कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गोऽध्यक्ष नामक
प्र० ४५ : अ० २६ ] पशुविभाग का अध्यक्ष २२१
(१) पादोनमश्वतरगोखराणां, द्विगुणं महिषोष्ट्राणां कर्मकरबलीवर्दा-
नाम्। पायनाथं च धेनूनाम्। कर्मकालतः फलतश्च विधानम्। सर्वेषां
तृणोदकप्राकाम्यम्। इति गोमण्डलं व्याख्यातम्।
(२) पञ्चर्षभं खराश्वानामजावीनां दशर्षभम्।
शक्यं गोमहिषोष्ट्राणां यूथं कुर्याच्चतुर्वृषम्॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे गोऽध्यक्षो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः,
आदित एकोनपञ्चाशः।
—: ० :—
सौ पल माँस एक आढक दही, एक द्रोण जौ या उड़द, इन सब चीजों का सांदा बनाकर भी दिया चाहिए, एक द्रोण दूध या आधा आढक सुरा, एक प्रस्थ तेल या घी, दस पल गुड़ और एक पल सोठ, इन सबको एकत्र करके बैलों को देना चाहिए।
(१) बैलों की इस खुराक का चतुर्थांश कम खुराक खच्चरों तथा गधों को, बैलों की दुगुनी खुराक भैंसों, ऊँटों एवं खेतों में काम करने वाले बैलों को, दूध देने वाली गायों को, देनी चाहिए। काम करने वाले बैलों और दूध देने वाली गायों की खुराक उनके कार्य एवं दूध के औसत के अनुसार ही दी जानी चाहिए। सभी पशुओं को उनकी इच्छानुसार भरपेट घास-पानी देना चाहिए। यहाँ तक गो आदि पशुओं की आहार-व्यवस्था बताई गई।
(२) एक सौ गदही तथा घोड़ियों के झुण्ड पाँच घोड़े, सौ भेड़-बकरियों में दस बकरे, सौ-सौ गाय, भैंस तथा ऊँटों के झुण्डों में चार-चार सांड, छोड़ने चाहिए।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गोऽध्यक्ष नामक
उन्तीसवाँ अध्याय समाप्त।
—: ० :—
प्रकरण ४६
अध्याय ३०
अश्वाध्यक्षः
(१) अश्वाध्यक्षः पण्यागारिकं क्रयोपगतमाहवलब्धमाजातं साहा-
य्यागतं पणस्थितं यावत्कालिकं वाश्वपर्यग्रं कुलवयोवर्णचिह्नकर्मवर्गा-
गमैर्लेखयेत् ।
(२) अप्रशस्तन्यङ्गव्याधितांश्चावेदयेत् ।
(३) कोशकोष्ठागाराभ्यां च गृहीत्वा मासलाभमश्ववाहश्चिन्तयेत् ।
(४) अश्वविभवेनायतामश्वायामद्विगुणविस्तारां चतुर्द्वारोपावर्तन-
मध्यां सप्रग्रीवां प्रद्वारासनफलकयुक्तां वानरमयूरपृषतनकुलचकोरशुकशा-
रिकाभिराकीर्णां शालां निवेशयेत् ।
(५) अश्वायामचतुरश्रश्लक्ष्णफलकास्तारं सखादनकोष्ठकं समूत्र-
पुरीषोत्सर्गमेकैकशः प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वा स्थानं निवेशयेत् । शालावशेन
वा दिग्विभागं कल्पयेत् । वडबावृषकिशोराणाम् एकान्तेषु ।
अश्वविभाग का अध्यक्ष
( १ ) अश्वशाला के अध्यक्ष को चाहिए कि वह, भेंटस्वरूप प्राप्त, खरीदे हुए, युद्ध में मिले हुए, अपने यहाँ पैदा हुए, बदले में प्राप्त, रेहन रखे हुए और कुछ समय के लिए सहायतार्थ प्राप्त, इन सभी प्रकार के घोड़ों को उनकी नस्ल, उम्र, रंग, चिह्न, समूह, कर्म और कहाँ से वे मिले हैं, इन सभी बातों का विवरण अपने रजि-स्टर में दर्ज करे ।
