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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages
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७६ कर्मयोग

देष्टा तुम्हें केवल उपाय बतलाता है, जब तक तुम्हारा आन्तरिक उपदेशक आत्मा—जो तुम्हारे अन्तःकरण में विद्यमान है—उनको ग्रहण या आचरण न करेगा, तुम उनसे कुछ भी लाभ नहीं उठा सकते। यद्यपि तुम्हारा आत्मा तुमको प्रत्येक समय उपदेश करता रहता है, तथापि जब तक तुम्हारा मन एकाग्र नहीं होता तब तक तुम उसके उपदेश पर ध्यान नहीं देते। इसलिए जब तुम अपने मन को एकाग्र कर लोगे तब तुम्हें अपने आत्मा में ही सब कुछ दीखने लगेगा और तुम्हारे सारे संदेह और विकल्प स्वयं निवृत्त हो जायँगे। अभ्यास इस एकाग्रता को दृढ़ करता है। अभ्यास से पहले अनुभव, फिर इच्छा और फिर काम करने की शक्ति उत्पन्न होती है और इस शक्तिसे शरीर की सब नाड़ी और नसें संचालित होती हैं। यहाँ तक कि सारा शरीर निष्काम कर्मयोग का साधन बन जाता है और तब साधक को त्याग और वैराग्य की सिद्धि प्राप्त होती है। यह सिद्धि किसी सिद्धान्त, विश्वास या विशेष प्रकार की शिक्षा पर निर्भर नहीं है। चाहे साधक किसी मत पर विश्वास रखनेवाला या किसी सम्प्रदाय पर चलनेवाला हो, अभ्यास और एकाग्रता से समान लाभ उठा सकता है। किन्तु प्रश्न केवल यह है कि क्या तुम में निष्काम भाव है ? यदि है तो तुम बिना किसी धर्म-पुस्तक को पढ़ने के भी धर्मात्मा बन सकते हो। चाहे मन्दिर, मसजिद या गिरजे में जाओ या न जाओ; कर्मयोग में इनकी आवश्यकता नहीं। वहाँ केवल तुम्हारा हृदय-मन्दिर ही उपासनालय है। हमारे संपूर्ण योग बिना जाति, देश और धर्म-भेद के मनुष्य-मात्र को इसी स्थान पर पहुँचाते हैं। क्योंकि उन

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पाँचवाँ अध्याय

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सबका तात्पर्य मनुष्य को बन्धन से छुड़ा कर मुक्ति दिलाने का है। केवल मूर्ख और अज्ञानी पुरुष ही कहा करते हैं कि ज्ञान और कर्म में भेद है। विद्वान् लोग जानते हैं कि यद्यपि उनकी अवस्था और अधिकार में कुछ भेद हो, तथापि उन दोनों का लक्ष्य और उद्देश्य एक ही है।

छठा अध्याय

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छठा अध्याय

मुक्ति

कर्म का फल भी कर्म ही कहलाता है। मन, वचन और कर्म से जो फल उत्पन्न होता है, वह भी काल पांकर कर्म-चक्र में सम्मिलित हो जाता है। इस प्रकार कर्म से फल और फल से कर्म का चक्र संसार में सदा चलता रहता है। वस्तुतः कर्म में कार्य्य-कारण-भाव दोनों रहते हैं। जहाँ कोई कार्य होगा वहाँ उसका कारण अवश्य होगा, चाहे वह गुप्त हो। इसी प्रकार कारण की उपस्थिति में कार्य्य भी बिना हुए न रहेगा, चाहे अभी न हुआ हो। यह कर्म का सिद्धान्त, जिसको हमारा शास्त्र बतलाता है, संसार भर में सच्चा माना गया है। जो कुछ हम देखते, छूते या करते हैं, वह कर्म है। जहाँ उससे कुछ फल उत्पन्न होते हैं, वहाँ उन फलों के सम्बन्ध में बहुत से नये कर्म भी बन जाते हैं। जहाँ कहीं एक कर्म हो रहा है वहाँ उसके सम्बन्ध में अनेक कर्मों का बार बार होना आवश्यक और प्रत्यक्ष है। नैयायिक (तार्किक) लोगों ने इसके लिए एक विशेष परिभाषा "व्याप्ति" नियत कर ली है। उनके मतानुसार इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में हमारे संपूर्ण मानसिक, वाचिक और कायिक कर्मों में व्याप्ति काम कर रही है। मन में एक विशेष प्रकार का सङ्कल्प उठते ही हम देखते हैं कि उससे सम्बन्ध रखनेवाले और अनेक प्रकार के भाव तरङ्गों के

