कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
७१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवाँ अधिकरण
७१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवाँ अधिकरण
(१) शत्रुं वा मित्रभूमिंलिप्सायां प्रतिपन्नं दण्डेनानुगृह्णीयात्, ततो मित्रगतमतिसन्दध्यात् । कृतप्रतिविधानो वा व्यसनमात्मनो दर्शयित्वा मित्रेणामित्रमुत्साहयित्वा आत्मानमभियोजयेत् । ततः संपीडनेन घातयेत्, जीवग्राहेण वा राज्यविनिमयं कारयेत् । मित्रेणाहूतश्चेच्छत्रुरगाह्यो स्थातु-मिच्छेत्, सामन्तादिभिर्मूलमस्य हारयेत्, दण्डेन वा त्रातुमिच्छेत्, तमस्य घातयेत् ।
(२) तौ चेन्न भिद्येयातां प्रकाशमेवान्योन्यस्य भूम्या पणेत, ततः परस्परं मित्रव्यञ्जनोभयवेतना वा दूतान् प्रेषयेयुः—‘अयं ते राजा भूमिं लिप्सते शत्रुसंहितः' इति । तयोरन्यतरो जाताशङ्कारोषः पूर्ववच्चेष्टेत ।
(३) दुर्गराष्ट्रदण्डमुख्यान् वा कृत्यपक्षहेतुभिरभिविख्याप्य प्रव्राजयेत्,
लेंगे' इसी प्रकार विजिगीषु राजा जब शत्रु को जीतने की इच्छा करे तो मित्र के द्वारा अपना कुछ अपकार कराके इसी बहाने से उसके ऊपर आक्रमण कर दे । इसके बाद आगे का कार्य पूर्ववत् किया जाय ।
(१) अथवा जब शत्रु-राजा विजिगीषु के मित्र राजा पर आक्रमण करने की इच्छा करे तो विजिगीषु अपनी ओर से सैनिक सहायता देने की प्रतिज्ञा कर उसको युद्ध में भिड़ा दे । जब सेनाएँ मित्र देश में युद्ध के लिए चली जायें तो वहाँ मित्र से मिलकर उस आक्रमणकारी शत्रु को ही मरवा दिया जाय । अथवा उसके ऊपर कोई बनावटी विपत्ति दिखाकर अपने मित्र के द्वारा शत्रु को उत्साहित करके विजिगीषु अपने ऊपर चढ़ाई करा दे । जब शत्रु-राजा विजिगीषु राजा पर चढ़ाई कर दे तो विजिगीषु और उसका मित्र दोनों ही उस आक्रमणकारी शत्रु को बीच में घेरकर मार डालें । अथवा उसको कैद में डालकर उसकी जगह अपने आज्ञाकारी उसके पुत्र या अन्य किसी सम्बन्धी का राज्याभिषेक कर दें । यदि विजिगीषु के मित्र द्वारा बुलाया हुआ वह शत्रु अलग रहकर ही विजिगीषु पर आक्रमण करना चाहे तो जिस समय वह शत्रु-राजा विजिगीषु के साथ युद्ध में फंसा हो, उस समय सामन्त राजा के द्वारा उसकी राजधानी को लुटवा दिया जाय । यदि सेना के द्वारा वह अपनी रक्षा करना चाहे तो उस सेना को ही मरवा दिया जाय ।
(२) यदि शत्रु और उसका मित्र आपस में मिले रहें तो उन्हें प्रकट रूप में भूमि तथा राज्य देने का प्रलोभन दिया जाय । तदनन्तर विजिगीषु और मित्र के उभय-वेतनभोगी मध्यस्थ दूतों के द्वारा यह सन्देश भेजा जाय कि 'यह राजा शत्रु से मिलकर तुम्हारे राज्य को लेना चाहता है ।' इस तरह दोनों में फूट और संदेह पैदा कर विजिगीषु राजा आक्रमणकारी शत्रु को मार डाले ।
(३) अथवा विजिगीषु अपने दुर्ग, राष्ट्र और सेना के मुख्य पुरुषों को यह