( २ ) बुरी नस्ल वाले, लंगड़े-लूले और बीमार घोड़ों को बदल देना चाहिए या उनका उचित इलाज करना चाहिए ।
( ३ ) कोष और कोष्ठागार से एक महीने का पूरा खर्च लेकर साईस को चाहिए कि वह सावधानीपूर्वक घोड़ों की टहल-सेवा करे ।
( ४ ) घोड़ों को रखने के लिये ऐसी घुड़साल बनवाई जाय, जो घोड़ों की संख्या के अनुसार लम्बी और घोड़ों की लम्बाई से दुगुनी चौड़ी हो, उसमें चार दरवाजे, काफी फैलाव, बड़ा बरामदा, दरवाजों के दोनों ओर चबूतरे हों और जो बन्दर, मोर, नेवला, चकोर, तोता तथा मैना आदि से घिरी हुई हो ।
( ५ ) घोड़े की लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार एक समतल चौकोर तख्ता बिछा होना चाहिए । इसके अतिरिक्त घास-भूसा खाने के लिए लकड़ी की नाँद, पेशाब
प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२३
(१) बडबायाः प्रजातायास्त्रिरात्रं घृतप्रस्थपानम् । अत ऊर्ध्वं सक्तु प्रस्थः स्नेहभैषज्यप्रतिपानं दशरात्रं, ततः पुलाको यवसमार्तवश्चाहारः ।
(२) दशरात्रादूर्ध्वं किशोरस्य घृतचतुर्भागः सक्तुकुडवः क्षीरप्रस्थ- श्चाहार आ षण्मासादिति । ततः परं मासोत्तरमर्धवृद्धैर्यवप्रस्थ आत्रि- वर्षाद्, द्रोण आ चतुर्वर्षादिति । अत ऊर्ध्वं चतुर्वर्षः पंचवर्षो वा कर्मण्यः पूर्णप्रमाणः ।
(३) द्वात्रिंशदङ्गुलं मुखमुत्तमाश्वस्य, पञ्चमुखान्यायामः, विंशत्य- ङ्गुला जङ्घा, चतुर्जङ्घ उत्सेधः । त्र्यङ्गुलावरं मध्यमावरयोः । शताङ्गुलः परिणाहः । पञ्चभागावरं मध्यमानरयोः ।
(४) उत्तमाश्वस्य द्विद्रोणं शालिव्रीहियवप्रियङ्गुणामर्धशुष्कमर्धसिद्धं
तथा लीद रखने का उचित प्रबन्ध होना चाहिए, घुड़सालों के दरवाजे पूरव तथा उत्तर की ओर होने चाहिएँ, घोड़ों को बाँधने के लिए अलग-अलग खूंटे होने चाहिएँ। घुड़साल, या तो राजमहल के उत्तर-पूरव में होनी चाहिए; यदि ऐसा सम्भव न हो तो सुविधानुसार उचित दिशाओं की ओर उनके दरवाजे बना दिए जाँय । प्रसवा घोड़ियों, साँड़, घोडों और छह मास से तीन वर्ष तक के बछेड़ों को बाँधने के लिए अलग-अलग स्थान होने चाहिएँ ।
( १ ) जब घोड़ी व्याये तो उसे तीन दिन तक एक प्रस्थ घी पीने के लिए दिया जाना चाहिए । तदनन्तर दस दिन तक उसे एक प्रस्थ सत्तू और चिकनाई में मिली दवा पीने के लिए दी जानी चाहिए । उसके बाद उसे अधपके जौ का साँदा, घास और ऋतु के अनुसार आहार देना चाहिए ।
( २ ) नये पैदा हुए घोड़ों के बछड़े को दस दिन बाद एक कुडव सत्तू में चौथाई घी मिला कर देना चाहिए । छह महीने तक उसे एक प्रस्थ दूध प्रतिदिन दिया जाना चाहिए । तदनन्तर उसको जौ का एक प्रस्थ और उसमें उत्तरोत्तर प्रतिमास आधा प्रस्थ बढ़ाकर तीन वर्ष तक यही आहार देना चाहिए । उसके बाद पूरे एक वर्ष तक प्रतिदिन उसे एक द्रोण आहार मिलना चाहिए । तब जाकर चार या पाँच वर्ष में वह पूरी तरह काम लेने लायक होता है ।
