मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextएक पाँच तब सेवा कियऊ। चौंसठ युग लों ठाढ़े रहेऊ।।
पाँच तत्त्व का बीज लेकर निरंजन ने उससे पाँच तत्त्व (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश) बनाए। जिस तरह कुम्हार मिट्टी से तरह-2 की वस्तुएँ बनाता है, उसी तरह निरंजन ने भी इन पाँच तत्त्वों से 49 करोड़ योजना पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, तारे, सप्त-पाताल, सप्त-लोक, सब बना दिया। ऐसे शून्य में कई दिन रहा, लेकिन जीव नहीं थे, इसलिए यह निर्जीव सृष्टि थी। निरंजन ने सोचा कि यदि जीव ही नहीं है तो फिर सृष्टि का क्या लाभ! अतः उसने पुनः 64 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया।
परम-पुरुष ने फिर सहज को भेजकर पूछा कि अब क्या चाहिए ?
निरंजन ने कहा—
तबै निरंजन विनती लायी। कै से रचना रचूँ बनायी।।
पुरुषहिं कहो जोरि युग पानी। मैं सेवक दुतिया नहिं जानी।।
पुरुष सो विनती करो हमारा। दीजे खेत बीज निज सारा।।
मैं सेवक दुतिया नहिं जानू। ध्यान पुरुष का निशि दिन आनू।।
निरंजन ने कहा कि बीज ही नहीं हैं तो सृष्टि कैसे करूँ। इसलिए बीज दो और जीव भी दो, जिन पर मैं राज्य कर सकूँ।
इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा। अष्टंगी कन्या उपचारा।।
अष्ट बाहु कन्या होय आई। बायें अंग सो ठाढ़ रहाई।।
माथ नाई पुरुष सो कहई। अहो पुरुष आज्ञा कस अहई।।
परम-पुरुष ने तब इच्छा करके ऐसी कन्या (आद्य-शक्ति) की उत्पत्ति की, जिसकी आठ भुजाएँ थीं। आद्य-शक्ति ने परम-पुरुष को प्रणाम करते हुए पूछा कि उसे क्यों बनाया गया है ?
तबही पुरुष वचन परगासा। पुत्री जाहु धरम के पासा।।
देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी। रचहु धर्म मिलि उत्पति वारी।।