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छठा अध्याय

७६

समान उत्पन्न हो जाते हैं। यह एक प्रत्यक्ष बात है। संस्कृत में इसी को "व्याप्ति" कहते हैं। बाह्य और आन्तरिक जगत् में सर्वत्र यह सिद्धान्त समान रूप से काम करता है। एक भाव के पश्चात् दूसरे भाव का आना या युगपत् अनेक सम्बद्ध भावों का प्रादुर्भूत होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

दूसरी बात विचारणीय यह है कि यह कर्म का सिद्धान्त एक-देशी है या सर्वदेशी। यह पृथिवी, जिस पर हम रहते हैं, इस अपरिमित ब्रह्माण्ड का—जो देश काल और निमित्त के संयोग से बना है—एक छोटा सा भाग है। इससे स्पष्ट है कि यह संसार नैमित्तिक है। इससे आगे चल कर फिर कोई नियम (कानून) या उसका प्रभाव (असर) नहीं रहता। जब हम संसार का वर्णन करते हैं तब उससे हमारा अभिप्राय ब्रह्माण्ड के उस भाग से होता है, जिसको हमारे मन ने आक्रान्त (सीमाबद्ध) कर रक्खा है। और यह ऐन्द्रिय जगत् है जिसमें हम देखते, छूते, सुनते, अनुभव करते, सोचते और समझते हैं। इससे आगे चल कर फिर कार्य-कारण का नियम नहीं रहता। जो वस्तु हमारे मन और इन्द्रियों से परे है, वहाँ न प्रत्यक्ष का गम्य है न अनुमान का। इस सृष्टि में जहाँ तक नाम-रूप की छाप लगी हुई है वहीं तक कार्य-कारण-भाव की सीमा है और वहीं प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द काम करते हैं। इसी जगत् में प्राकृत नियम अपना काम करते हैं। यद्यपि यहाँ अपनी मानसिक शक्ति से हम काम लेते हैं, तथापि पूरी स्वतन्त्रता के न होने से हमारी आत्मिक-शक्ति दबी रहती है। यहाँ हमारा ज्ञान भी उस सीमा के भीतर और उन्हीं प्राकृत नियमों के अनुसार होता

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८० कर्मयोग

है। जिस वस्तु को हम जानते हैं, या जिसका जानना सम्भव है वह उस प्राकृत नियम के अधीन है, जिसके द्वारा हम अपने मन और इन्द्रियादि से काम लेते हैं और जहाँ अधीनता है, वहाँ "स्वतन्त्रता" इस शब्द का प्रयोग करना भी अनुचित है। परन्तु वह वस्तु जिसने देश, काल और निमित्त के संयोग से अपनी दशा और शक्ति में परिवर्तन स्वीकार किया है, जो पहले सम्पूर्ण शक्तियों का केन्द्र था और अब भी है (चाहे प्रकृति के आवरण ने कुछ काल के लिए उन शक्तियों को दबा दिया हो) स्वरूप से मुक्त (पूर्ण स्वतन्त्र) है। उसमें तभी तक यह बन्धन है जब तक देश, काल और निमित्त का संयोग है। जहाँ यह संयोग मिटा वहाँ वह फिर शुद्ध बुद्ध और मुक्त है। वह मुक्ति से आकर बन्धन में पड़ा है, बन्धन से छूट कर फिर मुक्त हो जाता है।

यह प्रश्न उपनिषदों में आता है कि यह संसार कहाँ से उत्पन्न हुआ, किसमें रहता है और कहाँ जायगा। इस का यह उत्तर दिया गया है कि वह मोक्ष से आता है, बन्धन में रहता है और फिर मोक्ष को चला जायगा। अतएव जहाँ कहीं और जब कभी हम मनुष्य का वर्णन करते हैं, वहाँ और तब हमारा यह अभिप्राय होता है कि यह मनुष्य उस अनन्त, अखण्ड और सर्वव्यापक सत्ता का एक अंश है। यह ब्रह्माण्ड स्वयं उस अनन्त सत्ता में एक बिन्दु की उपमा रखता है। हमारे कर्म और उनके फल, इच्छायें और आशायें सब इसी ऐन्द्रिय-जगत् से सम्बन्ध रखते हैं और हमारी उन्नति और अवनति भी इसीके भीतर हो रही है। यह आशा करना कि यह जगत् सदा रहेगा एक बाल-चेष्टा है। इसके