( ३ ) जिस घोड़े की खाब बत्तीस अंगुल, लम्बाई एक-सौ-साठ अंगुल, जंघा बीस अंगुल और ऊँचाई अस्सी अंगुल हो वह उत्तम होता है । उससे तीन अंगुल कम परिमाण का घोड़ा मध्यम और उससे भी तीन अंगुल कम परिमाण को घोड़ा अधम कोटि का समझना चाहिए । उत्तम घोड़े की मोटाई सौ अंगुल, मध्यम घोड़े की मोटाई अस्सी अंगुल और अधम घोड़े की मोटाई चौंसठ अंगुल होती है ।
( ४ ) उत्तम घोड़ों को साठी, चावल, गेहूँ, जौ, काकुन आदि में से कोई भी दो
२२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र . [ दूसरा अधिकरण
वा मुद्गमाषाणां वा पुलाकः । स्नेहप्रस्थश्च । पञ्चपलं लवणस्य । मांसं पञ्चाशत्पलिकम् । रसस्याढकं द्विगुणं वा दघ्नः पिण्डक्लेदनार्थम् । क्षारपञ्चपलिकः सुरायाः प्रस्थः पयसो वा द्विगुणः प्रतिपानम् । दीर्घपथभारक्लान्तानां च खादनार्थं स्नेहप्रस्थोऽनुवासनम् । कुडुबो नस्यकर्मणः । यवसस्यार्धभारः, तृणस्य द्विगुणः, षडरत्निपरिक्षेपः पुञ्जीलग्रहो वा ।
(१) पादावरमेतन्मध्यमावरयाः । उत्तमसमो रथ्यो वृषश्च मध्यमः । मध्यमसमश्चावरः पादहीनं वडवानां पारशमानां च । अतोऽर्धं किशोराणां च । इति विधायोगः ।
(२) विधापाचकमूत्रग्राहचिकित्सकाः प्रतिस्वादभाजः ।
(३) युद्धव्याधिजराकर्मक्षीणाः पिण्डगोचरिकाः स्युः । असमरप्रयोज्याः पौरजानपदानांर्थेन वृषा बडबास्वायोज्याः ।
द्रोण धान्य अधपका या अधसूखा, ख़ूराक में देना चाहिए; अथवा इतना ही मूंग या उड़द का साँदा बनाकर देना चाहिए । इसके अतिरिक्त एक प्रस्थ घी या तेल; पाँच पल नमक पचास पल मांस एक आढक शोरवा या दो आढक दही में भीगी हुई सानी, पाँच पल गुड़ के साथ एक प्रस्थ शराब अथवा दो प्रस्थ दूध, प्रतिदिन तीसरे पहर पीने के लिये दिया जाना चाहिए । लम्बा सफर और अधिक बोझा उठाने के कारण थके हुये घोड़ों को एक प्रस्थ घी या तेल और साथ ही उतने ही परिमाण की थकावट को दूर करने वाली दवाइयों का मिश्रण ( अनुवासन ) पिलाना चाहिए । एक कुडव घी या तेल उसके नाक में छोड़ना चाहिए, खाने के लिये उसको दस तुला भूसा, बीस तुला हरी घास या जई आदि देना चाहिए ।
( १ ) उत्तम घोड़े की उक्त ख़ूराक का चौथाई हिस्सा कम मध्यम घोड़े की और उसमें से भी चौथाई हिस्सा कम अधम घोड़े की ख़ूराक है । जो मध्यम घोड़ा रथ में जोता जाय तथा जो साँड़ घोड़ी पर छोड़ा गया हो उनको भी उत्तम घोड़े का आहार देना चाहिये । इसी प्रकार जो अधम घोड़े रथ में जोते जाँय या साँड़ छोड़े जाँय उनको मध्यम घोड़े का आहार देना चाहिए । इस आहार से चौथा हिस्सा कम घोड़ी और खच्चरों का आहार है । उसका आधा आहार बछड़ों को देना चाहिए । यही घोड़ों के आहार का विधान है ।
