कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
बारहवाँ अधिकरण
बारहवाँ अधिकरण
आबलीयस
| प्रकरण १६२ | दूतकर्माणि |
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| अध्याय १ |
(१) बलीयसाऽभियुक्तो दुर्बलः सर्वत्रानुप्रणतो वेतसधर्मा तिष्ठेत् । 'इन्द्रस्य हि स प्रणमति यो बलीयसो नमति' इति भारद्वाजः ।
(२) 'सर्वसन्दोहेन बलानां युध्येत, पराक्रमो हि व्यसनमपहन्ति । स्वधर्मश्चैष क्षत्रियस्य, युद्धे जयः पराजयो वा' इति विशालाक्षः ।
(३) नेति कौटिल्यः । सर्वत्रानुप्रणतः कुलैडक इव निराशो जीविते वसति । युध्यमानश्चाल्पसैन्यः समुद्रमिवाप्लवोऽवगाहमानः सीदति । तद्विशिष्टं तु राजानमाश्रितो दुर्गमविषह्यं वा चेष्टेत ।
दूतकर्म
(१) 'जब किसी दुर्बल राजा पर कोई बलवान् राजा आक्रमण करे तो उसे चाहिए कि वह हर प्रकार का अपमान सहन करता हुआ उसके सामने बेत की तरह झुक जाय। जो अपने से बलवान् राजा के सामने झुकता है, वह दंड के सामने झुकता है'—यह आचार्य भारद्वाज का मत है।
(२) किन्तु इसके विरुद्ध आचार्य विशालाक्ष की राय है कि 'दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपनी सारी सैन्य-शक्ति को लगाकर बलवान् राजा के साथ युद्ध करे; क्योंकि पराक्रम ही आपत्तियों को नष्ट करता है और पराक्रम तो क्षत्रिय का धर्म है। युद्ध में विजय हो या पराजय, क्षत्रिय को अपने क्षात्रधर्म का पालन करना चाहिए; शत्रु के आगे कदापि न झुकना चाहिए।'
(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य उक्त दोनों मतों से सहमत नहीं है। उसका कहना है कि 'जो दुर्बल राजा हर तरह का अपमान होने पर भी नम्र ही बना रहता है उसका जीवन वैसा ही दूभर हो जाता है, जैसा कि अपने समूह से अलग हुए मेंढे का। इसी प्रकार थोड़ी सेना को लेकर जो युद्ध में जाता है उसकी वही स्थिति है; जो तैरने के साधनों को साथ लिये बिना ही समुद्र में कूद पड़ता है। इसलिए दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी राजा के सामने या उससे भी अधिक शक्तिशाली किसी दूसरे राजा का आश्रय प्राप्त करे। अथवा ऐसे दुर्ग में जाकर शत्रु का मुकाबला करे, जो कि अभेद्य हो।
६८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
(१) त्रयोऽभियोक्तारो धर्मलोभासुरविजयिन इति । तेषामभ्यवपत्त्या धर्मविजयी तुष्यति; तमभ्यवपद्येत परेषामपि भयात् । भूमिद्रव्यहरणेन लोभविजयी तुष्यति; तमर्थेनाभ्यवपद्येत । भूमिद्रव्यपुत्रदारप्राणहरणेन असुरविजयी, तं भूमिद्रव्याभ्यामुपगृह्याग्राह्यः प्रतिकुर्वीत ।
(२) तेषामुत्तिष्ठमानं सन्धिना मंत्रयुद्धेन कूटयुद्धेन वा प्रतिव्यूहेत । शत्रुपक्षमस्य सामदानाभ्यां, स्वपक्षं भेददण्डाभ्याम् । दुर्गं राष्ट्रं स्कन्धावारं वास्य गूढाः शस्त्ररसाग्निभिः साधयेयुः ।
(३) सर्वतः पार्ष्णिमस्य ग्राहयेत्, अटवीभिर्वा राज्यं घातयेत्, तत्कुलीनावरुद्धाभ्यां वा हारयेत् ।
(४) अपकारान्तेषु चास्य दूतं प्रेषयेत् । अनपकृत्य वा सन्धानम् । तथाप्यभिप्रयान्तं कोशदण्डयोः पादोत्तरमहोरात्रोत्तरं वा सन्धि याचेत ।
(१) दुर्बल राजा पर आक्रमण करने वाला बलवान् राजा तीन प्रकार का होता है : १. धर्मविजयी २. लोभविजयी और ३. असुरविजयी । उनमें धर्मविजयी तो आत्मसमर्पण करने से संतुष्ट हो जाता है । उस धर्मविजयी राजा की शाखा में जाने से दुर्बल राजा अपने वर्तमान संकट को तो दूर कर ही लेता है, वरन् दूसरे बलवान् राजाओं से भी वह अपनी रक्षा कर लेता है लोभविजयी राजा भूमि और धन देने से संतुष्ट हो जाता है । इसलिए दुर्बल राजा धनादि देकर उसको संतुष्ट करे । किन्तु असुरविजयी राजा तो भूमि, द्रव्य, स्त्री, पुत्र और प्राणों तक ले लेने के बाद ही सूझता है । इसलिए उससे दूर रहकर ही उसको भूमि आदि देकर अपने अनुकूल बनाना चाहिए या संधि आदि के द्वारा उसका प्रतीकार करना चाहिए ।
