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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 91 of 173

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Page 91

६४ मुद्राराक्षस—

राक्षस ।—तब ?
करभक ।—इस के पीछे नन्दकुल के विनाश से दु खी लोगो का जी बहलाने के हेतु चन्द्रगुप्त ने कुसुमपुर मे कौमुदी-महोत्सव होने की डौंडी पिटा दी और उस को बहुत दिन से बिछुडे हुए मित्रों के मिलाप की भांति पुर के निवासियोँ ने बडी प्रसन्नतापूर्वक स्नेह से मान लिया ।
राक्षस ।—(आंसू भर कर) हा देव नन्द !

यद्यपि उदित कमुदन सहित, पाइ चादनी चान्द ।
तदपि न तुम बिन लसत हे, नृपससि ! जगदानन्द ॥

हा, फिर क्या हुआ ?
करभक ।—तब चाणक्य दुष्ट ने सब लोगों के नेत्र के परमानन्ददायक उस उत्सव को रोक दिया और उसी समय स्तनकलस ने ऐसे ऐसे श्लोक पढे कि राजा का भी मन फिर जाय ।
राक्षस ।—वाह मित्र स्तनकलस, वाह क्योँ न हो ! अच्छे समय में भेदबीज बोया है, फल अवश्य होगा । क्योँकि—

नृप रूठे अचरज कहा, सकल लोग जा सङ्ग ।
छोटे हू मानैँ बुरो परे रंग में भङ्ग ॥

मलयकेतु ।—ठीक हे (नृप रूठे यह दोहा फिर पढता है)
राक्षस ।—हा, फिर क्या हुआ ?
करभक ।—तब आज्ञाभङ्ग से रुष्ट हो कर चन्द्रगुप्त ने आप की बड़ी प्रशंसा की और दुष्ट चाणक्य से अधिकार ले लिया ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! देखो प्रशंसा कर के राक्षस मे चन्द्रगुप्त ने अपनी भक्ति दिखायी ।
भागुरायण ।—गुण प्रशंसा से बढ़ कर चाणक्य का अधिकार लेने से ।