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अस्तित्व का कारण केवल हमारा मन है। स्वर्ग भी इसी जगत् का एक कल्पित रूपान्तर है। तुम ज़रा सोचो तो सही, इस बात की इच्छा करना कि अनन्त और अपरिमित सत्ता हमारे इस परिमित जगत् के अनुसार हो, कैसी अनुचित और बालेच्छा है। जो मनुष्य इस संसार पर ऐसा मोहित हो गया है कि बार बार इस संसार में ही जन्म लेकर रहने की इच्छा प्रकट करता है वह आध्यात्मिक पद से यहाँ तक गिर गया है कि उस सर्वोच्च पद की भावना तक अपने मन में नहीं कर सकता। वह इस छोटे से जगत् को ही सब कुछ मान रहा है, उसको उस अनन्त सत्ता का ज्ञान ही नहीं है। उसकी धारणा क्षणिक सुख-दुःख और हर्ष-शोक तक ही पर्याप्त है। वह परिमित को ही अपरिमित और पराधीनता को ही स्वाधीनता समझ रहा है। भगवान् बुद्ध कहते हैं कि वह तृष्णा के समुद्र में डूबा हुआ इस जीवन को ही सर्वस्व समझता है। सम्भव है इस जगत् से बाहर करोड़ों प्रकार के सुख हों, असंख्य उन्नति के सोपान हों, अगणित नियम अपना काम करते हों। क्योंकि जिस जगत् में हम रहते हैं वह उस अनन्त ब्रह्माण्ड का समुद्र में बिन्दुवत् एक छोटा सा अंश है।

मोक्ष प्राप्त करने के लिए हमको इस संसार की सीमा से बाहर जाना होगा, यहाँ उसकी आशा रखना व्यर्थ है, क्योंकि वह यहाँ नहीं है। पूर्ण शान्ति जिसमें सारे प्राकृत विकार नष्ट हो जाते हैं, इस संसार में नहीं है, न स्वर्ग और न वैकुण्ठ में है, न किसी ऐसे स्थान में मिल सकती है जहाँ हमारा मन और चित्त पहुँच सकता है। ऐसे किसी स्थान में मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि ये

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कर्मयोग

सारें स्थान हमारे सीमाबद्ध संसार में होंगे और देश, काल और निमित्त से घिरे हुए होंगे । यह सम्भव है कि आकाश-मण्डल में ऐसे अगणित लोक या स्थान हों, जहाँ अत्यन्त सूक्ष्म सृष्टि बसती हो और वहाँ के भोग-विलास और सुख-साधन यहाँ की अपेक्षा उत्तम हों। परन्तु ये लोक और स्थान भी इसी संसार के अन्तर्गत हैं और इसलिए बन्धन के नियम से मुक्त नहीं हो सकते । मुमुक्षु को इनसे भी परे जाना होगा। जहाँ यह संसार समाप्त होगा वहीं से, उस परम पद का आरम्भ होता है । ये सुख-दुःख और हर्ष-शोक और इनका संवेदन सब यहीं समाप्त हो जाता है । वहाँ केवल आत्म-दर्शन और तज्जनित आनन्द शेष रहता है । जब तक हम इस परिवर्त्तन-शील और क्षण-भङ्गुर जगत् से बेलाग नहीं होते और जब तक तृष्णा की तरङ्गें हमें मोह के समुद्र में बहाये लिये जा रही हैं, तब तक हम मुक्ति के अधिकारी नहीं बन सकते और न शान्ति के तट पर पहुँच सकते हैं। केवल विवेक का पोत (जहाज़) ही हमको इस दुस्तर समुद्र के पार लगा सकता है । विवेक हमको बतलाता है कि उस परम स्वाधीनता (मुक्ति) के प्राप्त करने का (जो मनुष्य-जीवन का उद्देश है) केवल एक ही उपाय है और वह यह है कि इस असार जीवन का मोह त्याग दिया जावे । स्वर्ग, नरक, शरीर, मन और इन्द्रिय इन सब से विरक्ति स्वीकार कर ली जाय । क्योंकि वे सब परिमित और क्षणिक हैं। बन्धन से छुटकारा पाने के लिए आवश्यक है कि कार्य-कारण और उनके नियमों की सीमा से हम बाहर हो जावें ।