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ते युद्धावस्कन्दावरोधव्यसनेषु शत्रुमतिसन्दध्युः, भेदं वास्य स्ववर्गेभ्यः कुर्युः, अभित्यक्तशासनैः प्रतिसमानयेयुः ।
(१) लुब्धकव्यञ्जना वा मांसविक्रयेण द्वाःस्था दौवारिकापाश्रयाश्चोराभ्यागमं परस्य द्विस्त्रिरिति निवेद्य लब्धप्रत्यया भर्तुरनीकं द्विधा निवेश्य ग्रामवधेऽवस्कन्दे च द्विषतो ब्रूयुः—'आसन्नश्चोरगणः, महांश्चाक्रन्दः, प्रभूतं सैन्यमागच्छतु' इति । तदर्पयित्वा ग्रामघातदण्डस्य सैन्यमितरदादाय रात्रौ दुर्गद्वारेषु ब्रूयुः—'हतश्चोरगणः, सिद्धयात्रमिदं सैन्यमागतं, द्वारमपान्वियताम्' इति पूर्वप्रणिहिता वा द्वाराणि दद्युः, तैः सह प्रहरेयुः ।
(२) कारुशिल्पिपाषण्डकुशीलववैदेहकव्यञ्जनानायुधीयान् वा परदुर्गे प्रणिदध्यात् । तेषां गृहपतिकव्यञ्जनाः काष्ठतृणधान्यपण्यशकटैः प्रहरणा-
बहाना कर अपने यहाँ से निकाल दे कि वे लोग विजिगीषु के कृत्य पक्ष की सहायता करते हैं । निकाले हुए वे लोग शत्रु की शरण में जाकर युद्ध के समय, सोते समय, अन्तःपुर में रहते समय या किसी आपत्ति के समय मौका पाकर शत्रु को मार डालें । अथवा शत्रु-राजा और उसके अमात्यों के बीच फूट पैदा कर दें और वध्य पुरुषों के द्वारा लाये गये कपट लेखों के प्रमाण से शत्रु-राजा तथा उसके अमात्यों की फूट को अधिक बढ़ा दें ।
( १ ) अथवा शिकारी के वेश में रहने वाले गुप्तचर मांस बेचने के बहाने दरवाजे पर ठहर कर पहरेदारों से मित्रता करके दो तीन बार चिल्लाकर कहें कि 'शत्रु के गाँव में चोर आते हैं' । जब शत्रु राजा को उनकी बातों पर विश्वास हो जाय तो वे गुप्तचर अपने राजा की सेना को ग्रामवध और लूटमार करने ( अवस्कंद ) के लिए दो भागों में बाँट कर शत्रु-राजा से कहें कि 'चोरों का समूह बिलकुल नजदीक आ गया है, उनकी संख्या बहुत है, अतः मुकाबले के लिए आपकी बहुत-सी सेना हमारे साथ जानी चाहिए।' जब शत्रु-राजा चोरों को दण्ड देने के लिए अपनी सेना भेज दे तो वे ही गुप्तचर अपने राजा की सेना के दूसरे हिस्से को लेकर रात के समय दुर्ग के दरवाजों पर आकर चिल्ला-चिल्ला कर कहें कि 'हमने चोरों के समूह को मार डाला है, यह सेना अपने कार्य को सफल करके यहाँ पहुँच गयी है, इसलिए दुर्ग के दरवाजों को खोल दिया जाय' । अथवा पहिले नियुक्त हुए गुप्तचर ही इशारा पाकर दरवाजे खोल दें और उस सेना के सहित वे गुप्तचर दुर्ग पर हमला बोल दें ।
( २ ) अथवा कारु, शिल्पी, पाखण्डी, कुशीलव और वैदेहक आदि के वेष में रहने वाले या आयुधजीवियों के वेष में रहने वाले गुप्तचरों को भेदिया बनाकर दुर्ग में बसा देना चाहिए । उनमें से गृहस्थ के वेष में रहने वाले गुप्तचर दूसरे गुप्तचरों को लकड़ी, घास, अनाज आदि की गाड़ियों में हथियार तथा कवच आदि पहुँचाते रहें ।
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वरणान्यभिहरेयुः, देवध्वजप्रतिमाभिर्वा । ततस्तद्व्यञ्जनाः प्रमत्तवधमव-
स्कन्दप्रतिग्रहमभिप्रहरणं पृष्ठतः शङ्खदुन्दुभिशब्देन वा प्रविष्टमित्यावेद-