( २ ) घोड़ों की परिचर्या करने वाले साईसों और उनकी चिकित्सा करने वाले वैद्यों को भी घोड़े के आहार में से कुछ हिस्सा दिया जाना चाहिए ।
( ३ ) जो घोड़े युद्ध के कारण, बीमारी, बुढ़ापे और भार ढोने के कारण, अशक्त तथा बेकार हो चुके हैं, उन्हें उतना ही आहार दिया जाय कि वे भूखे न मर सकें । जो घोड़े हृष्ट-पुष्ट होकर भी युद्धोपयोगी न हों, उन्हें नगर तथा जनपद के निवासियों की घोड़ियों में नस्ल पैदा करने के लिए साँड़ बना दिया जाय ।
प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२५
(१) प्रयोग्यानामुत्तमाः काम्बोजकसैन्धवारट्टजवानायुजाः । मध्यमा बाह्लीकपापेयकसौवीरकतैतलाः । शेषाः प्रत्यवराः ।
(२) तेषां तीक्ष्णभद्रमन्दवशेन सान्नाह्यमौपवाह्यकं वा कर्म प्रयोजयेत् । चतुरस्रं कर्माश्वस्य सान्नाह्यम् ।
(३) वल्गनो नीचैर्गतो लंघनो धोरणो नारोष्ट्रश्चौपवाह्याः ।
(४) तत्रौपवेणुको वर्धमानको यमक आलीढप्लुतः ( पृथ ? पूर्व )-गस्त्रिकचाली च वल्गनः ।
(५) स एव शिरःकर्णविशुद्धो नीचैर्गतः, षोडशमार्गो वा । प्रकीर्णकः प्रकीर्णोत्तरो निषण्णः पार्श्वानुवृत्त ऊर्मिमार्गः शरभक्रीडितः शरभप्लुतः
( १ ) चाल एवं कवायद में प्रवीण युद्धयोग्य घोड़ों में काबुल, सिंध, आरट्ट और अरब देशों के घोड़े उत्तम श्रेणी के हैं। व्यास, सतलज के मध्यवर्ती प्रदेश (बाह्लीक), पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त ( पापेयक ), राजस्थान और तितल देशों में उत्पन्न घोड़े मध्यम कोटि के होते हैं। इनके अतिरिक्त सभी घोड़े अधम कोटि में आते हैं ।
( २ ) तेज, मध्यम और मन्द गति के अनुसार ही घोड़ों को युद्धकार्यों और साधारण सवारी आदि कार्यों में प्रयुक्त करना चाहिये । विशेषज्ञों द्वारा युद्ध-सम्बन्धी हर प्रकार की चालों की शिक्षा दिलाना ही घोड़े का सन्नाह्य कर्म कहलाता है ।
( ३ ) सवारी या खेलों में प्रयुक्त किए जाने वाले घोड़ों की चाल के पांच भेद हैं : १. वल्गन, २. नीचैर्गत, ३. लंघन, ४. धोरण और ५. नारोष्ट्र ।
( ४ ) मण्डलाकार चक्कर लगाने को बल्गन कहते हैं । वह छह प्रकार का होता है : १. औपवेणुक ( एक हाथ के गोल घेरे में घूमना ), २. वर्धमानक ( उतने ही घेरे में कई बार घूमना ), ३. यमक ( बराबर के दो घेरों में एक साथ घूमना ), ४. आलीढप्लुत ( एक पैर को समेट कर और दूसरे पैर को फैलाकर छलांग मारना और तत्काल ही घूम जाना ) ५. पूर्वंग ( शरीर के अगले हिस्से के सहारे घूमना ) और ( ६ ) त्रिकचाली ( पुट्ठी और पिछली दो टांगों के सहारे घूमना ) ।