परन्तु इस संसार का छोड़ना बहुत कठिन काम है । विरले

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कर्मयोग ८३

ही मनुष्य इस योग्य हो सकते हैं। हमारे शास्त्रों में इसके दो साधन बतलाये गये हैं। एक को "नेति, नेति" "यह नहीं, यह नहीं" कहते हैं। दूसरे को "इति, इति" "यह है, यह है" कहते हैं। पहला निवृत्ति-मार्ग और दूसरा प्रवृत्ति-मार्ग कहलाता है। इनमें से पहला अत्यन्त कठिन है। उसकी केवल वेही मनुष्य साधना कर सकते हैं, जिन्होंने अपने इन्द्रिय और मन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करके संसार और उसके विषयों को विषवत् त्याग दिया है; सांसारिक कोई इच्छा या आशा कभी जिनको अपने उद्देश से विचलित नहीं कर सकती। परन्तु ऐसे मनुष्य विरले ही होते हैं। साधारण मनुष्यों को दूसरे मार्ग का अनुसरण करना पड़ता है। यह मार्ग पहले की अपेक्षा सरल है। इसमें वे संसार के समस्त बन्धनों में रहते हुए और अपने कर्तव्य-कर्म का आचरण करते हुए अन्त में जाकर उन सबको छिन्न भिन्न कर डालते हैं। यह भी एक प्रकार का तप है। भेद केवल इतना है कि यह काम क्रमशः और शनैः शनैः होता है। इसमें मनुष्य क्रमशः अपना अनुभव और अभ्यास बढ़ाते हुए, त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और काम से लाभ उठाते हुए, सत्यासत्य, हिताहित और कर्माकर्म का विवेक प्राप्त करते हुए अन्त में जाकर निष्काम बन जाता है और मुक्त हो जाता है। निवृत्ति-मार्ग वाले केवल ज्ञान की सहायता से अपना काम करते हैं। वे अपने उद्देश की सिद्धि में कर्म का सहारा लेना नहीं चाहते। इसी को सांख्य और वेदान्त की परिभाषा में "ज्ञानयोग" कहते हैं। प्रवृत्ति-मार्गवाले कर्म की नींव पर अपना मन्दिर निर्माण करते हैं। उनकी दृष्टि में बिना कर्म के

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कर्मयोग

कोई सिद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। यह "कर्मयोग" है, इसमें उत्साह और तीव्रता के साथ कर्म करना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य के लिए कर्म करना आवश्यक है। केवल वे लोग जो सदा आत्मा के ही ध्यान में निमग्न रहते हैं, आत्मा के सिवा न किसी को देखते, न सुनते और न अनुभव करते हैं। जिनका सब कुछ आत्मा ही है, वे अलबत्ता कर्म के बन्धन से मुक्त हैं; अन्य सबको कर्म करना ही पड़ता है। पानी की लहर ज़ोर के साथ चलती है और किसी गहरी जगह में पहुँच कर भँवर बन जाती है और बार बार चक्कर लगा कर फिर ज़ोर के साथ वह निकलती है और स्वतन्त्र लहर बन जाती है। मनुष्य का जीवन एक निरन्तर बहनेवाला प्रवाह है, जिसमें इच्छाओं की अनेक लहरें उठा करती हैं, जो उसको मोह के गम्भीर भँवर में फँसा देती हैं, जिसमें पड़ा हुआ मनुष्य चक्कर खाया करता है। देश, काल और निमित्त के संयोग से कुछ दिन इसको इस भँवर में फँसा रहना पड़ता है। माता, पिता, भ्राता और पुत्रादि के मोह तथा ख्याति और प्रशंसा के लोभ में तड़पना होता है। पर अन्त में जाकर वह उससे निकल भागता है और स्वतन्त्र लहर के समान उस अवस्था में पहुँच जाता है, जिसमें फिर कोई बन्धन नहीं रहता।

चाहे हम इसको जानें या न जानें, मूर्ख हों या पण्डित; पर इसमें संदेह नहीं हो सकता कि हम सब लोग संसार के बन्धन से मुक्त होने के लिए कर्म करते रहते हैं। मनुष्य का अनुभव उसके जीवन की नौका को भवसागर से पार लगाने के लिए पतवार का काम देता है। सारा संसार कर्म कर रहा है, जड़ से लेकर चेतन तक

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छठा अध्याय

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और अणु से लेकर सूर्य्य तक सब कर्म कर रहे हैं। कोई एक क्षण भर के लिए भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। यह कर्म क्यों हो रहा है? मुक्ति के लिए। सब मुक्ति चाहते हैं और बन्धन से भागते हैं। संसार में दो प्रकार की शक्तियाँ काम कर रही हैं। एक आकर्षक, दूसरी विकर्षक। आकर्षक शक्ति वह है कि जो हमें मुक्ति की ओर खींच रही है और विकर्षक शक्ति वह है, जो हमें बन्धन से हटा रही है।