(२) यदि उक्त राजाओं में से कोई राजा दुर्बल राजा पर आक्रमण करे तो संधि, मंत्र-युद्ध अथवा कूट-युद्ध के द्वारा उसका मुकाबला करना चाहिए । उस बलवान् अभियोक्ता के शत्रुपक्ष को साम तथा दाम द्वारा अपने अनुकूल बनाना चाहिए और अपने प्रकृतिवर्ग को भेद तथा दण्ड द्वारा अपने वश में रखना चाहिए । उस प्रबल राजा के दुर्ग, राष्ट्र तथा छावनियों को अपने गुप्तपुरुषों द्वारा शस्त्र, विष तथा अग्नि आदि से नष्ट कर देना चाहिए ।
(३) यथावसर उसके आगे-पीछे, अगल-बगल से छापा मारना चाहिये; अथवा आटविक पुरुषों द्वारा उसके दुर्ग, जनपद को नष्ट करवा देना चाहिए; अथवा उसके द्वारा अवरुद्ध उसके किसी बंधु-बांधव द्वारा ही उसके राज्य का अपहरण करवा देना चाहिए ।
(४) इस प्रकार उसका अनिष्ट कर देने के बाद संधि के लिए उसके पास अपना दूत भेजना चाहिए । अथवा यदि उसका अनिष्ट न किया जा सके तो उससे
प्र० १६२ : अ० १ ] दूतकर्म ६८१
(१) स चेद्दण्डसन्धि याचेत, कुण्ठमस्मै हस्त्यश्वं दद्यात् । उत्साहितं वा गरयुक्तम् ।
(२) पुरुषसन्धि याचेत, दूष्यामित्राटवीबलमस्मै दद्याद्योगपुरुषाधिष्ठितम् । तथा कुर्याद्यथोभयविनाशः स्यात् । तीक्ष्णबलं वाऽस्मै दद्यात्, यदवमानितं विकुर्वीत । मौलमनुरक्तं वा, यदस्य व्यसनेऽपकुर्यात् ।
(३) कोशसन्धि याचेत, सारमस्मै दद्यात् । यस्य क्रेतारं नाधिगच्छेत्; कुप्यमयुद्धयोग्यं वा ।
(४) भूमिसन्धि याचेत, प्रत्यादेयां नित्यामित्रामनपाश्रयां महाक्षयव्ययनिवेशां वास्मै भूमिं दद्यात् ।
(५) सर्वस्वेन वा राजधानीवर्जेन सन्धि याचेत बलीयसः ।
संधि की याचना करनी चाहिए। यदि वह इतने पर भी रजामंद न हो और चढ़ाई करने पर ही आमादा हो तो पूर्वप्रतिज्ञात धन में अपने कोष तथा सेना का चौथाई भाग अधिक बढ़ाकर उससे संधि के लिए याचना करनी चाहिए।
( १ ) यदि वह बलवान् अभियुक्ता संधि की शर्तों में केवल सेना को ही लेना चाहे तो सर्वथा अशक्त हाथी, घोड़े अथवा विष खिलाकर सशक्त हाथी, घोड़े देकर संधि कर लेनी चाहिए ।
( २ ) यदि वह संधि की शर्तों में पैदल सेना की माँग करे तो अपने गुप्तचरों को साथ मिलाकर दूष्यबल, शत्रुबल तथा आटविकबल शर्तनामा में देने चाहिए और इस प्रकार का प्रबंध करे कि अपनी वे दूष्य आदि सेनायें तथा शत्रु की सेनायें नष्ट हो जायें । अथवा ऐसे तीक्ष्ण बल को देना चाहिए जो थोड़ी सी बात पर बिगड़ उठे और शत्रु का अपकार करने के लिए तैयार हो जाय । अथवा वंशपरंपरा से चली आती अनुरक्त तथा विश्वासी सेना को संधि में देना चाहिए, जो आपत्ति के समय शत्रु का अपकार कर सके ।
( ३ ) यदि अभियुक्ता संधि के बदले में धन लेना पसंद करे तो ऐसे बहुमूल्य रत्न आदि दिये जायें, जिन्हें कोई न खरीद सके अथवा ऐसा सामान दिया जाय जो युद्ध में काम न आ सके ।
( ४ ) यदि अभियुक्ता भूमिसंधि की माँग करे तो उसको ऐसी भूमि दी जाय, जिसको आसानी से वापस लिया जा सके अथवा जिसके स्थायी शत्रु हों या जिसमें कोई दुर्ग न हो और जिसमें अधिक क्षय-व्यय की आशंका हो ।
( ५ ) अथवा जो अत्यंत बलवान् अभियुक्ता हो उसको राजधानी के अलावा अपना सर्वस्व देकर, उससे संधि कर लेनी चाहिए ।