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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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मेरे देश में नहीं आ सकेगा, मेरा दर्शन नहीं कर सकेगा।

जोगजीत कहँ तबहि बुलावा। धर्म चरित सब कहि समुझाया॥

जोगजीत तुम बेगि सिधारो। धर्मराय को मारि निकारो॥

मानसरोवर रहन न पावै। अब यह देस काल नहिं आवै॥

धर्म के उदर माहिं है नारी। तासो कहो निज शब्द सम्हारी॥

उदर फारि के बाहर आवे। कूर्म उदर विदार फल पावै॥

धर्मराय सों कहो विलोई। वहै नारि अब तुम्हरी होई॥

जाकर रहो धर्म वहि देश। स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेश॥

परम पुरुष ने योगजीत (कबीर साहिब) को बुलाया। वास्तव में परम पुरुष स्वयं ही योगजीत हुए। उन्होंने स्वयं को मथ ज्ञानी पुरुष कबीर साहिब को निकाला और कहा कि निरंजन को मानसरोवर से निकाल दो, अब वो मेरे देश में नहीं आयेगा। उसके पेट में आद्य-शक्ति है, उससे कहना कि मेरा ध्यान करके उसके पेट को फाड़ बाहर आ जाए ताकि निरंजन ने जो कूर्म का पेट फाड़ा था, उसे उसका फल मिल जाए और निरंजन से कहना कि वो स्त्री अब तुम्हारी हो गयी, तुमने जहाँ स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक और पाताल लोक की रचना की है, वहीं जाकर रहो, वहाँ के तुम राजा हो।

जोगजीत चल भे सिर नाई। मानसरोवर पहुँचे जाई॥

जोगजीत को देखा जबहीं। अति भो काल भयंकर तबहीं॥

पूछा काल कौन तुम आहू। कौन काज तुम यहाँ सिधाहू॥

परम पुरुष को प्रणाम कर योगजीत मानसरोवर में आए। जब निरंजन ने योगजीत को देखा तो बड़ा क्रोध किया, भयंकर हो गया, पूछा—कौन हो और यहाँ क्यों आए हो?

जोगजीत अस कहे पुकारी। अहो धर्म तुम ग्रासेहु नारी॥

आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही। इहिते बेगि निकारो तोही॥

जोगजीत कन्या को कहिया। नारि काहे उदर महाँ रहिया॥