—यों कि जो आप राज्य सम्भालते हैं या जिन का
राज राजा और मन्त्री दोनों करते हैं वह राजा ऐसे हों
तो हो, परन्तु चन्द्रगुप्त तो कदापि ऐसा नही है । चन्द्रगुप्त
एक तो दुरात्मा है दूसरे वह तो सचिव ही के भरोसे सब
काम करता है, इस से वह कुछ व्यवहार जानता ही नही
२५ तो फिर वह सब काम कैसे कर सकता है ? क्योंकि—
लक्ष्मी करत निवास अति, प्रबल सचिव नृप पाय ।
वै निज बाल-सुभाव सों, इकहि तजत अकुलाय ॥
चतुर्थ अङ्क । ६६
चतुर्थ अङ्क । ६६
और भी—
जो नृप बालक सो रहत, सदा सचिव के गोद ।
बिन कछु जग देखे सुने, सो नहि पावत मोद ॥
मलयकेतु ।—( आप ही आप ) तो हम अच्छे हैं, कि सचिव के अधिकार में नहीं ( प्रकाश ) अमात्य ! यद्यपि यह [५]
ठीक है तथापि जहा शत्रु के अनेक छिद्र हैं तहा एक इसी सिद्धि से सब काम न निकलैगा ।
**राक्षस ।—**कुमार के सब काम इसी से सिद्ध होंगे । देखिए,
चाणक्य को अधिकार छूट्यौ चन्दू है राजा नए ।
पुर नन्द में अनुरक्त तुम निज बल सहित चढते भए ॥ [१०]
जब आप हम—( कह कर लज्जा से कुछ ठहर जाता है )
तुव बस सकल उद्यम सहित रन मति करी ।
वह कौन सी नृप ! बात जो नहि सिद्धि ह्वै है ता घरी ॥
**मलयकेतु ।—**अमात्य ! जो अब आप ऐसा लड़ाई का समय देखते हैं तो देर कर के क्यों बैठे हैं ? देखिए— [१५]
इन को ऊंचो सीस है, बाको उच्च करार ।
श्याम दोऊ वह जल श्रवत, ये गण्डन मधु धार ॥
उते भँवर को शब्द इत, भँवर करत गुजार ।
निज सम तेहि लखि नास्ति हैं, दन्तन तोरि कुठार ॥
सीस सोन सिन्दूर सों, ते मतङ्ग बल दाप । [२०]
सोन सहज ही सोखि हैं, निश्चय जानहु आप ॥*
और भी ।
गरजि गरजि गभीर रव, बरसि बरसि मधुधार ।
सत्रु नगर गज घेरिहैं, घन जिमि बिबुध पहार ॥
(शस्त्र उठाकर भागुरायण के साथ जाता है) [२५]
* पटना घेरने में सोन उतर कर जाना था ।
१०० मुद्राराक्षस-
राक्षस। —कोई है?
[ प्रियम्बदक आता है ]
प्रियम्बदक। —आज्ञा !
राक्षस। —देख तो द्वार पर कौन भिक्षुक खड़ा है?
५ प्रियम्बदक। —जो आज्ञा [ बाहर जा कर फिर आता है
अमात्य ! एक क्षपणक भिक्षुक।
राक्षस। —( असगुन जान कर आप ही आप ) पहिले ही
क्षपणक का दर्शन हुआ।
प्रियम्बदक। —जीवसिद्धि नाम।
१० राक्षस। —अच्छा, बोलाकर ले आ।
प्रियम्बदक। —जो आज्ञा ( जाता है )
( क्षपणक आता है )
क्षपण। — पहिले कटु परिणाम मधु औषध सम उपदेस।
मोह व्याधि के वैद्य गुरु, तिनको सुनहु अदेस ॥
[ पास जाकर ] उपासक ! धर्म लाभ हो !
१५ राक्षस — जोतिषी जी, बताओ, अब हम लोग प्रस्थान किस
दिन करें ?
