मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
About this granth
Manhin Niranjan Sabai Nachaye (मनहिं निरंजन सबै नचाए, 'through the mind, Niranjan makes everyone dance') is a Hindi book by Satguru Madhu Paramhans Ji about the mind. In the teaching of the Sahib Bandgi path the mind is the power of Niranjan, or Kal, which keeps the soul bound to the world, and the title is drawn from a line expressing this. The first edition of 5,000 copies was published by the Sant Ashram, Ranjri (Jammu and Kashmir), in April 2011.
The book opens with the idea that one has no enemy but one's own mind. The author explains himself in everyday language and homely examples: the mind makes the soul dance as a street performer makes his monkey dance, and wild elephants are tamed by trapping them in a pit. The chapters move through the nature, forms, family and states of the mind, its rule over the three worlds, its running over the eight lotuses, its austerities, its 'incarnations' and its twelve sects, how to break its hold, and how it obstructs meditation.
It ends with sakhis and shabdas, a note from the congregation, and passages on Kabir Sahib and Niranjan.
जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरीरे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
कह रहे हैं कि यहाँ सब पर मौत का साया मण्डरा रहा है। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की आग लगी हुई है, जिसमें सारा संसार जल रहा है। इसलिए इस जलते हुए संसार को छोड़ और हमारे देश में चल।
यह पूरी दुनिया मन की है। मन इस संसार का राजा है,
इसलिए उसी की हुकूमत चल रही है।
जिसकी हुकूमत होती है, उसी का राज होता है, उसी का हुकूम चलता है। देखते हैं कि दुनिया में काल-पुरुष की हुकूमत चल रही है क्या? थोड़ा चिंतन करें तो लगेगा कि चल रही है। जिस भी पार्टी की सत्ता होती है, उसी का हुकूम चलता है। कैबिनेट में बड़े मनिस्टर होते हैं। बिजली के महकमें के लिए अलग मंत्री है, रक्षा के लिए अलग मंत्री है। लगता है कि पूरी हुकूमत चला रहे हैं। क्या इस तरह मन की हुकूमत हमारे अन्दर चल रही है? लग रहा है कि हम सबके अन्दर एक ऐसी सत्ता की हुकूमत चल रही है, जो हमेशा हमारे विरुद्ध चल रही है।
स्कूलों में सरकार की हुकूमत है। वो चाहें तो स्कूल 7 बजे खुलेंगे, वो चाहें तो 8 बजे खुलेंगे। इस तरह दुनिया में निरंजन की हुकूमत चल रही है। वो कैसे कर रहा है हुकूमत?
मनहिं निरंजन सब पर छाए ॥
उसकी ताकत है कि उसके हर आदेश का पालन होता है। आखिर कुछ जान सकते हैं कि कैसे चलता है? वो हरेक चीज़ करवा सकता है। कैसे? जैसे सी.एम. का शासन चल रहा है। मन की हुकूमत कैसे चलती है? यह ब्रेन को संदेश देता है। जितने भी मिनीस्टर हैं, सी.एम. के अधीन हैं। इस तरह मन के भी बड़े मिनीस्टर हैं। मन ने कहा कि फ़लाने को तमाचा मारो। यह आज्ञा कैसे पालन हुई? मन ने यह चीज़ बुद्धि को बताई। बुद्धि क्या है? यह बुद्धि भी मन है। उसने विचार किया कि गाली बकी थी इसने। बुद्धि ने क्रोध को बुलाया, कहा कि सुनो, यह
काम करना। गुस्से का मिनीस्टर है—क्रोध। संदेश दिया। उकसाना ज़रूरी था वहाँ। नहीं आता क्रोध तो नहीं मारना था। इनका कोई कसूर नहीं है। पुलिस वालों को आदेश मिला कि मारो तो उनका कसूर नहीं है, आदेश का पालन कर रहे हैं। इस तरह इनका कसूर नहीं है। इन्होंने आदेश माना। इसके भी एस.पी. हैं। इन्द्रियों पर देवता हैं; सब इसकी बात मान रहे हैं। मन ने कहा कि आम खाना है। हरेक बात का पालन होता है। मन ने कहा कि धन चाहिए। क्या कर रहा है? बॉस है, किनारे बैठकर नेटवर्क चला रहा है। माफिया है।
जीव के संग मन काल रहाई। अज्ञानी नर जानत नाहीं ॥