येयुः । प्राकारद्वाराट्टालकदानमनीकभेदं घातं वा कुर्युः ।
(१) सार्थगणवासिभिरातिवाहिकैः कन्यावाहिकैरश्वपण्यव्यवहारिभि-
रुपकरणहारकैर्धान्यक्रेतृविक्रेतृभिर्वा प्रव्रजितलिङ्गिभिर्दूतैश्चदण्डातिनयनं
सन्धिकर्म विश्वासनाथम् ।
(२) इति राजापसर्पाः ।
(३) एत एवाटवीनामपसर्पाः कण्टकशोधनोक्ताश्च । व्रजमटव्यासन्न-
मपसर्पाः सार्थं वा चोरैर्घातयेयुः । कृतसङ्केतमन्नपानं चात्र मदनरसविद्धं वा
कृत्वाऽपगच्छेयुः । गोपालकवैदेहकाश्च ततश्चोरान् गृहीतलोप्त्रभाराः मदन-
रसविकारकालेऽवस्कन्दयेयुः । सङ्कर्षणदैवतीया वा मुण्डजटिलव्यञ्जनाः
अथवा देवताओं की ध्वजाओं तथा प्रतिमाओं के साथ वे हथियार वहाँ पहुँचाये जायें । उसके बाद कारु आदि के वेष में रहने वाले गुप्तचर प्रमादी पुरुषों के वध, बलात्कार, लूट-मार और चारों ओर के आक्रमण के सम्बन्ध में शंख तथा नगाड़े आदि बजाकर पीछे की ओर से हमला हो जाने की सूचना दें । जब शत्रु उनका प्रतीकार करने के लिए सेना लेकर पीछे की ओर से जाय तो इधर से वे गुप्तचर परकोटा प्रधान दरवाजा तथा उसके ऊपर की अटारी तोड़ने के साथ ही शत्रु ही सेना को पूर्ववत् विभक्त कर यथावसर उसको नष्ट कर दें ।
( १ ) उन्हीं गुप्तचरों को चाहिए कि दुर्गम मार्गों से पार करने वाले व्यापारियों के झुंड में रहते हुए, कन्याओं को ले जाते हुए, घोड़ों का व्यापार करते हुए, तत्सम्बन्धी दूसरे सौदों को बेचते हुए, सामान को इधर-उधर ढोते हुए, अनाज आदि की खरीद-फरोख्त करते हुए और संन्यासियों के वेष में रहते हुए अपनी सेनाओं को दुर्गम रास्तों से निकालकर बाहर ले आवें तथा शत्रु के विश्वास के लिए सन्धि की शर्तों का पूरा-पूरा ध्यान रखें ।
( २ ) इस प्रकार यहाँ तक राजाओं के गुप्त-पुरुषों का निरूपण किया गया ।
( ३ ) कण्टकशोधन अधिकरण में और इस अध्याय में कहे गए गुप्तचर ही आटविकों के भी समझने चाहिए । अर्थात् आवश्यकता होने पर आटविकों में भी वही गुप्तचर कार्य करें । आटविकों के बीच में रहने वाले गुप्तचरों को चाहिए कि वे जंगल के पास की गोशालाओं तथा राहगीरों को आटविकों के साथ मिलकर लूट डालें या नष्ट कर डालें, उसके बाद संकेत पाते ही उनके खाने-पीने की वस्तुओं में विष मिलाकर वहाँ से भाग निकलें । फिर ग्वालों और व्यापारियों के वेश में रहने वाले गुप्तचर चोरों द्वारा चुराये गये उस माल को स्वयं लेकर विष खाने से बेहोश
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प्रहवणकर्मणा मदनरसयोगाभ्यामतिसन्दध्यात् । अथावस्कन्दं दद्यात् । शौण्डिकव्यञ्जनो वा दैवतप्रेतकार्योत्सवसमाजेष्वाटविकान् सुराविक्रयोपायननिमित्तं मदनरसयोगाभ्यामतिसन्दध्यात् । अथावस्कन्दं दद्यात् ।
(१) ग्रामघातप्रविष्टां वा विक्षिप्य बहुधाऽटवीम् ।
घातयेदिति चोराणामपसर्पाः प्रकीर्तिताः ॥इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे अपसर्पप्रणिधिर्नाम तृतीयोऽध्यायः; आदितो द्विचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