क्षपणक। —( कुछ सोच कर ) उपासक ! मुहूर्त्त तो देखा।
आज भद्रा तो पहर पहिले ही छूट गई है और तिथि भी
सम्पूर्णचन्द्रा पौर्णमासी है और आप लोगों को उत्तर से
२० दक्षिण जाना है और नक्षत्र भी दक्षिण ही है।
अथ ये सूरहि चन्द के, उदये गमन प्रशस्त ।*
पाइ लगन बुध केतु तौ, उदयो हू भो अस्त ॥
* भद्रा छूट गई अर्थात कल्याण को तो आप न जब चन्द्रगुप्त का पक्ष छोड़ा तभी छोड़ा और संपूर्ण चन्द्रा पौर्णमासी है अर्थात चन्द्रगुप्त का प्रताप पूर्ण व्याप्त है। उत्तर नाम प्राधान्य पक्ष छोड़ कर दक्षिण अर्थात् यम की दिशा को जाना है। नक्षत्र दक्षिण है अर्थात् आपका बाम ( विरुद्ध पक्ष ) नक्षत्र और आप का दक्षिण पक्ष [ मलयकेतु ] नक्षत्र [ बिना छत्र के ] है। अथए इत्यादि, तुम जो सूर हो उसकी
चतुर्थ अङ्क । २०१
चतुर्थ अङ्क । २०१
राक्षस ।—अजी, पहिले तो तिथि ही नही शुद्ध है ।
क्षपणक ।— उपासक !
एक गुनी तिथि होत है, त्यौं चौगुन नक्षत्र ।
लगन होत चौतिस गुनो, यह भाखत सब पञ्ज ॥
लगन होत ह शुभ लगन, छोड़ि क्रूर ग्रह एक ।
जाहु चन्द्र बल देखि कै, पावहु लाभ अनेक ॥ ×
राक्षस ।—अजी, तुम और जोतिषियों से जा कर झगड़ो ॥
क्षपणक ।—आप ही झगड़िये, मै जाता हूं ।
राक्षस ।—क्या आप रूस तो नही गए ?
क्षपणक ।—नही, तुम से जोतिषी नही रूसा है । १०
राक्षस ।—तो कौन रूसा है ?
क्षपणक ।—(आप ही आप ) भगवान्, कि तुम अपना पक्ष
छोड़ कर शत्रु का पक्ष ले बैठे हो ( जाता है ) ।
राक्षस ।—प्रियम्वदक ! देख तो कौन समय है ।
प्रियम्वदक ।—जो आज्ञा ( बाहर से हो आता है ) आर्य्य ! १५
सूर्यास्त होता है ।
बुद्धि क अस्त के समय और चन्द्रगुप्त के उदय के समय जाना अच्छा है अर्थात् चाणक्य की ऐसे समय में जय होगी । लग्न अर्थात् कारण भाव में बुध चाणक्य पड़ा है इससे कतु अर्थात् मलयकेतु का उदय भी है तो भी अस्त ही होगा । अर्थात् इस युद्ध में चन्द्रगुप्त जीतेगा और मलयकेतु हारेगा । सूर अथए—इस पद से जीवसिद्धि, ने अमंगल भी किया । आश्विन पूर्णिमा तिथि, भरणी नक्षत्र, गुरुवार, मेष के चन्द्रमा मीन लग्न में उस ने यात्रा बतलायी । इस में भरणी नक्षत्र गुरुवार, पूर्णिमा तिथि यह सब दक्षिण की यात्रा में निषिद्ध हैं । फिर सूर्य्य मृत है चन्द्र जीवित है यह भी बुरा है । लग्न में मीन का बुध पड़ने से नीच का होने से बुरा है । यात्रा में नक्षत्र दक्षिण होने ही से बुरा है ।
× अर्थात् मलयकेतु का साथ छोड़ े तो तुम्हारा भला हो। वास्तव में चाणक्य के मित्र होने से जीवसिद्धि ने साहत भी उलटी दी । ज्योतिष के अनुसार अत्यन्त क्रूर वेला, क्रूर ग्रह वेध में युद्ध आरम्भ होना चाहिये । उसके विरुद्ध सौम्य समय में युद्धयात्रा कही, जिसका फल पराजय है ।
१०२ मुद्राराक्षस—
राक्षस ।—( आसन से उठ कर और देख कर ) अहा !