धन चाहिए। ऐसे नहीं आयेगा। बुद्धि ने लोभ को कहा—हाय पैसा, हाय पैसा। दिल में समा जायेगा। सरकार ने कहा कि फ़लाना काम करना है। सभी जुट जाते हैं कार्यकता। बुद्धि एक बार आदेश दे दे कि चाँटा मारना है, हाथ तैयार हो जायेंगे। यह काम हो जायेगा। पाँच चीज़ें विशिष्ट हैं। पाँचों इसमें बड़े मंत्री हैं। इनके सैकेट्री हैं, पूरा परिवार है। जो कहा, वो करना-ही-करना है, नहीं तो शांति नहीं है। चाहे-अनचाहे करना ही है, क्योंकि मन का आदेश है।
मोह आया। मोह का मिनीस्टर ब्रेन में बैठेगा, कहेगा कि बेटे के लिए यह कर, वो कर। आदमी सोचता है कि तारे तोड़ लाऊँ। मिनीस्टरों ने कार्यकर्ताओं को अधिकार दे रखे हैं। इस तरह इनके पास हथियार हैं, दिख नहीं रहे हैं।
मन जो चाहता है, वो करता है। यही दुश्मन बना देता है। इसकी तह में जायेंगे तो यह सेना बहुत है। मन की सेना बड़ी तगड़ी है।
जैसे सैकेट्री हैं, तहसीलदार हैं, कमीशनर हैं, थाना है, चौकियाँ हैं, फिर बाजारों में सिपाही खड़े हैं। पूरे एरिए को पकड़ा है। इस तरह मन तीन-लोक का राजा जो है। यह इसे सही में मिला है। पॉवर मिला है। काम, क्रोध आदि भी इसी के हैं।
मन का हर एक आदेश पालन किया जाता है। जो भी चाहता है,
करवा लेता है। इस मन की हुकूमत बहुत बड़ी है। मन एक संदेश देता है। सभी इंद्रियाँ इस आदेश का पालन करती हैं। मन के चार रूप हैं—मन, बुद्धि, चित और अहंकार। चारों ये मन के रूप हैं। यह बुद्धि आदेश देती है कि फ़लाने को तमाचे लगाने हैं तो हाथ, शरीर, आत्मा सभी उस मन की आज्ञा का अनुकरण करते हैं। मन के मिनीस्टर हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, दंभ। इनकी बड़ी सेना है। जैसे शासन संचालित होता है, ऐसे ही मन का पूरा नेटवर्क है। जो ऊपर से संदेश आया, नीचे तक सभी उस आदेश का पालन करते हैं। इस तरह मन के आदेश का सभी पालन करते हैं। उदाहरण के लिए बुद्धि ने कहा कि इसने हमें अच्छा नहीं कहा, इसे मारो। तो आदेश देती है। हाथ मारने के लिए तेज़ी से चल पड़ते हैं। फिर यह काम कैसे होता है? क्रोध के साथ हिंसा भी आ जाती है। हिंसा क्रोध की पत्नी है। अविचार उसका पुत्र है और घृणी उसकी बहू है। परिवार इतना खतरनाक है। हिंसा रानी कहती है कि मज़ा आ रहा है, मारो। इतना आनन्द आता है कि विवेक नहीं होता है। अविचार उसका पुत्र है। जब भी क्रोध आता है लगता है कि शांति तभी मिलेगी, जब मारेंगे। गुस्से में कभी गाली बकता है। शांति के लिए बकता है। सकून मिलता है। यह कैसा सकून था कि किसी को चोट पहुँचाने से शांति मिली! यह हिंसा क्रोध की पत्नी थी। तब अविचार भी आ जाता है, कुछ नहीं सोचने देता है। वो कहता है कि लगे रहो। फिर घृणा आ जाती है। परिवार खतरनाक है। देखते हैं तो हरेक इंसान में ये चीज़ें मिल रही हैं। इसका मतलब है कि मन का नेटवर्क बहुत बड़ा है। साहिब ऐसे ही नहीं कह रहे—
तीन लोक में मनहिं विराजी। ताहि न चीहृत पंडित काजी ॥
<!-- image: Decorative floral separator -->अष्ट कमल पर मन धाए
अष्टदल कमल पर मन धाए
हरेक इंसान के अन्दर काल-पुरुष का एक नेटवर्क है। आपका चिंतन आपका नहीं है। हरेक इंसान के अन्दर मन के आठ बैंड हैं, अष्टदल कमल हैं। हृदय में आठ कोष्ठक हैं। वहाँ पर बीच में मन रहता है। एक बार किसी ने कहा कि बड़ी उदासी है। कहा कि कारण नहीं जान पा रही हूँ। कहा कि कोई ऐसी घटना भी नहीं हुई है, पर फिर भी बड़ी उदास हूँ। कहा कि कारण पता नहीं चल रहा है। कहा कि किसी से बात करने की इच्छा भी नहीं हो रही है। मैंने कहा कि कारण है। यह हृदय के अष्ट कोष्ठक हैं। इनके बीच में मन रहता है।
उत्तर दल पर जब मन जाई। दया धर्म तब उर में आई॥
जितनी देर मन वहाँ बैठेगा, आदमी को भक्ति-भाव हृदय में आयेगा। यह खुद-ब-खुद होगा। इसका मतलब है कि इंसान का चिंतन भी अपना नहीं है; अपना स्वभाव भी नहीं है। बहुत ताकतवर चीजें अन्दर में बैठकर के अपना काम कर रही हैं। उतनी देर आपमें वही विचार रहेंगे। ये विचार क्यों उत्पन्न हुए? आदमी नहीं जान पा रहा है।
दक्षिण दल पर जब मन जाता। महालोभ तब उर में आता॥
