मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextमतलब है कि आपके विचारों पर आपका नियंत्रण नहीं है। जैसा-जैसा मन चाहता है, आपको चलाता जा रहा है। इस तरह—
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
दुनिया का हरेक इंसान इस तरह मन के प्रवेग में बह रहा है। आत्मा का यह स्वभाव ही नहीं है। यह मन का स्वभाव है। यह ऐसा क्यों करता है? आगे देखते हैं।
अग्नि दल पर जब मन जाई। ईर्ष्या भाव तब उर में आई ॥
छठी दिशा है—अग्नि। तब ईर्ष्या, राग-द्वेष, निंदा आदि आयेगा। आप कभी-कभी देखते हैं कि घर के लोग किसी की निंदा में लग जाते हैं। डेढ़-दो घण्टे निंदा ही चलती रहती है। कभी आप ऊब भी जाते हैं कि यार, क्यों निंदा कर रहा है। वो किये जायेगा, किये जायेगा, पर उसे मालूम नहीं है। उसने निंदा करनी-ही-करनी है, क्योंकि उसका मन अग्नि कोष्ठक पर बैठा है।
इशान दल पर जब मन जाई। अहंकार तब उर में आई ॥
सातवीं दिशा इशान की तरफ जब मन जाता है तो अहंकार आयेगा, घमण्ड आयेगा। इतना घमण्ड आयेगा कि किसी को भी कुछ न गिनोगे।
नैऋत दल पर जब मन जाई। उदासीनता तब दिल में आई ॥
जिस समय नैऋत दिशा में मन जाता है, उदास बैठे रहेंगे। किसी से आपको बात करने की इच्छा नहीं होगी। कोई भी बात आपको अच्छी नहीं लगेगी। आप चाहेंगे कि आपसे कोई भी नहीं बोले। आप अन्दर से उदास-उदास ही रहेंगे।
अष्टदल कमल पर मन धाए, नाना नाच नचाए ॥
साहिब कह रहे हैं कि यह सबको नाच नचाए जा रहा है।
जो कोई कहे मैं मन को देखा, इसकी रूप न रेखा ॥
पलक पलक में वो दिखलाए, जो सपने नहीं देखा ॥
संतों मन का करो विवेका ॥