भगवान् सूर्य्य अस्ताचल को चले—
जब सूरज उदयो प्रबल, तेज धारि आकास ।
ता उपबन तरुवर सबै, छायाजुत* भे पास ॥
दूर परे ते तरु सबै, अस्त भये रवि ताप ।
जिमि धन बिन स्वामिहि तजै, भृत्य स्वारथी आप ॥
( दोनों जाते है )
इति चतुर्थोऽङ्क ।
* छाया के साथ ।
पंचम अंक
( हाथ मे मोहर, गहने की पेटी और पत्र लेकर सिद्धार्थक आता है )
सिद्धार्थक।— अहाहा !
देशकाल के कलश से, सिंची बुद्धि-जल जौन।
लता नीति चाणक्य की, बहु फल दैहै तौन ॥ ५
अमात्य राक्षस के मोहर का, आर्य्य चाणक्य का लिखा हुआ यह लेख और मोहर तथा यह आभूषण की पेटिका लेकर मै पटने जाता हूं ( नेपथ्य की ओर देख कर ) अरे ! यह क्या क्षपणक आता है ? हाय हाय ! यह तो बुरा असगुन हुआ। तो मै सूरज को देख कर इस का दोष छुड़ा लूं। १०
( क्षपणक आता है )
क्षपणक।— नमो नमो अर्हन्त कों, जे। निज बुद्धि प्रताप ।
लोकोत्तर की सिद्धि सब, करत हस्तगत आप ॥
सिद्धार्थक।— भदन्त ! प्रणाम ।
क्षपणक।— उपासक ! धर्म्म लाभ हो ( भली भांति देख १५ कर ) आज तो समुद्र पार होने का बड़ा भारी उद्योग कर रक्खा है।
सिद्धार्थक।— भदन्त ! तुम ने कैसे जाना ?
क्षपणक।— इस मे छिपी कौन बात है ? जैसे समुद्र मे नाव पर सब के आगे मार्ग दिखानेवाला मांझी रहता है, वैसे २० ही तेरे हाथ मे यह लखौटा है।
सिद्धार्थक।— अजी भदन्त ! भला यह तुम ने ठीक जाना कि मैं परदेश जाता हूं, पर यह कहो कि आज दिन कैसा है ?
१०८ मुद्राराक्षस-
क्षपणक ।—(हस कर) वाह श्रावक वाह ! तुम मूड मुंड
कर भा नक्षत्र पूछते हो ?
सिद्धार्थक ।—भला अब क्या बिगडा है ? कहते क्यों नही
दिन अच्छा होगा जायगे, न अच्छा होगा फिर आवेंगे।
५ क्षपणक ।—चाहे दिन अच्छा हो या न अच्छा हो, मलयके
के कटक से बिना मोहर भए कोई जाने नही पाता।
सिद्धार्थक ।—यह नियम कब से हुआ ?
क्षपणक ।—सुनो, पहिले तो कुछ भी रोक टोक नही थी
पर जब से कुसुमपुर के पास आए है तब से यह नियम
१० हुआ है कि बिना मोहर के न कोई जाय न आवै । इस
से जो तुम्हारे पास भागुरायण का मोहर हो तो जाओ
नही तो चुप बेठ रहो, क्योंकि पीछे से तुम्हें हाथ पैर
बधवाना पड़ै ।
सिद्धार्थक ।—क्या यह तुम नही जानते कि हम राक्षस के
१५ अन्तरङ्ग खेलाडी मित्र हैं ? हमें कौन रोक सकता है ?