दक्षिण के कोष्ठक में जब मन जाकर के बैठेगा, बड़ा गुस्सा आयेगा; बिना मतलब की बातों पर गुस्सा आयेगा। स्वभाव तेज़ रहेगा; लड़ाई करने की इच्छा होगी। अच्छा या बुरा स्वभाव आत्मा का नहीं है। यह सब मन का खेल है। आप किसी से झगड़ा कर बैठेंगे। आपका स्वभाव उखड़ा होगा। आपमें बहुत क्रोध होगा उस समय।
कई आदमी ऐसी अवस्था में कहते हैं कि भाई, अभी मेरा मूड
ठीक नहीं है; अभी बात नहीं करो। यह क्या है मूड? यह मन की स्थिति है।
पश्चिम दल पर जब मन जाई। विषय वासना उर में आई ॥
जब पश्चिम के कोष्ठक पर मन जाकर के बैठता है तो आदमी में बहुत वासना आयेगी, विषय-विकारों का चिंतन आयेगा, फ़िजूल-2 बातें, अगली-पिछली बातें याद आयेंगी। आप सोचने लग जायेंगे। पर आपको यह पता नहीं चलेगा कि आपमें ये विचार उत्पन्न क्यों हो रहे हैं। यह भी मन का खेल है। इसको बड़े बड़े ज्ञानी-ध्यानी नहीं देख पा रहे हैं।
पूर्व दल पर जब मन जाई। हँसी भाव तब उर में आई ॥
पूर्व के पते पर जब मन का निवास हो जाता है तो हँसने की इच्छा होगी। फ़िजूल बातों पर भी आप हँसेंगे। इधर-उधर की बातों पर हँसेंगे। बस, आपका मूड होगा कि हँसू, हँसू। कभी-कभी ऐसी अवस्था बन जाती है। किसी को चलते देखोगे, तो भी हँसी आ जायेगी। कभी-कभी आप आदमी को ऐसी अवस्था में देखकर पूछते हैं कि भाई, बात क्या है? क्यों हँस रहे हो? वो खुद नहीं जानता है कि क्यों हँस रहा है। क्योंकि मन पूर्व-दल पर जाकर बैठा है। इसलिए उतनी देर आपको हँसना-ही-हँसना है। बिना मतलब की बातों पर भी हँसना-ही-हँसना है। आपको हँसी आयेगी। आपका स्वभाव ऐसा बनेगा।
आठ दिशाएँ हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण। फिर वायु, अग्नि, नैऋत, इशान—ये चार कोने वाली दिशाएँ भी हैं।
वायु दल पर जब मन जाई। लोभ भाव तब उर में आई ॥
इतनी देर लालच आयेगी। वो डेढ़-दो घण्टा, जितनी देर मन वहाँ रहा, यही प्लैनिंग रहेगी कि पैसा कहाँ से आए, यह करूँगा, वो करूँगा। आपमें ये ही सोच आती रहेगी। आपमें यह सोच क्यों आई? आपको कोई पता नहीं है। क्योंकि मन उस कोष्ठक पर जाकर बैठ गया है। जितनी देर भी वहाँ रहा, उतनी देर ये ही विचार आते रहेंगे। इसका
मतलब है कि आपके विचारों पर आपका नियंत्रण नहीं है। जैसा-जैसा मन चाहता है, आपको चलाता जा रहा है। इस तरह—
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
दुनिया का हरेक इंसान इस तरह मन के प्रवेग में बह रहा है। आत्मा का यह स्वभाव ही नहीं है। यह मन का स्वभाव है। यह ऐसा क्यों करता है? आगे देखते हैं।
अग्नि दल पर जब मन जाई। ईर्ष्या भाव तब उर में आई ॥
छठी दिशा है—अग्नि। तब ईर्ष्या, राग-द्वेष, निंदा आदि आयेगा। आप कभी-कभी देखते हैं कि घर के लोग किसी की निंदा में लग जाते हैं। डेढ़-दो घण्टे निंदा ही चलती रहती है। कभी आप ऊब भी जाते हैं कि यार, क्यों निंदा कर रहा है। वो किये जायेगा, किये जायेगा, पर उसे मालूम नहीं है। उसने निंदा करनी-ही-करनी है, क्योंकि उसका मन अग्नि कोष्ठक पर बैठा है।
इशान दल पर जब मन जाई। अहंकार तब उर में आई ॥
सातवीं दिशा इशान की तरफ जब मन जाता है तो अहंकार आयेगा, घमण्ड आयेगा। इतना घमण्ड आयेगा कि किसी को भी कुछ न गिनोगे।
नैऋत दल पर जब मन जाई। उदासीनता तब दिल में आई ॥
जिस समय नैऋत दिशा में मन जाता है, उदास बैठे रहेंगे। किसी से आपको बात करने की इच्छा नहीं होगी। कोई भी बात आपको अच्छी नहीं लगेगी। आप चाहेंगे कि आपसे कोई भी नहीं बोले। आप अन्दर से उदास-उदास ही रहेंगे।
अष्टदल कमल पर मन धाए, नाना नाच नचाए ॥
साहिब कह रहे हैं कि यह सबको नाच नचाए जा रहा है।
जो कोई कहे मैं मन को देखा, इसकी रूप न रेखा ॥
पलक पलक में वो दिखलाए, जो सपने नहीं देखा ॥
संतों मन का करो विवेका ॥
जब यह नैऋत दल पर जाता है तो उदास बैठे रहेंगे, शांत बैठे रहेंगे। किसी से बात करने की कोई इच्छा नहीं होगी। मैंने कहा कि बेटे, इस समय तुम्हारा मन उस नैऋत दल पर बैठा है, इसलिए तुम उदास हो। तब उदासी ही लगेगी। यह जितनी भी मन की हरकत है, किसी को भी समझ में नहीं आती है। इसलिए साहिब कह रहे हैं—
अष्टदल कमल पर मन धाए। नाना नाच नचाए॥
क्यों ऐसा कर रहा है ?