कर्मयोग हमें क्या सिखाता है? कर्म किस प्रकार करना चाहिए? यही कर्मयोग की शिक्षा है। जो इस विद्या को नहीं जानता, वह सदा संसार की चक्की में पिसता रहता है। कर्मयोग ही से हम कर्म के रहस्य को समझते हैं। इसी से कर्म के बन्धन को, जिस प्रकार काँटे से काँटे को और विष से विष को दूर करते हैं, शिथिल कर सकते हैं। यदि हम कर्मयोग को नहीं जानते तो कर्म करने में हमारी शक्ति का दुरुपयोग ही नहीं होता, किन्तु वह कर्म और भी हमारे बन्धन को दृढ़ कर देता है। कर्मयोग कर्म का सायन्स है, इससे तुम सीख सकते हो कि किस प्रकार कर्म करने से उसका फल शीघ्र और तुम्हारे अनुकूल हो सकता है। कर्म करना आवश्यक है, तथापि हमको किसी श्रेष्ठ उद्देश को सम्मुख रख कर कर्म करना चाहिए। कर्मयोग हमको बतलावेगा कि यह संसार परिवर्तनशील है, इसमें स्थायी सुख नहीं है। यह उस स्थान तक हमको पहुँचाने के लिए (जहाँ निराबाध सुख है) एक मार्ग (सड़क) है। हमको धीरे धीरे बल और अधिकार प्राप्त करते हुए इस सड़क से जाना है। संसार में शुकदेव जैसे मनुष्य बिरले ही होते

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८६ कर्मयोग

हैं जो एकदम संसार को छोड़ कर उससे विरक्त हो जाते हैं; जैसे साँप केचुली को छोड़ कर उससे अलग हो जाता है। ऐसे लोगों के लिए कर्मयोग का विधान नहीं है। यह सड़क प्रायः उन्हीं लोगों के लिए बनाई गई है कि जो संसार की एषणाओं को सहसा नहीं त्याग सकते। सांसारिक सुखों का अनुभव करते हुए जो मुक्ति की ओर जाना चाहते हैं, ऐसे लोगों को कर्मयोग बतलाता है कि वे किस प्रकार कर्म के द्वारा अपने अभीष्ट को सिद्ध कर सकते हैं।

कर्मयोग हमें शिक्षा देता है कि "उत्साह के साथ कर्म किये जाओ परन्तु बेलाग बने रहो। उसके फल में अपने को न लपेटो, अपने मन को वश में रक्खो।" तुम देखते हो, संसार में सुख-दुःख का चक्र चल रहा है। कभी हर्ष है, कभी शोक है। ये आगन्तुक अवस्थायें हैं, इनसे हमारे आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं। हमारा आत्मा सुख-दुःख से परे है। ये सब इन्द्रिय और मन के विकार हैं, जिनको मूर्खता से हम आत्मा में आरोपित कर लेते हैं। दुःख केवल संसर्ग से उत्पन्न होता है; कर्म से नहीं। जब हम किसी कर्म के फल में लिपट जाते हैं तभी दुःख का अनुभव करने लगते हैं। किन्तु यदि हम उससे अलग रह सकें, तो रात-दिन कर्म करते हुए भी कभी दुःखी न होंगे। दूसरे के घर में आग लगने से हमें दुःख नहीं होता, परन्तु जब हमारे घर में आग लगती है तो हम रोते हैं। हज़ारों मनुष्य प्रति दिन मरते रहते हैं, हमें मालूम भी नहीं होता, परन्तु जब कोई हमारा सम्बन्धी या आत्मीय मर जाता है तो हम शोक से विह्वल हो जाते हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण केवल ममता है। जिन पदार्थों में हमारी ममता है अर्थात् जिनको

