कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
३९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
३९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) त्रिवर्षप्रजातातार्तवायास्तुल्यो गन्तुमदोषः । ततः परमतुल्योऽप्यनलङ्कृतायाः । पितृद्रव्यादाने स्तेयं भजेत ।
(२) परमुद्दिश्यान्यस्य विन्दतो द्विशतो दण्डः । न च प्राकाम्यमकामायां लभेत ।
(३) कन्यामन्यां दर्शयित्वान्यां प्रयच्छतः शत्यों दण्डस्तुल्यायां, हीनायां द्विगुणः ।
(४) प्रकर्मण्यकुमार्याश्चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । शुल्कव्ययकर्मणी च प्रतिदद्यादवस्थाय तज्जातं पश्चात्कृता द्विगुणं दद्यात् ।
(५) अन्यशोणितोपधाने द्विशतो दण्डः । मिथ्याभिशंसिनश्च पुंसः । शुल्कव्ययकर्मणी च जीयेत । न च प्राकाम्यमकामायां लभेत ।
(६) स्त्री प्रकृता सकामा समाना द्वादशपणं दण्डं दद्यात्, प्रकर्त्री
( १ ) यदि मासिक धर्म होने पर भी कन्या का तीन वर्ष तक विवाह न किया जाय तो उसकी जाति का कोई भी पुरुष उसके साथ संभोग कर सकता है । यदि मासिक धर्म होते हुए तीन वर्ष से अधिक गुजर जाँय तो किसी भी जाति का पुरुष उसको अपनी पत्नी बना सकता है इसमें कोई दोष नहीं, किन्तु वह पुरुष लड़की के पिता के बनवाये आभूषण आदि नहीं ले जा सकता है । यदि वह पुरुष लड़की के पिता के आभूषण आदि वापस न करे तो उसको चोरी का दण्ड दिया जाय ।
( २ ) दूसरे के लिए कही हुई स्त्री को 'वह पुरुष मैं ही हूँ' ऐसा कहकर जो अन्य पुरुष उपभोग करे उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । स्त्री की इच्छा न होने पर कोई भी पुरुष उससे संभोग न करे ।
( ३ ) विवाह से पहिले जिस कन्या को दिखाया गया हो, विवाह में यदि उसी जाति की दूसरी कन्या दी जाय तो उस व्यक्ति पर सौ-पण दण्ड किया जाय । यदि उसकी जगह कोई नीच जाति की कन्या दी जाय तो दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।
( ४ ) जो पुरुष क्षतयोनि स्त्री को अक्षतयोनि कहकर दुबारा उसका विवाह कराये उस पर चौवन पण दण्ड किया जाय, और उससे शुल्क तथा अन्य खर्चा भी वसूल किया जाय । यदि वह ऐसा ही कह कर तीसरी बार विवाह कराये तो उस पर दुगुना जुर्माना ( १०८ पण ) किया जाय ।
( ५ ) जो स्त्री अपनी योनि-क्षीणता दिखाने के लिए दूसरे का खून अपने कपड़ों पर लगाये उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार जो पुरुष अक्षतयोनि स्त्री को क्षतयोनि बताये उस पर भी दो-सौ पण दण्ड किया जाय तथा शुल्क एवं विवाह-व्यय भी उससे वसूल किया जाय । स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उससे कोई भी संभोग नहीं कर सकता है ।
( ६ ) संभोग की इच्छा से कोई स्त्री यदि अपने समान जाति वाले पुरुष से
प्र० ८७ : अ० १२ ] कुँवारी कन्या से संभोग का दण्ड ३९५
द्विगुणम् । अकामायाः शत्यो दण्डः, आत्मरागार्थं शुल्कदानं च । स्वयं प्रकृता राजदास्यं गच्छेत् ।
(१) बहिर्ग्रामस्य प्रकृतायां मिथ्याभिशंसने च द्विगुणो दण्डः ।
(२) प्रसह्य कन्यामपहरतो द्विशतः, ससुवर्णामुत्तमः । बहूनां कन्यापहारिणां पृथग्यथोक्ता दण्डाः ।
(३) गणिकादुहितरं प्रकुर्वतश्चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । शुल्कं मातुर्भोगः षोडशगुणः ।
(४) दासस्य दास्या वा दुहितरमदासीं प्रकुर्वतश्चतुर्विंशतिपणो दण्डः, शुल्काबन्ध्यदानं च । निष्क्रयानुरूपां दासीं प्रकुर्वतो द्वादशपणो दण्डः, वस्त्राबन्ध्यदानं च ।
(५) साचिव्यावकाशदाने कर्तृसमो दण्डः ।
योनिक्षत कराये तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि वह स्वयं ही अपनी योनि को क्षत करे तो उस पर चौबीस पण दण्ड किया जाय । पुरुष की इच्छा न रखती हुई भी जो स्त्री क्षणिक आनन्द के लिए किसी पुरुष से अपनी योनि क्षीण कराती है उस पर सौ पण दण्ड किया जाय और उस पुरुष को वह संभोग शुल्क दे । जो स्त्री अपनी इच्छा से संभोग कराये, उसको चाहिए कि वह राजदासी बन जाय ।