मन को कोई देख न पाए। नाना नाच नचाए॥
इसको कोई देख नहीं पा रहा है। यह नाना नाच नचाए जा रहा है।
इसको पकड़ सके कोई संता। पकड़ गहे इसको मगवन्ता॥
एक महापुरुष इसको समझता है। इसका मतलब है कि हृदय में यह बड़ा ही जबरदस्त नेटवर्क है। जैसे मोबाइल में भी आप देखते हैं कि मेसिज हैं; सेटिंग है; कई चीज़ें हैं। ओके करते जाओ तो अन्दर का पूरा मसला समझ में आता जायेगा। इस तरह मन के ये अष्ट कोष्ठक हैं। आठ तरह का स्वभाव आपमें उत्पन्न करता है। क्यों करता है ? ताकि इसी में आप रमें रहें; आपका ध्यान इसी में लगा रहे; कभी आपका ध्यान परम-तत्व की तरफ नहीं जाए। यह मन की एक विशाल चालाकी है।
इसका मतलब है कि आपका स्वभाव आपकी उपज नहीं है। यह आत्मा नहीं है। आत्मदेव तो अपनी उर्जा केवल इनके साथ में लगाए हुए है। जैसा-जैसा भी मन चाह रहा है, आत्मदेव वैसा-वैसा किये जा रहा है। तभी तो साहिब कह रहे हैं—
मन हँसे मन रोवे, मन जागे मन सोवे, मन देवे मन लेवे।
मन खाए मन पीये, मन गाए मन नाचे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, जगत बना है मन से॥
यह क्यों कर रहा है ? इसलिए कि आप अपनी आत्मा को अनुभव न कर पाएँ। इसलिए मन ये अवस्थाएँ बना रहा है। नचाता रहता
है, नचाता रहता है। इसलिए इसका कण्ट्रोल किसी साधना से नहीं हो सकता है, किसी योग से नहीं हो सकता है, किसी ध्यान से नहीं हो सकता है, किसी पठन-पाठन से नहीं हो सकता है। मन बहुत शक्तिशाली है।
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
सारी दुनिया मन-तरंग में भूली हुई है।
मन पर जो असवार है, ऐसा बिरला कोय ॥
इसलिए लोग मन की इस अवस्था को ठीक से नहीं समझ पाते हैं। ये आठ बैंड उसके हैं। आठ कोष्ठक हैं। आठ तरह का स्वभाव बनाता है। कभी आप गुस्से में होते हैं, कभी आप हँसी में होते हैं, कभी आप मजाक करने लगते हैं, कभी आप दुख में होते हैं, कभी आप चिंताओं में होते हैं, कभी आपमें उदण्डता आ जाती है, कभी आपमें लालच आ जाती है, कभी आपमें विषय-विकार की भावना आ जाती है, कभी उन्माद की भावना आती है, कभी विरोध करने लगते हैं, कभी आप विषाद करने लगते हैं।
मन ही लेवे, मन ही देवे, मन ही जागे मन ही सोवे।
मन का है यह सकल पसारा, मन से कोई नहीं न्यारा ॥
इस तरह—
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
कोई भी आदमी अपनी ताकत से किसी भी कीमत पर कण्ट्रोल नहीं कर सकता है। इसी ने तो आत्मा को जकड़ा है। इसी स्वभाव, इसी व्यक्तित्व, इसी मन और माया के अधीन आप हैं। यह बड़ा कठिन है।
तेरा बैरी कोई नहीं, तेरा बैरी मन ॥
साहिब कह रहे हैं—
जीव के संग मन काल को वासा। अज्ञानी नर गहे विश्वासा ॥
आपका बैरी है यह। बस, किसी में भी इतनी ताकत नहीं है कि इस चैनल से बाहर निकले, मन के नेटवर्क से बाहर निकल पाए। नहीं।
बहुत तगड़ा है। कालांतर में जितने भी ऋषि, मुनि, पीर-पैगंबर आदि हुए—
मन ही निरंजन सबै नचाए ॥
सबको नचा दिया। फिर क्या यह इंसान अपनी ताकत से इससे पार हो जायेगा। किसी भी कीमत पर नहीं हो पायेगा। क्योंकि—
मन को कोई देख न पाए ॥
दिखाई ही नहीं देता है। मन को कोई समझ ही नहीं पा रहा है। इस तरह यह—
नाना नाच नचाए ॥
कभी-कभी जीवन में ऐसी अवस्थाएँ आती हैं; आप कोई काम कर बैठते हैं, बाद में चिंतन करके आप पछताने लगते हैं कि क्यों कर दिया, क्यों कर दिया; यह तो मुझे नहीं करना चाहिए था। ऐसा क्यों? करने वाले भी आप थे, पछताने वाले भी आप हैं। यह क्या है? इस तरह साहिब वाणी में सतर्क करके कह रहे हैं—
दिल का हुजरा साफ कर, जाना के आने के लिए।
ध्यान औरों का उठा, उसको बिठाने के लिए ॥
एक दिल लाखों तमन्ना, उसपे भी ज्यादा हवस।
फिर ठिकाना है कहाँ, उसको बिठाने के लिए ॥
वाह भाई—
चश्म दिल से देख तू, क्या क्या तमाशे हो रहे।
दिल सतां क्या क्या हैं तेरे, दिल सताने के लिए ॥
बहुत जबरदस्त कहानियाँ यह मन जड़ रहा है। मन बहुत ख़तरनाक है। यह बहुत बड़ा बैरी है। यह मन की तरंग कैसी है? उदासी लाया। उदास रहोगे। खुशी लाया, खुश रहोगे। यह मन की तरंगों में जीवात्मा उलझा हुआ है। साहिब ने बहुत बड़ा अन्तःकरण का विज्ञान कहा। मन असाध्य भी है। वासुदेव कृष्ण ने जब अर्जुन से कहा कि सत्य और प्रेम ही जीवन के लिए पूर्ण नहीं हैं, अपनी आत्मा के साक्षात्कार के लिए
