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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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Page 59

दीन्हो बीज जीव पुनि सोई। नाम सुहंग जीव कर होई॥
जीव सोहंगम दूसर नाहीं। जीव सो अंश पुरुष को आही॥

परम-पुरुष ने अनन्त आत्माएं देते हुए कहा कि हे पुत्री! मानसरोवर में निरंजन है, जिसने शून्य में तीन-लोक की रचना की है। तुम ये आत्माएं लेकर उसके पास जाओ और दोनों मिलकर शून्य में सत्य-सृष्टि करो (आत्माओं को योनियों में न लाकर अर्थात् शरीरों में न डालकर सत्य-सृष्टि करने की आज्ञा दी, जैसी कि अमर-लोक की सृष्टि थी)। सोहंग जीव का ही नाम है।

चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे॥

रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नाय के॥

परम पुरुष ने आदि-शक्ति को जीवात्माएँ देते हुए कहा कि सत्य सृष्टि करना। आदि-शक्ति परम पुरुष को प्रणाम करके चल पड़ी।

उधर परम पुरुष ने निरंजन को सहज के हाथ संदेश भेजा कि मानसरोवर में जाओ। जो वस्तु तुमने माँगी दी, तुम तक पहुँचा दी है। पुरुष वचन सुन तबही गाजा। मान सरोवर आन विराजा॥ आवत कामिनि देख्यो जबही। धर्मराय मन हरष्यो तबही॥ कला अनन्त अंत कछु नाहीं। काल मगन हवै निरखत ताही॥ निरखत धरम सु भयो अधीरा। अंग अंग सब निरख शरीरा॥ धर्मराय कन्या कह ग्रासा। काल स्वभाव सुनो धर्मदासा॥

परम पुरुष के वचन सुन निरंजन मानसरोवर में आकर बैठ गया। जब उसने आदि-शक्ति को आते देखा तो बहुत खुश हुआ। आदि-शक्ति अनन्त कला और सौंदर्य से परिपूर्ण थी, सो काल पुरुष उसे देख मग्न हो गया, कामुक हो गया। उसने शक्ति को एक हाथ से पाँव और एक हाथ से शीश की तरफ से पकड़ा और निगल गया। तब से उसका नाम काल पुरुष अथवा काल निरंजन हुआ।

कीनो ग्रास काल अन्याई। तब कन्या चित विस्मय लाई॥