क्षपणक ।—चाहे राक्षस के मित्र हो चाहे पिशाच के, बिन
मोहर के कभी न जाने पाओगे।
सिद्धार्थक ।—भदन्त ! क्रोध मत करो, कहो कि का
सिद्ध हो।
२० क्षपणक ।—जाओ, काम सिद्ध होगा, हम भी पटने जाने
हेतु मलयकेतु से मोहर लेने जाते हैं।
(दोनों जाते हैं)
॥ इति प्रवेशक ॥
(भागुरायण और सेवक आते हैं)
२५ भागुरायण ।—(आपही आप) चाणक्य की नीति भी बह
विचित्र है।
पंचम अङ्क । १०५
कहूं बिरल कहु सघन कहु , विफल कहूं फलवान ।
कहु कृस, कहु अति थूल कछु, भेद परत नहि जान ॥
कहूं गुप्त अति ही रहत, कबहूं प्रगट लखात ।
कठिन नीति चाणक्य की, भेद न जान्यो जात ॥
(प्रगट) भासुरक ! मलयकेतु से मुझे क्षण भर भी दूर रहने ५
में दु ख होता है इस से यही बिछौना बिछा तो बैठें ।
सेवक । जो आज्ञा -- बिछौना बिछा है, विराजिए ।
भागुरायण ।—( आसन पर बैठ कर ) भासुरक ! बाहर कोई
मुझ से मिलने आवे तो आने देना ।
सेवक ।—जो आज्ञा ( जाता है ) । १०
भागुरायण ।—( आप ही आप करुणा से ) राम राम ! मल-
यकेतु तो मुझ से इतना प्रेम करता है, मैं उस का बिगाड़
किस तरह करूं गा ? अथवा—
जस कुल तजि अपमान सहि, धन हित परबस होय ।
जिन बेच्यो निज प्रान तन, सबै सकत करि सोय ॥ १५
( आगे आगे मलयकेतु और पीछे प्रतिहारी आते हैं )
मलयकेतु ।—( आप ही आप ) क्या करें राक्षस का चित्त
मेरी ओर से कैसा है यह सोचते हैं तो अनेक प्रकार के
विकल्प उठते हैं, कुछ निर्णय नहीं होता ।
नन्दवंश को जानि के, ताहि चन्द्र की चाह । २०
कै अपनायो जानि निज, मेरो करत निबाह ॥
को हित अनहित तासु को, यह नहि जान्यो जात ।
तासों जिय सन्देह अति, भेद न कछू लखात ॥
[ प्रगट ] विजये ! भागुरायण कहां हैं देख तो ?
प्रतिहारी ।-महाराज ! भागुरायण वह बैठे हुए आप की २५
सेना के जाने वाले लोगों को राहखर्च और परवाना बाट
रहे हैं ।
१०६ मुद्राराक्षस-
मलयकेतु ।—विजये ! तुम दबे पाव से उधर से आओ, मै
पीछे से जाकर मित्र भागुरायण की आखें बन्द
करता हूं ।
प्रतिहारी ।—जो आज्ञा ।
५ [दोनों दबे पाव से चलते है और भासुरक आता है]
भासुरक ।—[ भागुरायण से ] बाहर क्षपणक आया है, उस
को परवाना चाहिए ।
भागुरायण ।—अच्छा, यहा भेज दो ।
भासुरक ।—जो आज्ञा [ जाता है ] ।
१० [ क्षपणक आता है ]
क्षपणक ।—श्रावक को धर्म लाभ हो !
भागुरायण ।—[छल से उसकी ओर देख कर] यह तो राक्षस
का मित्र जीवसिद्धि है [ प्रगट ] भदन्त ! तुम नगर में
राक्षस के किसी काम से जाते होगे ।
१५ क्षपणक ।—[कान पर हाथ रख कर छी छी ! हम से राक्षस
वा पिशाच से क्या काम ?
भागुरायण ।—आज तुम से और मित्र से कुछ प्रेम कलह हुआ
है, पर यह तो बताओ कि राक्षस ने तुम्हारा कौन
अपराध किया है ?
२० क्षपणक ।—राक्षस ने कुछ अपराध नही किया है, अपराधी
तो हम है ।
भागुरायण ।—ह ह ह ह ! भदन्त ! तुम्हारे इस कहने से
तो मुझ को सुनने की और भी उत्कण्ठा होती है ।
मलयकेतु ।—( आप ही आप ) मुझ को भी ।
२५ भागुरायण ।—तो भदन्त ! कहते क्यो नही ?
क्षपणक । तुम सुन के क्या करोगे ?