भूकृटी के मध्य में स्थित हो। अर्जुन ने कहा—हे जनार्दन ! समुद्र का मंथन दुष्क्रिय है, असंभव है, तो भी संभव है। मैं उसके लिए भी चेष्टा कर सकता हूँ। मन के लिए नहीं करूँगा। यह नहीं आता काबू में। आकाश भंजना। आकाश को तोड़ना, शून्य को तोड़ना असाध्य है, तो भी चेष्टा कर लूँगा, पर मन को बस में करना मत बोलो। यह मैं किसी भी कीमत पर नहीं कर सकता हूँ। वायु की गठान बाँधना असंभव है, तो भी चेष्टा कर लूँगा, पर मन को बस में करने का कभी नहीं बोलना; किसी भी कीमत पर इसको मैं बस में नहीं कर सकता; मैंने इसके लिए बहुत साधना की है, बहुत उपक्रम किया, बहुत चीज़ें की, पर यह नहीं हुआ। साहिब भी कह रहे हैं—
मानत नहीं मन मोरा साधो, मानत नहीं मन मोरा ॥
यह अपने विधान के अनुसार काम करवा रहा है; आत्मा पर हावी है। वो अपने स्वभाव के अनुकूल कुछ नहीं कर पा रही है। मूल रूप से यह मन आपका बैरी है। बाज तीतर का बैरी है। कहावत है—कहाँ बाज और कहाँ तीतर। पक्षियों में सबसे तेज़ उड़ने वाला बाज है। बड़ा ज़ालिम है। और सबसे कम उड़ने वाला तीतर है। तो बाज को तीतर का शिकार करने में समय नहीं लगता है। आसान है। तीतर मोटा है, थोड़ा उड़कर फिर जमीन पर आ जाता है। मुर्गा भी तो उड़ता है; पर थोड़ी देर तक उड़कर फिर नीचे आ जाता है। बहुत कम। क्योंकि शरीर भारी है। बाज बड़ा तेज़ उड़ता है। चोंच से एक मिनट में गर्दन काट देता है। उसकी चोंच इतनी तेज़ है। यदि थोड़ा बड़ा है तो लोमड़ी को भी उठाकर ले जाता है।
इस तरह काल बाज रूपी है और जीव तीतर रूपी। ऐसा कोई नहीं, जिसे इसने मारा न हो। किसी भी साधना से यह काबू में नहीं आता है।
मन की तपस्या
मन की तपस्या
सत्यपुरुष ने शब्दों से 16 पुत्र उत्पन्न किये, जिनमें तेज अंग से उत्पन्न मन भी हुआ। सब परम-पुरुष के उस अमर-लोक में आनन्द और शांति से रह रहे थे। पर तेज अंग से उत्पन्न होने से मन बाकी की तरह शांत नहीं था। उसने स्वार्थवश बहुत तप किया।
यहि विधि बहुत दिवस गये बीती। ता पीछे ऐसी भई रीती॥
धर्मराय अस कीन्ह तमासा। सो चरित्र बूझहु धर्मदासा॥
युग सत्तर सेवा तिन कीन्हा। इक पग ठाढ़ पुरुष चित दीन्हा॥
सेवा कठिन भांति तिन कीन्हा। आदि पुरुष हर्षित होय चीन्हा॥
अमर लोक में सबको आनन्द से जीवन व्यतीत करते हुए बहुत समय बीत गया। उसके बाद पाँचवाँ पुत्र निरंजन परम पुरुष का ध्यान करने लगा। उसने 70 युग तक एक पाँव पर खड़े होकर परम पुरुष का ध्यान किया। जब उसने इतना कठिन तप किया तो परम पुरुष प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा—
पुरुष अवाज़ उठी तब बानी। कहा जानि तुम सेवा ठानी॥
परम पुरुष ने पूछा कि इतनी घोर सेवा, तप क्यों कर रहे हो?
निरंजन ने कहा—
कहै धरम तब सीस नमायी। देहु ठौर जहँ बैठों जायी॥
निरंजन ने कहा कि मुझे भी कहीं थोड़ा सा स्थान दे दो।
परम पुरुष ने कहा—
आज्ञा किये जाहु सुत तहवाँ। मानसरोवर दीप है जहवाँ॥
परम-पुरुष ने तब निरंजन को मानसरोवर स्थान दिया (मानसरोवर अमर-लोक का ही एक द्वीप है)।
चले धरम तब मानसरोवर। बहुत हरषचित करत कलौहर॥
मानसरोवर आये जहिया। भये आनन्द धरम पुनि तहिया॥
बहुरि ध्यान पुरुष को कीन्हा। सत्तर युग सेवा चित दीन्हा॥
यक पगु ठाढ़े सेवा लायी। पुरुष दयाल दया उर आयी॥
मानसरोवर पहुँच कर निरंजन बड़ा खुश हुआ और आनन्द से वहाँ रहने लगा। लेकिन कुछ ही समय बाद पुनः परम-पुरुष का ध्यान करने लगा। निरंजन ने पुनः 70 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया। परम-पुरुष ने सेवा से प्रसन्न होकर पूछा कि अब क्या चाहते हो?
विकस्यो पुहुप उठ्यो जब बानी। बोलत वचन उठ्यो अधरानी॥
जाहु सहज तुम धरम के पास। अब कस ध्यान कीन्ह परगासा॥
परम-पुरुष ने तब सहज को निरंजन के पास भेजा, कहा—पूछो कि अब क्यों ध्यान कर रहे हो, क्या चाहते हो।
चले सहज तब सीस नवाई। धरमराय पहुँ पहुँ चे जाई॥
कहे सहज सुन भ्राता मोरा। सेवा पुरुष मान लइ तोरा॥
अब का माँगहु सो कह मोही। पुरुष अवाज दीन्ह यह तोही॥
सहज परम-पुरुष की आज्ञा पाकर उन्हें प्रणाम कर निरंजन के पास आए और कहा—हे भाई, परम-पुरुष तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हैं, इसलिए उन्होंने तुम्हारे लिए यह संदेश भिजवाया है कि अब जो माँगना चाहते हो, मुझसे कहो।
निरंजन ने कहा—
<table border="0"> <tbody> <tr> <td>अहो</td> <td>सहज</td> <td>तुम</td> <td>जेठे</td> <td>भाई।</td> </tr> <tr> <td>करो</td> <td>पुरुष</td> <td>सो</td> <td>बिनती</td> <td>जाई॥</td> </tr> <tr> <td>इतना</td> <td>ठांव</td> <td>न</td> <td>मोहि</td> <td>सुहाई।</td> </tr> <tr> <td>अब</td> <td>मोहि</td> <td>बकसि</td> <td>देहहु</td> <td>ठकु राई॥</td> </tr> </tbody> </table>कै मोहि देहु लोक अधिकारा ।
कै मोहि देहु देश इक न्यारा ॥
