मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextबहुत तगड़ा है। कालांतर में जितने भी ऋषि, मुनि, पीर-पैगंबर आदि हुए—
मन ही निरंजन सबै नचाए ॥
सबको नचा दिया। फिर क्या यह इंसान अपनी ताकत से इससे पार हो जायेगा। किसी भी कीमत पर नहीं हो पायेगा। क्योंकि—
मन को कोई देख न पाए ॥
दिखाई ही नहीं देता है। मन को कोई समझ ही नहीं पा रहा है। इस तरह यह—
नाना नाच नचाए ॥
कभी-कभी जीवन में ऐसी अवस्थाएँ आती हैं; आप कोई काम कर बैठते हैं, बाद में चिंतन करके आप पछताने लगते हैं कि क्यों कर दिया, क्यों कर दिया; यह तो मुझे नहीं करना चाहिए था। ऐसा क्यों? करने वाले भी आप थे, पछताने वाले भी आप हैं। यह क्या है? इस तरह साहिब वाणी में सतर्क करके कह रहे हैं—
दिल का हुजरा साफ कर, जाना के आने के लिए।
ध्यान औरों का उठा, उसको बिठाने के लिए ॥
एक दिल लाखों तमन्ना, उसपे भी ज्यादा हवस।
फिर ठिकाना है कहाँ, उसको बिठाने के लिए ॥
वाह भाई—
चश्म दिल से देख तू, क्या क्या तमाशे हो रहे।
दिल सतां क्या क्या हैं तेरे, दिल सताने के लिए ॥
बहुत जबरदस्त कहानियाँ यह मन जड़ रहा है। मन बहुत ख़तरनाक है। यह बहुत बड़ा बैरी है। यह मन की तरंग कैसी है? उदासी लाया। उदास रहोगे। खुशी लाया, खुश रहोगे। यह मन की तरंगों में जीवात्मा उलझा हुआ है। साहिब ने बहुत बड़ा अन्तःकरण का विज्ञान कहा। मन असाध्य भी है। वासुदेव कृष्ण ने जब अर्जुन से कहा कि सत्य और प्रेम ही जीवन के लिए पूर्ण नहीं हैं, अपनी आत्मा के साक्षात्कार के लिए