भागुरायण ।—तो जाने दो, हमैं कुछ आग्रह नही है, गुप्त हो
तो मत कहो ।
पंचम अङ्क । १०७
पणक ।—नहो उपासक ! गुप्त ऐसा नही है, पर वह बहुत बुरी बात है।
भागुरायण ।—तो जाओ, हम तुम को परवाना न देंगे।
ज्ञपणक ।—( आप ही आप की भांति ) जो यह इतना आग्रह ५ करता है तो कह दे (प्रत्यक्ष ) श्रावक ! निरुपाय हो कर कहना पड़ा। सुनो—मै पहिले कुसुमपुर मे रहता था, तब संयोग से मुझ से राक्षस से मित्रता हो गई, फिर उस दुष्ट राक्षस ने चुपचाप मेरे द्वारा विषकन्या का प्रयोग करा के बिचारे पर्व्वतेश्वर को मार डाला।
मलयकेतु ।—'आखों में पानी भर के) हाय हाय ! राक्षस ने १० हमारे पिता को मारा, चाणक्य ने नही मारा। हा !
भागुरायण ।—हां, तो फिर क्या हुआ ?
क्षपणक ।—फिर मुझे राक्षस का मित्र जान कर उस दुष्ट चाणक्य ने मुझ को नगर से निकाल दिया, तब मैं राक्षस के यहा आया, पर राक्षस ऐसा जालिया है कि अब मुझ १५ को ऐसा काम करने कहता है जिस से मेरा प्राण जाय।
भागुरायण ।—भदन्त ! हम तो यह समझते है कि पहिले जो आधा राज देने कहा था, वह न देने को चाणक्य ही ने यह दुष्ट कर्म्म किया, राक्षस ने नही किया।
क्षपणक ।—(कान पर हाथ रख कर ) कभी नही, चाणक्य तो २० विषकन्या का नाम भी नही जानता, यह घोर कर्म्म उस दुर्बुद्धि राक्षस ही ने किया है।
भागुरायण ।—हाय हाय ! बड़े कष्ट की बात है। लो, मुहर तो तुम को देते हैं, पर कुमार को भी यह बात सुना दो।
मलयकेतु ।—(आगे बढ़ कर ) २५
सुन्यो मित्र, श्रुति भेद कर, शत्रु कियौ जो हाल।
पिता मरन को मोहि दुख, दुगुन भयो एहि काल ॥
१०८ मुद्राराक्षस—
क्षपणक।—(आप ही आप) मलयकेतु दुष्ट ने यह बात सुन लिया तो मेरा काम हो गया (जाता है)।
मलयकेतु।—(दात पीस कर ऊपर देख कर) अरे राक्षस !
५ जिन तोपै विश्वास करि, सौप्यौ सब धन धाम।
ताहि मारि दुख दै सबन, साचो किय निज नाम ॥
भागुरायण।—(आप ही आप) आर्य चाणक्य की आज्ञा है कि “अमात्य राक्षस के प्राण की सर्वथा रक्षा करना” इस से अब बात फेरैं। (प्रकाश) कुमार ! इतना आवेग मत कीजिये। आप आसन पर बैठिए तौ मैं कुछ निवेदन करू।
१० मलयकेतु।—मित्र क्या कहते हो? कहो (बैठजाता है)।
भागुरायण।—कुमार ! बात यह है कि अर्थशास्त्रवालों की मित्रता और शत्रुता अर्थ ही के अनुसार होती है, साधारण लोगों की भांति इच्छानुसार नही होती। उस समय सर्वार्थसिद्धि को राक्षस राजा बनाया चाहता था तब देव पर्व्वतेश्वर ही इस कार्य में कटक थे तो उस कार्य की सिद्धि के हेतु यदि राक्षस ने ऐसा किया तो कुछ दोष नही। आप देखिए—
मित्र शत्रु ह्वै जात हैं, शत्रु करहि अति नेह।
अर्थ नीति बस लोग सब, बदलहि मानहु देह॥
२० इस से राक्षस को ऐसी अवस्था मे दोष नही देना चाहिये। और जब तक नन्दराज्य न मिलै तब तक उस पर प्रकट स्नेह ही रखना नीति सिद्ध है, राज मिलने पर कुमार जो चाहैंगे करेंगे।
मलयकेतु।—मित्र ! ऐसा ही होगा। तुम ने बहुत ठीक सोचा
२५ है। इस समय इस के वध करने से प्रजागण उदास हो जायगे और ऐसा होने से जय में भी सन्देह होगा।
(एक मनुष्य आता है)
पंचम अङ्क । १०६
मनुष्य ।—कुमार की जय हो ! कुमार के कटकद्वार के रक्षा-
धिकारी दीर्घचक्षु ने निवेदन किया है कि ‘मुद्रा लिये
बिना एक पुरुष कुछ पत्र सहित पकड़ा गया है सो उस को
एक बेर आप देख ले ।’
भागुरायण । अच्छा, उस को ले आओ । ५
पुरुष ।—जो आज्ञा ।
(जाता है और हाथ बंधे हुए सिद्धार्थक को लेकर आता है)
सिद्धार्थक । ( आप ही आप )
गुन पै रिझवत, दोस सों, दूर बचावत जौन ।
स्वामि भक्ति जननी लखिस, प्रनमत नित हम तौन ॥ १०
पुरुष ।—( हाथ जोड़ कर ) कुमार ! यहाँ मनुष्य है।
भागुरायण ।-( अच्छी तरह देख कर ) यह क्या बाहर का
मनुष्य है या यही किसी का नौकर है ?