निरंजन ने कहा — “मैं इतने से खुश नहीं हूँ। अब कृपा करके या तो इस अमर-लोक का राज्य ही मुझे दे दो या फिर एक अलग से न्यारा देश दो, जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो, जहाँ मैं स्वतन्त्र रूप से बिना किसी रोक-टोक के अपना कार्य कर सकूँ।”
चले सहज सुनि धर्म के बाता। जाय पुरुष सो कहे विख्याता ॥
जो कछु धर्मराय अभिलाषी। तैसे सहज सुनाये भाषी ॥
निरंजन की बात सुनकर सहज वापिस परम पुरुष के पास आए और जो कुछ निरंजन ने कहा, वो सुना दिया।
सुन्यो सहज के वचन जबहीं, पुरुष बैन उच्चारेऊ।
धरम से संतुष्ट हैं हम, बचन मम हिय धारेऊ ॥
लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश बसावहू।
करहु रचना जाय तहाँवा, सहज वचन सुनावहू ॥
परम पुरुष ने सहज के वचन सुनकर कहा कि मैं निरंजन से बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए उसके पास जाकर कहो कि मैंने उसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है। वो शून्य में एक अलग देश बसा ले।
आय सहज तब वचन सुनावा। सत्य पुरुष जस सहि समुझावा ॥
सुनतहिं बचन धर्म हरषाना। कछुक हरष कछु विस्मय आना ॥
जब सहज ने निरंजन को परम पुरुष की आज्ञा सुनाई तो निरंजन बहुत खुश हुआ। पर उसे कुछ आश्चर्य भी था। तो कहा—
कहे धर्म सुनु सहज पियारा। कैसे रचौं करौं विस्तारा ॥
पुरुष दयाल दीन्ह मोहि राजू। जानू न भेद करौं किम काजू ॥
गम्य अगम्य मोहि नाहिं आयी। करो दया सो युक्ति बतायी ॥
विनती करो पुरुष सों मोरी। अहो भ्रात बलिहारी तोरी ॥
किहि विधि रचूँ नौ खंड बनाई। हे भ्राता सो आज्ञा पाई ॥
मो कहैं देहु साज प्रभु सोई। जाते रचना जगत की होई॥
निरंजन ने सहज से कहा कि परम पुरुष ने मुझे तीन लोक का राज्य तो दिया, पर मुझे रचना का भेद मालूम ही नहीं तो फिर कैसे करूँ। मुझे वो सामग्री तो दो, जिससे मैं रचना कर सकूँ।
तबही सहज लोक पगु धारा। कीन्ह दण्डवत् बारंबारा॥
सहज फिर परम पुरुष के पास गया और दण्डवत् प्रणाम किया।
अहो सहज कस इहवा आऊ। सो हमसों तुम सब्द सुनाऊ॥
परम पुरुष ने सहज से पूछा कि किस कारण से आए हो, सो मुझे बताओ।
कह्यो सहज तब धर्म की बाता। जो कछु धर्म कही विख्याता॥
तब सहज ने निरंजन की विनती सुना दी।
आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि बारा। सुनो सहज तुम बचन हमारा।
कूर्म उदर आहि सब साजा। सो ले धरम करे निज काजा॥
विनती करे कूर्म सो जायी। माँगि लेइ तेहि माथ नवायी॥
परम-पुरुष ने तब निरंजन को सहज के हाथ संदेश भेजा कि कि तुम्हारे बड़े भाई कूर्म के पास पाँच तत्त्व का बीज (जो सूक्ष्म रूप में था) है। तुम उसके पास जाकर प्रार्थना करना और पाँच तत्त्व का बीज ले लेना। उससे तुम शून्य में तीन-लोक बनाना।
चलि भौ धरम हरष तब बाढ़ो। मनहिं कीन गुमान अति गाढ़ो॥
जाय कूर्म के सन्मुख भयऊ। दंड परनाम एक नहिं कियऊ॥
अमी स्वरूप कूर्म सुखदाई। तपत न तनि को अति शितलाई॥
करि गुमान देख्यो जब काला। कूर्म धीर अति है बलवाला॥
बारह पालंग कूर्म शरीरा। छै पालंग धरम बलवीरा॥
धावै चहुँ दिश रहै रिसाई। किहि विधि लीजे उत्पति भाई॥
कीन्हो रोष कोपि धर्म धीरा। जाय कूर्म के सन्मुख भीरा॥
कीन्हो काल सीस नख घाता। उदरते निकसे पवन अघाता॥
तीन सीस के तीनहु अंशा। ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बंशा॥
पाँच तत्त्व धरती आकाशा। चंद्र सूर्य उडगन रहिवासा॥
निसर्यो नीर अग्नि शशि सूर। निसर्यो नभ ढाकन महि अस्थूला॥
छीना सीस कूर्म को जबही। चले परसेव ठाँव पुनि तबही॥
जबही परसेव बुंद जल दीन्हा। उनचास कोट पृथ्वी को चीन्हा॥
निरंजन बड़े घमण्ड के साथ कूर्म जी के पास पहुँचा, लेकिन कूर्म जी से प्रार्थना नहीं की, और बल से पाँच तत्त्व का बीज उसी प्रकार उनसे छीन लिया, जैसे किसी के शरीर से खून खींचकर निकालते हैं। कूर्म जी शांत थे, उन्होंने सोचा कि यह कौन शैतान यहाँ आ गया है! निरंजन ने देखा कि कूर्म तो बहुत बलवान है। उनका शरीर उससे दुगुना था। निरंजन क्रोधित होकर उसके चारों ओर दौड़ने लगा कि कैसे इससे उत्पत्ति का सामान ले लूँ। उसने नख से उनके शीश पर प्रहार किया और तीन शीश काट कर खा लिए। तब उनके पेट से पाँच तत्त्व का सूक्ष्म बीज लेकर निरंजन शून्य में आया।
उधर कूर्म जी ने तब परम-पुरुष से पुकार की, कहा — यह किस शैतान को यहाँ भेज दिया है! इसने तो मेरे साथ बल का प्रयोग करके पाँच तत्त्व का बीज छीना है। परम-पुरुष ने कूर्म जी से कहा कि तुम शांत रहो, यह तुम्हारा छोटा भाई है, इसे माफ कर दो। लेकिन परम-पुरुष ने सोचा कि यह कैसा निरंजन उत्पन्न हुआ है!