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उन आठविकों को गिरफ्तार कर ले, अथवा संकर्षण देवता के मानने वाले (मदिराप्रियों) मुण्डित तथा जटाधारियों के वेष में रहने वाले गुप्तचर उत्सव या सहभोज आदि के बहाने विष देकर या दूसरे तरीकों से उन आठविकों को अपने वश में कर लें, उसके बाद जब वे बेहोश हो जायँ तो उन्हें गिरफ्तार कर लें, अथवा शराब विक्रेताओं के वेष में रहने वाले गुप्तचर किसी देवकार्य, प्रेतकार्य, उत्सव तथा अन्य सामाजिक भोजों के अवसर पर अपनी विक्रयार्थ शराब में विषैले रसों का प्रयोग कर आठविकों को अपने वश में करें और जब वे बेहोश हो जायँ तो उन्हें गिरफ्तार कर लें ।
( १ ) गाँव को नष्ट करने की नियत से गाँव में प्रविष्ट हुए आठविकों के हृदय में विभिन्न प्रकार के विकार उत्पन्न कर उन्हें नष्ट कर दिया जाय । यहाँ तक आठविकों ( चोरों ) के सम्बन्ध में गुप्तचरों के कार्यों का निरूपण किया गया ।
दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में अपसर्पप्रणिधि नामक तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।
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४६ कौ०
| प्रकरण १७४-१७५ | ## पर्युपासनकर्म, अवमर्दश्च |
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| अध्याय ४ |
(१) कर्शनपूर्वं पर्युपासनकर्म । जनपदं यथानिविष्टमभये स्थापयेत् । उत्थितमनुग्रहपरिहाराभ्यां निवेशयेदन्यत्रापसरतः, समग्रमन्यस्यां भूमौ निवेशयेदेकस्यां वा वासयेत् । न ह्यजनो जनपदो राज्यमजनपदं वा भवतीति कौटिल्यः ।
(२) विषमस्थस्य मुष्टिं सस्यं वा हन्याद्वीवधप्रसारौ च ।
(३) प्रसारवीवधच्छेदान्मुष्टिसस्यवधादपि ।
वमनाद् गूढघाताच जायते प्रकृतिक्षयः ॥(४) 'प्रभूतगुणवद्धान्यकुप्ययन्त्रशस्त्रावरणविष्टिरश्मिसमग्रं मे सैन्य-
शत्रु के दुर्ग को घेर कर अपने अधिकार में करना
( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रु के कोष, सैन्य और अमात्य आदि का नाश करने के साथ ही उसके दुर्ग को चारों ओर से घेर दे । किन्तु ऐसी स्थिति में विजिगीषु को ध्यान रखना चाहिए कि जनपद को किसी प्रकार का कष्ट न होने पावे, वरन्, उसकी रक्षा का सुप्रबंध करे । यदि जनपद विजिगीषु के विरुद्ध आंदोलन करे तो उसे धन देकर या कर माफ करके शांत किया जाय । किन्तु ऐसा यत्न उसी दशा में करना चाहिए जब जनपद अपने स्थान पर बना रहे; अन्यथा उसकी कुछ भी सहायता न की जाय । उस जनपद के विभिन्न भागों में अधिकाधिक आदमियों को बसाया जाय अथवा एक ही भाग में अधिक आदमियों को बसाया जाय; क्योंकि मनुष्यों से रहित प्रदेश जनपद नहीं कहला सकता और जनपदरहित भूमि राज्य नहीं कहला सकती । इसीलिए कौटिल्य का कहना है कि 'यदि जनपद न होगा तो राज्य किस पर किया जायगा ?'
( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह विपत्तिग्रस्त शत्रु के अन्न, फसल, वीवध और प्रसार आदि सबको नष्ट कर दे ।
( ३ ) वीवध, प्रसार आदि का उच्छेद कर देने से तथा फसल, अनाज, व्यापार आदि को नष्ट कर देने से और अमात्य आदि प्रकृतिवर्ग कहीं दूसरी जगह ले जाने से या चुपचाप उन्हें मार देने से राजा का अपने आप क्षय हो जाता है ।
( ४ ) जब विजिगीषु यह समझे कि 'प्रभूत गुणों से संपन्न धान्य, लोहा, ताँबा,
प्र० १७४-१७५ : अ० ४ ] दुर्ग को अधिकार में करना ७२३
मृतुश्च पुरस्तात्, अपर्तुः परस्य व्याधिदुर्भिक्षनिचयरक्षाक्षयः क्रीतबलनिर्वेदो मित्रबलनिर्वेदश्च' इति पर्युपासीत ।
(१) कृत्वा स्कन्धावारस्य रक्षां वीवधासारयोः पथश्च, परिक्षिप्य दुर्गं खातसालाभ्यां, दूषयित्वोदकमवस्त्राव्य परिखाः सम्पूरयित्वा वा, सुरुङ्गा-बलकुटिकाभ्यां वप्रप्राकारौ हारयेत् ।
(२) द्वारं च गुलेन निम्नं वा पांसुमाल्याऽऽच्छादयेत् । बहुलारक्षं यन्त्रैर्घातयेत् । निष्करादुपनिष्कृष्याश्वैश्च प्रहरेयुः । विक्रमान्तरेषु च नियोग-विकल्पसमुच्चयैश्चोपायानां सिद्धिं लिप्सेत । दुर्गवासिनः ।
(३) श्येनकाकनप्तृभासशुकशारिकोलूककपोतान् ग्राहयित्वा पुच्छेष्व-ग्नियोगयुक्तान् परदुर्गे विसृजेयुः ।
वस्त्र, मशीन, हथियार, कवच, श्रमिक और रस्सी आदि सभी उपयोगी सामग्री से अपनी सेना युक्त है और ऋतु भी अपने अनुकूल है; किन्तु शत्रु का देश बीमारी, दुर्भिक्ष से अभिभूत, धन-धान्य तथा रक्षक पुरुषों से अभावग्रस्त है, उसको वेतनभोगी सेना सहायता देने से इनकार करती हो, मित्रसेना भी खिन्न हो चुकी हो और ऋतु भी उसके प्रतिकूल हो, ऐसी अवस्था में यह शत्रु के दुर्ग पर घेरा डाल दे ।
(१) शत्रु-दुर्ग पर घेरा डालने के लिए विजिगीषु को चाहिए कि पहिले वह अपनी छावनी, वीवध, असार और अपने मार्ग की रक्षा करे, फिर खाई तथा पर-कोटे के अनुसार दुर्ग को चारों ओर से घेरा डाल दे, तदनन्तर शत्रु के पानी में विष मिला दे या बाँध तोड़ कर उसे बहा दे, और अन्त में खाइयों को मिट्टी से पाट कर या किले की दीवारों तथा अटारियों पर सुरंग बनाकर दुर्ग पर आक्रमण कर दे ।
(२) दुर्ग की दरारों को कंकरीट से तथा नीची-गहरी जगहों को मिट्टी से पाट दिया जाय । दुर्ग के जिस भाग में रक्षा का अधिक प्रबन्ध हो उसे मशीनों द्वारा नष्ट कर दिया जाय । कपट से रक्षक पुरुषों को बाहर निकाल कर घोड़ों तथा हाथियों द्वारा उन पर हमला बोल दिया जाय । जब युद्धक्षेत्र में शत्रु की सेना अधिक पराक्रम-शाली जान पड़े तो साम, दान आदि उपायों के द्वारा या अवसर के अनुसार वैसा ही उपाय का प्रयोग करे या एक उपाय की जगह दूसरे उपाय को काम में लाकर अथवा अनेक उपायों को एक साथ उपयोग में लाकर दुर्गवासी शत्रु पर विजय-लाभ की चेष्टा करनी चाहिए ।