सिद्धार्थक ।—मैं अमात्य राक्षस का पासवर्ती सेवक हूं ।
भागुरायण ।—तो तुम क्यों मुद्रा लिये बिना कटक के बाहर १५
जाते थे ?
सिद्धार्थक ।—आर्य्य ! काम की जल्दी से ।
भागुरायण ।—ऐसा कौन काम है जिस के आगे राजाज्ञा को
भी कुछ मोल नहीं गिना ?
सिद्धार्थक ।—( भागुरायण के हाथ मे लेख देता है ) । २०
भागुरायण । -( लेख लेकर देख कर ) कुमार ! इस लेख
पर अमात्य राक्षस की मुहर है ।
मलयकेतु ।—ऐसी तरह से खोल कर दो कि मुहर न टूटे ।
भागुरायण ।—( पत्र खोल कर मलयकेतु को देता है) ।
मलयकेतु ।—( पढ़ता है ) स्वस्ति । यथा स्थान में कहीं से २५
कोई किसी पुरुष विशेष को कहता है । हमारे विपत्त
को निराकरण कर के सच्चे मनुष्य ने सचाई दिखलाई ।
११०
मुद्राराक्षस-
अब हमारे पहिले के रक्खे हुए हमारे हितकारी वरो
को भी जो जो देने को कहा था वह देकर प्रसन्न
करना। यह लोग प्रसन्न होगे तो अपना आश्रय छूट
जाने पर सब भांति अपने उपकारी की सेवा करेंगे।
सच्चे लोग कही नही भूलते तो भी हम स्मरण कराते
है। इन मे से कोई तो शत्रु का कोष और हाथी चाहते हैं
और कोई राज चाहते है। हम को सत्यवादी ने जो तीन
अलङ्कार भेजे सो मिले। हम ने भी लेख अशून्य करने को
कुछ भेजा है सो लेना। और जबानी हमारे अत्यन्त
१० प्रामाणिक सिद्धार्थक से सुन लेना * ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! इस लेख का आशय क्या है ?
भागुरायण ।—भद्र सिद्धार्थक ! यह लेख किस का है ?
सिद्धार्थक ।—आर्य्य ! मै नही जानता ।
भागुरायण ।—धूर्त ! लेख लेकर जाता है और यह नही
१५ जानता कि किसने लिखा है, और संदेसा किस
से कहैगा ?
सिद्धार्थक ।—( डरते हुए की भांति ) आप से।
भागुरायण ।—क्यों रे ! हम से ?
सिद्धार्थक ।—आप ने पकड़ लिया। हम कुछ नही जानते
२० कि क्या बात है।
भागुरायण ।—( क्रोध से ) अब जानैगा । भद्र भासुरक !
इस को बाहर ले जाकर जब तक यह सब कुछ न बतलावे
तब तक खूब मारो।
पुरुष ।—जो आज्ञा ( सिद्धार्थक को बाहर ले कर जाता है
२५ और हाथ मे एक पेटी लिए फिर आता है ) आर्य्य !
* यह वही लेख है जिस को चाणक्य ने शकटदास से धोखा देकर लिखवाया था और अपने हाथ से राक्षस की मुहर उस पर करके सिद्धार्थक को दिया थ ।