पुरुष ध्यान पुनि कीन्ह निरंजन। युग अनेक किय संयम॥
स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई। करि रचना बैठे पछताई॥
धर्मराय तब कीन्ह विचारा। कैसे लो त्रयपुर विस्तारा॥
स्वर्ग मृत्यु कीन्हो पाताल। बिना बीज किमि कीजै ख्याला॥
कौन भांति कस करब उपाई। किहि विधि रचों शरीर बनाई॥
कर सेवा माँगों पुनि सोई। तिहुँ परि जीवित मेरो होई॥
एक पाँच तब सेवा कियऊ। चौंसठ युग लों ठाढ़े रहेऊ।।
पाँच तत्त्व का बीज लेकर निरंजन ने उससे पाँच तत्त्व (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश) बनाए। जिस तरह कुम्हार मिट्टी से तरह-2 की वस्तुएँ बनाता है, उसी तरह निरंजन ने भी इन पाँच तत्त्वों से 49 करोड़ योजना पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, तारे, सप्त-पाताल, सप्त-लोक, सब बना दिया। ऐसे शून्य में कई दिन रहा, लेकिन जीव नहीं थे, इसलिए यह निर्जीव सृष्टि थी। निरंजन ने सोचा कि यदि जीव ही नहीं है तो फिर सृष्टि का क्या लाभ! अतः उसने पुनः 64 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया।
परम-पुरुष ने फिर सहज को भेजकर पूछा कि अब क्या चाहिए ?
निरंजन ने कहा—
तबै निरंजन विनती लायी। कै से रचना रचूँ बनायी।।
पुरुषहिं कहो जोरि युग पानी। मैं सेवक दुतिया नहिं जानी।।
पुरुष सो विनती करो हमारा। दीजे खेत बीज निज सारा।।
मैं सेवक दुतिया नहिं जानू। ध्यान पुरुष का निशि दिन आनू।।
निरंजन ने कहा कि बीज ही नहीं हैं तो सृष्टि कैसे करूँ। इसलिए बीज दो और जीव भी दो, जिन पर मैं राज्य कर सकूँ।
इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा। अष्टंगी कन्या उपचारा।।
अष्ट बाहु कन्या होय आई। बायें अंग सो ठाढ़ रहाई।।
माथ नाई पुरुष सो कहई। अहो पुरुष आज्ञा कस अहई।।
परम-पुरुष ने तब इच्छा करके ऐसी कन्या (आद्य-शक्ति) की उत्पत्ति की, जिसकी आठ भुजाएँ थीं। आद्य-शक्ति ने परम-पुरुष को प्रणाम करते हुए पूछा कि उसे क्यों बनाया गया है ?
तबही पुरुष वचन परगासा। पुत्री जाहु धरम के पासा।।
देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी। रचहु धर्म मिलि उत्पति वारी।।
दीन्हो बीज जीव पुनि सोई। नाम सुहंग जीव कर होई॥
जीव सोहंगम दूसर नाहीं। जीव सो अंश पुरुष को आही॥
परम-पुरुष ने अनन्त आत्माएं देते हुए कहा कि हे पुत्री! मानसरोवर में निरंजन है, जिसने शून्य में तीन-लोक की रचना की है। तुम ये आत्माएं लेकर उसके पास जाओ और दोनों मिलकर शून्य में सत्य-सृष्टि करो (आत्माओं को योनियों में न लाकर अर्थात् शरीरों में न डालकर सत्य-सृष्टि करने की आज्ञा दी, जैसी कि अमर-लोक की सृष्टि थी)। सोहंग जीव का ही नाम है।
चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे॥
रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नाय के॥
परम पुरुष ने आदि-शक्ति को जीवात्माएँ देते हुए कहा कि सत्य सृष्टि करना। आदि-शक्ति परम पुरुष को प्रणाम करके चल पड़ी।
उधर परम पुरुष ने निरंजन को सहज के हाथ संदेश भेजा कि मानसरोवर में जाओ। जो वस्तु तुमने माँगी दी, तुम तक पहुँचा दी है। पुरुष वचन सुन तबही गाजा। मान सरोवर आन विराजा॥ आवत कामिनि देख्यो जबही। धर्मराय मन हरष्यो तबही॥ कला अनन्त अंत कछु नाहीं। काल मगन हवै निरखत ताही॥ निरखत धरम सु भयो अधीरा। अंग अंग सब निरख शरीरा॥ धर्मराय कन्या कह ग्रासा। काल स्वभाव सुनो धर्मदासा॥
परम पुरुष के वचन सुन निरंजन मानसरोवर में आकर बैठ गया। जब उसने आदि-शक्ति को आते देखा तो बहुत खुश हुआ। आदि-शक्ति अनन्त कला और सौंदर्य से परिपूर्ण थी, सो काल पुरुष उसे देख मग्न हो गया, कामुक हो गया। उसने शक्ति को एक हाथ से पाँव और एक हाथ से शीश की तरफ से पकड़ा और निगल गया। तब से उसका नाम काल पुरुष अथवा काल निरंजन हुआ।
कीनो ग्रास काल अन्याई। तब कन्या चित विस्मय लाई॥
ततछन कन्या कीन्ह पुकारा। काल निरंजन कीन्ह अहारा॥
जैसे ही निरंजन ने उसे निगला, उसने परम पुरुष को पुकार की, कहा कि काल निरंजन ने मुझे खा लिया है।
तबही धर्म सहज लग आई। सहज शून्य तब लीन्ह छुड़ाई॥
फिर निरंजन सहज के पास गया और उसे भी वहाँ से भगा दिया, क्योंकि तप के कारण उसमें ताकत आ गयी थी।
पुरुष ध्यान कूर्म अनुसार। मोसन काल कीन्ह अधिकारा॥
तीन शीश मम भच्छन कीन्हो। हो सतपुरुष दया भल चीन्हो॥
यही चरित्र पुरुष भल जानी। दीन्हो शाप सो कहों बखानी॥