(३) बाज, कौवा, नप्ता (मुर्ग के समान); गिद्ध, तोता, मैना, उल्लू और कबूतर आदि पक्षियों को पकड़ कर उनकी पूँछ में आग लगाने वाली औषधियों को मल कर उन्हें शत्रु के दुर्ग में छोड़ दिया जाय, जिससे कि वहाँ आग लग जाय ।
प्र० १७४-१७५ : अ० ४ ] दुर्गं को अधिकार में करना ७२५
पलाशपुष्पकेशमषितैलमधूच्छिष्टकश्रीवेष्टकयुक्तोऽग्नियोगो विश्वासघाती वा । तेनावलिप्तः शणत्रपुसवल्कवेष्टितो बाण इत्यग्नियोगः ।
(१) नत्वेव विद्यमाने पराक्रमेऽग्निमवसृजेत् । अविश्वास्यो ह्यग्निः दैवपीडनं च, अप्रतिसंख्यातप्राणिधान्यपशुहिरण्यकुप्यद्रव्यक्षयकरः । क्षीणनिचयं चावाप्तमपि राज्यं क्षयायैव भवति ।
(२) इति पर्युपासनकर्म ।
(३) ‘सर्वारम्भोपकरणविष्टिसम्पन्नोऽस्मि, व्याधितः पर उपधाविरुद्धप्रकृतिरकृतदुर्गकर्मनिचयो वा निरासारः सासारो वा पुरा मित्रैः सन्धत्ते’ इत्यवमर्दकालः ।
(४) स्वयमग्नौ जाते समुत्थापिते वा प्रहवणे प्रेक्षानीकदर्शनसङ्ग-सौरिककलहेषु नित्ययुद्धश्रान्तबले बहुलयुद्धप्रतिविद्धप्रेतपुरुषे जागरण-क्लान्तसुप्तजने दुर्दिने नदीवेगे वा नीहारसम्प्लवे वानमृद्नीयात् ।
मिलाकर बनाया गया अग्नियोग निश्चय ही विश्वासघाती होता है । (अर्थात् जहाँ आग लगने की कतई भी संभावना न हो, वहाँ भी इसका प्रयोग करने पर आग लग जाती है । अचूक अग्नियोग होने के कारण ही इसको विश्वासघात कहा गया है ।) उक्त सभी वस्तुओं के योग से सना हुआ और सन तथा ककड़ी की बेल की छाल से लपेटा हुआ बाण भी अग्नियोग होता है, अर्थात् जहाँ मारा जाता है वहीं आग लगा देता है ।
( १ ) युद्ध के प्रारम्भ में इन अग्नियों को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि अग्नि का कोई विश्वास नहीं है और फिर उसे दैवपीड़न कहा गया है । अग्निदाह से असंख्य प्राणियों, धन, धान्य, पशु एवं अनेक प्रकार के द्रव्यों का नाश हो जाता है । ऐसा नष्ट-भ्रष्ट राज्य अपने हाथ में आ जाने पर भी क्षय का ही कारण होता है ।
( २ ) यहाँ तक शत्रु-दुर्ग को घेरने के संबंध में निरूपण किया गया ।
( ३ ) जब विजिगीषु वह समझ ले कि ‘वह सब प्रकार की युद्धोपयोगी सामग्री से संपन्न है, सभी तरह के कार्य करने वाले आदमी उसके पास मौजूद हैं; उधर शत्रु व्याधिग्रस्त है, उसकी प्रकृतियाँ धोखा देने वाली हैं, दुर्ग आदि की मरम्मत तथा धान्य आदि का संग्रह भी उसने नहीं किया है, मित्र की सहायता की भी संभावना नहीं है, अथवा सहायता सम्भव होने पर भी अभी तक वह संधि करने में ही फंसा हुआ है’—ऐसे शत्रु पर फौरन चढ़ाई कर देनी चाहिए ।
( ४ ) अथवा विजिगीषु जब देखे कि ‘शत्रु के दुर्ग में अपने-आप आग लग गई है, या सब लोग पार्टियों तथा उत्सवों में व्यस्त हैं या खेल-तमाशों तथा चाँदमारी में आसक्त हैं या शराबियों ने कोई उपद्रव खड़ा कर दिया है या लगातार के युद्ध में शत्रु