( १ ) गाँव के बाहर निर्जन स्थान में संभोग कराने वाली स्त्री पर चौबीस पण जुरमाना किया जाय और यदि पुरुष संभोग करके मुकर जाय तो उस पर अठतालीस पण दण्ड किया जाय ।
( २ ) किसी कन्या का बलात् अपहरण करने वाले पुरुष पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । आभूषणों से युक्त कन्या का बलात् अपहरण करने वाले को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । अपहरण में यदि अनेक व्यक्तियों का हाथ हो तो प्रत्येक को यही दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) वेश्या की लड़की के साथ बलात्कार करने वाले पर चौवन पण दण्ड किया जाय । और दंड से सोलह गुनी फीस ( ८६४ पण ) वह लड़की की माता को अदा करे ।
( ४ ) किसी भी दास या दासी की लड़की के साथ संभोग करने वाले पुरुष पर चौबीस पण दण्ड किया जाय और उससे शुल्क तथा आभूषण आदि भी वसूल किये जाँय । दासता से छुड़ाने के बराबर धन देकर जो व्यक्ति किसी दासी से संभोग करे उस पर बारह पण जुरमाना किया जाय और उससे दासी स्त्री के लिए वस्त्र तथा जेवरात भी वसूल कर लिए जाँय ।
( ५ ) कन्या को दूषित करने में जो भी सहायता करे अथवा मौका या जगह दे उसे भी अपराधी के ही समान दण्ड दिया जाय ।
३९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) प्रोषितपतिकामपचरन्तीं पतिबन्धुस्तत्पुरुषो वा संगृह्णीयात् । संगृहीता पतिमाकांक्षेत । पतिश्चेत् क्षमेत, विसृज्येतोभयम् । अक्षमायां स्त्रियाः कर्णनासाच्छेदनम् । वधं जारश्च प्राप्नुयात् ।
(२) जारं चोर इत्यभिहरतः पञ्चशतो दण्डः । हिरण्येन मुञ्चतस्तदष्टगुणः ।
(३) केशाकेशीकं संग्रहणम् । उपलिङ्गनाद्वा शरीरोपभोगानां तज्जातेभ्यः स्त्रीवचनाद्वा ।
(४) परचक्राटवीहतामोघप्रव्यूढामरण्येषु दुर्भिक्षे वा त्यक्तां प्रेतभावोत्सृष्टां वा परस्त्रियं निस्तारयित्वा यथासम्भाषितं समुपभुञ्जीत । जातिविशिष्टामकामामपत्यवतीं निष्क्रयेण दद्यात् ।
(५) चोरहस्तान्नदीवेगाद् दुर्भिक्षाद्देशविभ्रमात् ।
निस्तारयित्वा कान्ताराद्भ्रष्टां त्यक्तां मृतेति वा ॥
( १ ) जिस स्त्री का पति विदेश में हो, यदि वह व्यभिचार कराये तो उसका देवर या नौकर उसको नियंत्रण में रखे । उनके नियन्त्रण में रहकर वह स्त्री अपने पति के आने की प्रतीक्षा करे । यदि पति उसके अपराध को क्षमा कर दे तो, जार सहित उसको दण्ड से बरी किया जाय, यदि क्षमा न करे तो स्त्री के नाक-कान काट दिये जाँय और उसके जार को प्राणदंड की सजा दी जाय ।
( २ ) व्यभिचार छिपाने के लिए यदि कोई रक्षक पुरुष जार को चोर बताये तो उस पर पाँच सौ पण जुरमाना किया जाय । रक्षक पुरुष यदि हिरण्य की रिश्वत लेकर जार को छोड़ दे तो उस पर रिश्वत का अठगुना जुरमाना किया जाय ।
( ३ ) यदि कोई स्त्री किसी पुरुष के साथ फँसी हो तो उसका पता उसकी इन चेष्टाओं से किया जाय : यदि वह रास्ते में चलती हुई दूसरी स्त्री की चुटिया पकड़े, यदि उसके शरीर पर संभोग चिह्न लक्षित हों, यदि कामोत्तेजना के लिए अपने शरीर पर उसने चंदन आदि का लेप किया हो, यदि वह पुरुषों से इशारों से बात करे, यदि वह बात-चीत से स्वयं ही प्रकट कर दे ।
( ४ ) जो पुरुष शत्रुओं से, जंगली लोगों से, नदी के प्रवाह से, जंगलों से, दुर्भिक्ष से रोग या मूर्च्छा से त्यागी हुई पराई स्त्रियों का उद्धार करे, वह उस स्त्री की रजामन्दी से उसके साथ तृप्त होकर संभोग कर सकता है । यदि वह स्त्री कुलीन हो, समान जाति की होने पर भी वह उद्धारकर्ता से संभोग की इच्छा न करे और बाल-बच्चों वाली हो तो उद्धार करने वाला उसको उसके पति के पास सौंप कर उससे यथोचित पुरस्कार प्राप्त करे ।
( ५ ) शत्रुओं से, जंगली लोगों से, नदी के प्रवाह से, जंगलों से, दुर्भिक्ष से,