लच्छ जीव नित ग्रासन करहू। सवा लच्छ नित प्रति बिस्तरहू॥
परम पुरुष को ध्यान आया कि इसने पहले भी कूर्म का पेट फाड़कर पाँच तत्व का बीज निकाला था और अब इसने आदि-शक्ति को निगल लिया है। परम पुरुष को बुरा लगा, उन्होंने निरंजन को शाप दे दिया, कहा कि एक लाख जीवों को तू रोज निगलेगा तो भी तेरा पेट नहीं भरेगा और सवा लाख को उत्पन्न करेगा।
पुनि कीन्ह पुरुष तिवान, तिहि छन मेटि डारो काल हो।
कठिन काल कराल जीवन, बहुत करइ बिहाल हो।
यहि मेटत सबै मिटिहैं, बचन डोल अडोलसां॥
परम पुरुष ने विचार किया कि मैं काल पुरुष को मिटा देता हूँ, क्योंकि यह तो जीवों को बड़ा कष्ट देगा, पर फिर ध्यान आया कि मैंने तो इसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है, यदि मिटा दिया तो एक तो मेरा शब्द कट जायेगा और फिर सभी 16 पुत्रों को एक नाल में पियेगा है, यदि एक को भी मिटाया तो सभी मिट जायेंगे।
डोलै वचन हमार, जो अब मेटा धरम को।
वचन करो प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहैं॥
उसे मिटाने से शब्द कट जाता था, इसलिए शाप दिया कि अब
मेरे देश में नहीं आ सकेगा, मेरा दर्शन नहीं कर सकेगा।
जोगजीत कहँ तबहि बुलावा। धर्म चरित सब कहि समुझाया॥
जोगजीत तुम बेगि सिधारो। धर्मराय को मारि निकारो॥
मानसरोवर रहन न पावै। अब यह देस काल नहिं आवै॥
धर्म के उदर माहिं है नारी। तासो कहो निज शब्द सम्हारी॥
उदर फारि के बाहर आवे। कूर्म उदर विदार फल पावै॥
धर्मराय सों कहो विलोई। वहै नारि अब तुम्हरी होई॥
जाकर रहो धर्म वहि देश। स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेश॥
परम पुरुष ने योगजीत (कबीर साहिब) को बुलाया। वास्तव में परम पुरुष स्वयं ही योगजीत हुए। उन्होंने स्वयं को मथ ज्ञानी पुरुष कबीर साहिब को निकाला और कहा कि निरंजन को मानसरोवर से निकाल दो, अब वो मेरे देश में नहीं आयेगा। उसके पेट में आद्य-शक्ति है, उससे कहना कि मेरा ध्यान करके उसके पेट को फाड़ बाहर आ जाए ताकि निरंजन ने जो कूर्म का पेट फाड़ा था, उसे उसका फल मिल जाए और निरंजन से कहना कि वो स्त्री अब तुम्हारी हो गयी, तुमने जहाँ स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक और पाताल लोक की रचना की है, वहीं जाकर रहो, वहाँ के तुम राजा हो।
जोगजीत चल भे सिर नाई। मानसरोवर पहुँचे जाई॥
जोगजीत को देखा जबहीं। अति भो काल भयंकर तबहीं॥
पूछा काल कौन तुम आहू। कौन काज तुम यहाँ सिधाहू॥
परम पुरुष को प्रणाम कर योगजीत मानसरोवर में आए। जब निरंजन ने योगजीत को देखा तो बड़ा क्रोध किया, भयंकर हो गया, पूछा—कौन हो और यहाँ क्यों आए हो?
जोगजीत अस कहे पुकारी। अहो धर्म तुम ग्रासेहु नारी॥
आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही। इहिते बेगि निकारो तोही॥
जोगजीत कन्या को कहिया। नारि काहे उदर महाँ रहिया॥
उदर फारि अब आवहु बाहर। पुरुष तेज सुमिरो तोहि ठाहर॥
योगजीत ने कहा कि तुमने आद्य-शक्ति को निगल लिया है, परम पुरुष की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ, तुम्हें यहाँ से निकालना है। तब योगजीत ने कन्या से कहा कि इसके पेट में क्यों बैठी हो, परम पुरुष की सुरति करके इसका पेट फाड़कर बाहर आ जाओ।
सुनिके धर्म क्रोध उर जरेऊ। जोगजीत सो सन्मुख भिरेऊ॥
जोगजीत तब कीन्हे ध्याना। पुरुष प्रताप तेज उर आना॥
पुरुष आज्ञा भई तेहि काला। मारहु सुरति लिलार कराला॥
जोगजीत पुनि तैसो कीन्हा। जस आज्ञा पुरुष तेहि दीन्हा॥
यह सुन निरंजन क्रोधित होकर लड़ने के लिए योगजीत के सम्मुख आया। योगजीत ने तब परम-पुरुष का ध्यान करके उनके तेज को लिया और निरंजन पर सुरति फेंकी, जिससे वो बेहोश होकर गिर पड़ा।
गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोक से न्यार हो॥
भयो त्रासित पुरुष डरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो॥
निरसि कन्या उदर ते, पुनि देख धर्महि अति डरी॥
अब नहिं देखों देस वह, कहो कौन विधि कहँवा परी॥
तब योगजीत ने उसकी भुजा पकड़कर उसे अमर लोक से नीचे शून्य में फेंक दिया। वहाँ योगजीत के डर से संभलकर उठा और उसके पेट से कन्या बाहर निकल आई। निरंजन को देख कन्या डरने लगी और सोचने लगी कि यहाँ कैसे आ गयी। अब उस देश में नहीं जा पाऊँगी।
कामिनी रही सकाय, त्रासित काल डर अधिका।
रही सो सीस नवाय, आस पास चितवत खड़ी॥
आद्य-शक्ति काल निरंजन से डरने लगी और शीश नवाकर वहाँ पास में खड़ी हो गयी।