( ५ ) शिर और कान में किसी प्रकार की कंपन पैदा किए बिना ही गोल घेरे में चक्कर लगाना ही नीचैर्गत कहलाता है; उसके सोलह प्रकार हैं : १. प्रकीर्णक ( सभी चालें एक साथ मिली हुई होना ), २. प्रकीर्णोत्तर ( सभी चालें एक साथ मिली हुई होने पर भी एक चाल का मुख्य होना ), ३. निषण्ण ( पीठ पर कंपन किये बिना ही किसी विशेष चाल को निकालना ), ४. पार्श्वानुवृत्त ( एक ही ओर तिरछी चाल चलना ) ५. ऊर्मिमार्ग ( लहरों जैसी ऊँची-नीची चाल चलना ), ६. शरभक्रीडित ( तरुण हाथी की तरह क्रीडा करते हुए चलना), ७. शरभप्लुत ( तरुण हाथी की तरह कूद कर चलना ), ८, त्रिताल ( तीन पैरों से चलना ), ६. वाह्यानु-
१५ कौ०
२२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
त्रितालो बाह्यानुवृत्तः पञ्चपाणिः सिंहायतः स्वाधूतः क्लिष्टः श्लिङ्गितो बृंहितः पुष्पाभिकीर्णश्चेति नीचैर्गतमार्गाः ।
(१) कपिप्लुतो भेकप्लुत एणप्लुत एकपादप्लुततः कोकिलसञ्चार्युरस्यो बकचारी च लङ्घनः ।
(२) काङ्को वारिकाङ्क्षो मायूरोऽर्धमायूरो नाकुलोऽधनाकुलो वाराहोऽर्धवाराहश्चेति धोरणः ।
(३) संज्ञाप्रतिकारो नारोष्ट्र इति ।
(४) षण्णव द्वादशेति योजनान्यध्वा रथ्यानाम् । पञ्च योजनान्यर्धाष्टमानि दशेति पृष्ठवाह्यानामश्वानामध्वा ।
वृत्त ( दायें-बायें घेरा बनाकर चलना ), १०. पंचपाणि ( पहिले तीन पैरों को एक साथ रखकर फिर एक पैर को दो बार रख कर चलना ), ११. सिंहायत ( शेर के समान लम्बी चाल भरना ), १२. स्वाधूत ( लम्बी कूद भरना ), १३. क्लिष्ट ( बिना सवार के ही चलना ), १४. श्लिंगित ( शरीर के अगले हिस्से को झुका कर चलना ), १५. बृंहित ( शरीर के अगले हिस्से को ऊँचा करके चलना ) और १६. पुष्पाभिकीर्ण ( टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलना ) ।
( १ ) कूद कर चलने वाली चाल का नाम लंघन है; उसके सात प्रकार हैं : १. कपिप्लुत ( बन्दर की तरह कूद कर चलना ), २. भेकप्लुत ( मेढक की तरह उछल कर चलना ), ३. एणप्लुत ( हरिण की तरह छलांग मारकर चलना ), ४. एकपादप्लुत ( तीन पैरों को समेट कर एक पैर से ही छलांग मार कर चलना ), ५. कोकिलसंचारी ( कोयल की तरह फुदक कर चलना ), ६. उरस्य ( पैरों को समेट कर छाती के बल कूदकर चलना ) और ७. बकचारी ( बगुले की तरह बीच में धीरे-धीरे चलकर सहसा एक साथ कूदकर चलना ) ।
( २ ) धीरे-धीरे चलकर सहसा सरपट चाल से चलना धोरण गति कहलाती है; उसके आठ प्रकार हैं : १. कांक ( बगुले की चाल चलना ), २. वारिकांक्ष ( बत्तख की चाल चलना ), ३. मायूर ( मोर की चाल चलना ), ४. अर्धमायूर ( आधी चाल मोर की चलना ), ५. नाकुल (नेवले की चाल चलना), ६. अर्धनाकुल ( आधी चाल नेवले की चलना ), ७. वराह ( सुअर की चाल चलना ) और ८. अर्धवराह ( आधी चाल सुअर की चलना ) ।
