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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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करवा लेता है। इस मन की हुकूमत बहुत बड़ी है। मन एक संदेश देता है। सभी इंद्रियाँ इस आदेश का पालन करती हैं। मन के चार रूप हैं—मन, बुद्धि, चित और अहंकार। चारों ये मन के रूप हैं। यह बुद्धि आदेश देती है कि फ़लाने को तमाचे लगाने हैं तो हाथ, शरीर, आत्मा सभी उस मन की आज्ञा का अनुकरण करते हैं। मन के मिनीस्टर हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, दंभ। इनकी बड़ी सेना है। जैसे शासन संचालित होता है, ऐसे ही मन का पूरा नेटवर्क है। जो ऊपर से संदेश आया, नीचे तक सभी उस आदेश का पालन करते हैं। इस तरह मन के आदेश का सभी पालन करते हैं। उदाहरण के लिए बुद्धि ने कहा कि इसने हमें अच्छा नहीं कहा, इसे मारो। तो आदेश देती है। हाथ मारने के लिए तेज़ी से चल पड़ते हैं। फिर यह काम कैसे होता है? क्रोध के साथ हिंसा भी आ जाती है। हिंसा क्रोध की पत्नी है। अविचार उसका पुत्र है और घृणी उसकी बहू है। परिवार इतना खतरनाक है। हिंसा रानी कहती है कि मज़ा आ रहा है, मारो। इतना आनन्द आता है कि विवेक नहीं होता है। अविचार उसका पुत्र है। जब भी क्रोध आता है लगता है कि शांति तभी मिलेगी, जब मारेंगे। गुस्से में कभी गाली बकता है। शांति के लिए बकता है। सकून मिलता है। यह कैसा सकून था कि किसी को चोट पहुँचाने से शांति मिली! यह हिंसा क्रोध की पत्नी थी। तब अविचार भी आ जाता है, कुछ नहीं सोचने देता है। वो कहता है कि लगे रहो। फिर घृणा आ जाती है। परिवार खतरनाक है। देखते हैं तो हरेक इंसान में ये चीज़ें मिल रही हैं। इसका मतलब है कि मन का नेटवर्क बहुत बड़ा है। साहिब ऐसे ही नहीं कह रहे—

तीन लोक में मनहिं विराजी। ताहि न चीहृत पंडित काजी ॥

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