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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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जब यह नैऋत दल पर जाता है तो उदास बैठे रहेंगे, शांत बैठे रहेंगे। किसी से बात करने की कोई इच्छा नहीं होगी। मैंने कहा कि बेटे, इस समय तुम्हारा मन उस नैऋत दल पर बैठा है, इसलिए तुम उदास हो। तब उदासी ही लगेगी। यह जितनी भी मन की हरकत है, किसी को भी समझ में नहीं आती है। इसलिए साहिब कह रहे हैं—

अष्टदल कमल पर मन धाए। नाना नाच नचाए॥

क्यों ऐसा कर रहा है ?

मन को कोई देख न पाए। नाना नाच नचाए॥

इसको कोई देख नहीं पा रहा है। यह नाना नाच नचाए जा रहा है।

इसको पकड़ सके कोई संता। पकड़ गहे इसको मगवन्ता॥

एक महापुरुष इसको समझता है। इसका मतलब है कि हृदय में यह बड़ा ही जबरदस्त नेटवर्क है। जैसे मोबाइल में भी आप देखते हैं कि मेसिज हैं; सेटिंग है; कई चीज़ें हैं। ओके करते जाओ तो अन्दर का पूरा मसला समझ में आता जायेगा। इस तरह मन के ये अष्ट कोष्ठक हैं। आठ तरह का स्वभाव आपमें उत्पन्न करता है। क्यों करता है ? ताकि इसी में आप रमें रहें; आपका ध्यान इसी में लगा रहे; कभी आपका ध्यान परम-तत्व की तरफ नहीं जाए। यह मन की एक विशाल चालाकी है।

इसका मतलब है कि आपका स्वभाव आपकी उपज नहीं है। यह आत्मा नहीं है। आत्मदेव तो अपनी उर्जा केवल इनके साथ में लगाए हुए है। जैसा-जैसा भी मन चाह रहा है, आत्मदेव वैसा-वैसा किये जा रहा है। तभी तो साहिब कह रहे हैं—

मन हँसे मन रोवे, मन जागे मन सोवे, मन देवे मन लेवे।

मन खाए मन पीये, मन गाए मन नाचे।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, जगत बना है मन से॥

यह क्यों कर रहा है ? इसलिए कि आप अपनी आत्मा को अनुभव न कर पाएँ। इसलिए मन ये अवस्थाएँ बना रहा है। नचाता रहता