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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 89 of 173

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Page 89

६२ मुद्राराक्षस -

जे रहे धावत ठिठकि ते, गज मूक घण्टा सह सधे ।
मरजाद तुव नहिं तजहि नृपगण, जलधि से मानहु बँधे ।

मलयकेतु ।—अजी जाजले ! तुम भी सब लोगों को लेकर जाओ, एक केवल भागुरायण मेरे संग रहे ।
५ कचुकी ।—जो आज्ञा (सब को लेकर जाता है ) ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! जब मैं यहां आता था तो भद्रभट प्रभृति लोगों ने मुझ से निवेदन किया कि “हम राक्षस मन्त्री के द्वारा कुमार के पास नहीं रहना चाहते, कुमार के सेनापति शिखरसेन के द्वारा रहेंगे । दुष्ट मन्त्री १० ही के डर से तो चन्द्रगुप्त को छोड़ कर यहां सब बात का सुभीता जान कर कुमार का आश्रय लिया है ।” सो उन लोगों की बात का मैं ने आशय नहीं समझा ।*
भागुरायण ।—कुमार ! यह तो ठीक ही है क्योंकि अपने कल्याण के हेतु सब लोग स्वामी का आश्रय हित और १५ प्रिय के द्वारा करते हैं ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! तो फिर राक्षस मन्त्री तो हम लोगों का परमप्रिय और बड़ा हित है ।
भागुरायण ।—ठीक है, पर बात यह है कि अमात्य राक्षस का बैर चाणक्य से है, कुछ चन्द्रगुप्त से नहीं है, इस से जो २० चाणक्य की बातों से रूठ कर चन्द्रगुप्त उन से मन्त्री का काम ले ले और नन्दकुल की भक्ति से “यह नन्द ही के वश का है” यह सोच कर राक्षस चन्द्रगुप्त से मिल जाय और चन्द्रगुप्त भी अपने बड़े लोगों का पुराना मन्त्री समझ कर उस को मिला ले, तो ऐसा न हो कि कुमार हम लोगों पर भी विश्वास न करें ।
२५


* चाणक्य के मन्त्रणी से लगाने मलयकेतु से ऐसा कहा था ।