( ३ ) सिखाये हुये इशारों पर चलना नारोष्ट्र चाल कहलाती है ।
( ४ ) रथ में जोते जाने योग्य अधम घोड़ों को छह योजन, मध्यम घोड़ों को नौ योजन और उत्तम घोड़ों को बारह योजन चलाये जाने के बाद विश्राम देना चाहिये; अधम, मध्यम और उत्तम किस्म के भार ढोने वाले घोड़ों को इसी क्रम से पाँच, साढे सात और दस योजन चलाने के बाद विश्राम देना चाहिए ।
प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२७
(१) विक्रमो भद्राश्वासो भारवाह्य इति मार्गाः ।
(२) विक्रमो वल्गितमुपकण्ठमुपजवो जवश्च धाराः ।
(३) तेषां बन्धनोपकरणं योग्याचार्याः प्रतिदिशेयुः । साङ्ग्रामिकं रथाश्वालङ्कारं च सूताः । अश्वानां चिकित्सकाः शरीरह्लासवृद्धिप्रतीकारमृतुविभक्तं चाहारम् ।
(४) सूत्रग्राहकाश्वबन्धकयावसिकविधापाचकस्थानपालकेशकारजाङ्गलीविदश्च स्वकर्मभिरश्वानाराधयेयुः ।
(५) कर्मातिक्रमे चैषां दिवसवेतनच्छेदनं कुर्यात् । नीराजनोपरुद्धं वाहयतश्चिकित्सकोपरुद्धं वा द्वादशपणो दण्डः ।
(६) क्रियाभैषज्यसङ्गेन व्याधिवृद्धौ प्रतीकारद्विगुणो दण्डः । तदपराधेन वैलोम्ये पत्रमूल्यं दण्डः ।
( १ ) उक्त तीनों कोटि के घोड़ों की गति तीन प्रकार की होती है, यथा; १. मन्दगति, २. मध्यगति और ३. तीव्रगति ।
( २ ) मन्दगति से चलना, मध्यम गति से चलना, तीव्र गति से चलना, चौकन्ना होकर चलना, कूद-फाँदकर चलना, दायें-बायें होकर चलना, तेज-तेज चलना, इन सब तरह की चालों का नाम धारा है; धारा अर्थात् ढंग या क्रम ।
( ३ ) घोड़ों के विभिन्न अवयवों को किस प्रकार के आभूषणों से सजाना चाहिए, इसकी विधि, योग्य आचार्य बतलायें । युद्धोपयोगी घोड़ों और रथों को सजाने की सारी क्रिया का निर्देश सारथी करे । ऋतु के अनुसार घोड़ों का क्या-क्या आहार होना चाहिये एवं उनके मोटा होने या तंग होने का तरीका क्या है, इसका निर्देश अश्व-चिकित्सक करें ।
( ४ ) लगाम पहिना कर घोड़ों को टहलाने वाला नौकर, लगाम तथा जीन आदि चढ़ाने वाला कर्मचारी, घास खिलाने वाला नौकर, उनके लिये उड़द भूषा एवं चावल पकाने वाला रसोइया, घुड़साल की सफाई करने वाला व्यक्ति, घोड़ों के बाल तथा खुरें ठीक करने वाला नौकर और अश्वचिकित्सक; ये सभी नौकर-चाकर अपने-अपने कार्यों को नियत समय पर पूरा करते हुए घोड़ों की यथोचित परिचर्या करें ।
( ५ ) इनमें से जो भी कर्मचारी अपने कार्य को उचित रीति से न करे उसका उस दिन का वेतन काट लेना चाहिए । कुशल-क्षेम एवं बल-वृद्धि के लिए और चिकित्सा के लिए रोके गये घोड़ों को काम पर लगाने वाले व्यक्ति से बारह पण दण्डरूप में वसूल किए जाँय ।
( ६ ) घोड़ों की यथासमय चिकित्सा न करने के कारण यदि उनकी बीमारी बढ़ जाय तो इलाज में जितना व्यय हो, उसका दुगुना दण्ड अश्वशाला के अध्यक्ष