मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextहै, नचाता रहता है। इसलिए इसका कण्ट्रोल किसी साधना से नहीं हो सकता है, किसी योग से नहीं हो सकता है, किसी ध्यान से नहीं हो सकता है, किसी पठन-पाठन से नहीं हो सकता है। मन बहुत शक्तिशाली है।
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
सारी दुनिया मन-तरंग में भूली हुई है।
मन पर जो असवार है, ऐसा बिरला कोय ॥
इसलिए लोग मन की इस अवस्था को ठीक से नहीं समझ पाते हैं। ये आठ बैंड उसके हैं। आठ कोष्ठक हैं। आठ तरह का स्वभाव बनाता है। कभी आप गुस्से में होते हैं, कभी आप हँसी में होते हैं, कभी आप मजाक करने लगते हैं, कभी आप दुख में होते हैं, कभी आप चिंताओं में होते हैं, कभी आपमें उदण्डता आ जाती है, कभी आपमें लालच आ जाती है, कभी आपमें विषय-विकार की भावना आ जाती है, कभी उन्माद की भावना आती है, कभी विरोध करने लगते हैं, कभी आप विषाद करने लगते हैं।
मन ही लेवे, मन ही देवे, मन ही जागे मन ही सोवे।
मन का है यह सकल पसारा, मन से कोई नहीं न्यारा ॥
इस तरह—
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
कोई भी आदमी अपनी ताकत से किसी भी कीमत पर कण्ट्रोल नहीं कर सकता है। इसी ने तो आत्मा को जकड़ा है। इसी स्वभाव, इसी व्यक्तित्व, इसी मन और माया के अधीन आप हैं। यह बड़ा कठिन है।
तेरा बैरी कोई नहीं, तेरा बैरी मन ॥
साहिब कह रहे हैं—
जीव के संग मन काल को वासा। अज्ञानी नर गहे विश्वासा ॥
आपका बैरी है यह। बस, किसी में भी इतनी ताकत नहीं है कि इस चैनल से बाहर निकले, मन के नेटवर्क से बाहर निकल पाए। नहीं।