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हम अपना समझते हैं, उनके वियोग से हमें दुःख होता है और जहाँ ममत्व बुद्धि नहीं है, वहाँ न संयोग से सुख और न वियोग से दुःख होता है। जिस घर या मनुष्य को हमने अपना मान रक्खा था, उसके नष्ट होने से हमको दुःख होता है और जिस घर या मनुष्य से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है, उसके नष्ट होने से हमें कुछ भी दुःख नहीं होता। इससे सिद्ध है कि सम्बन्ध ( लगाव ) ही सारे दुःखों की जड़ है। सम्बन्ध ही से स्वार्थ उत्पन्न होता है और स्वार्थ दुःख का मूल है। चित्त में मेरे-पन और तेरे-पन की जितनी लहरें उठती हैं, उनके साथ पराधीनता की बेड़ियाँ लगी रहती हैं, जो मनुष्य को जकड़ कर बाँध लेती हैं। इसलिए कर्म-योग हमको बतलाता है कि तुम संसार के सब पदार्थों को देखो और उनसे प्रसन्नता-लाभ करो, परन्तु उनको अपना कभी मत समझो, यहाँ तक कि अपने शरीर पर भी ममत्व-बुद्धि न करो। यह कभी न कहो कि यह वस्तु मेरी है। जिसको तुम अपना कहोगे वही तुम्हारे दुःख का कारण बन जायगी। मेरा पुत्र, मेरा घर, मेरा शरीर ये सब बन्धन और दुःख की परिभाषायें हैं, जो अज्ञानी लोगों ने बना ली हैं। वास्तव में न हमारा कोई है और न हम किसी के हैं। हम केवल साक्षी मात्र बन कर संसार में आते हैं, पर अविद्या से वादी और प्रतिवादी बन जाते हैं और इसीसे सारे झगड़े पैदा होते हैं। यह शरीर क्या है ? आत्मा का एक कल्पित चित्र या मूर्त्ति है। जैसे किसी चित्र या मूर्त्ति के टूटने फूटने से शरीर को कुछ हानि नहीं पहुँचती वैसे ही इस शरीर के नष्ट होने से आत्मा का कुछ नहीं बिगड़ता।

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८८ | कर्मयोग

कर्मयोग कहता है कि स्वार्थ की जड़ काट कर फेंक दो। जब तुम इसको अपने हृदय में अवकाश ही न दोगे तब इसकी लहरें तुम पर अपना कुछ भी प्रभाव न कर सकेंगी। जब यह अवस्था प्राप्त हो जायगी तब संसार में जहाँ चाहो वहाँ जाओ, जो चाहो सो करो; तुम निर्लेप रहोगे। कमल पानी में रहता है, पर पानी उसके पत्तों को तर नहीं कर सकता। ऐसे ही तुम संसार में रहते हुए और कर्म करते हुए उसके प्रभाव से बचे रहो। बस, यही सच्चा वैराग्य है। मैं तुमसे कह चुका हूँ कि किसी प्रकार का योग बिना वैराग्य के नहीं हो सकता। खाना-पीना छोड़ने से या जङ्गल में जाने से वैराग्य नहीं होता। जब तक शरीर है, उसकी रक्षा के लिए मनुष्य को कर्म करना पड़ेगा और यह उसका धर्म है। वैराग्य का सम्बन्ध शरीर से नहीं है, किन्तु मन से है। बिना मन को वश में किये शरीर सुखा देने से कोई वैरागी नहीं बन सकता। जिसका मन मेरा और तेरा-पन की ज़ंजीर से निकल गया है, वह यद्यपि शरीर-यात्रा के लिए सब कुछ उपाय काम में लाता हो, तथापि उनमें आसक्त न होने से वह वैरागी है। विपरीत इसके वह मनुष्य जो इन्द्रियों से काम करना छोड़ देता है, परन्तु मन से विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह रागी है और जब तक उसका मन विषयों से उपरत न होगा, केवल इन्द्रियों को रोकने से वह वैराग्य का अधिकारी नहीं हो सकता *। सम्भव है, एक मनुष्य राज-


  • "कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥"

जो कर्मेन्द्रियों को रोक कर मन से विषयों का चिन्तन करता है वह मिथ्याचारी (धोखा देने वाला) है।

—भगवद्गीता।

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छठा अध्याय

सिंहासन पर बैठा हुआ संसार से विरक्त हो, दूसरा चिथड़ा लपेटे हुए साधुवेश में पूरा संसारी हो। कर्म-योग का यथार्थ उपयोग हम को वैराग्य का अधिकारी बनाता है।

कर्मयोग में वैराग्य दो प्रकार का है। एक उन लोगों के लिए है, जो ईश्वर पर विश्वास नहीं रखते और न किसी प्रकार की बाह्य सहायता की अपेक्षा रखते हैं। वे अपने बाहुबल पर भरोसा रखते हैं और अपनी प्रबल मानसिक शक्ति से बहु-विध ऐश्वर्य और अधिकारों के स्वामी होने पर भी कहते हैं कि “मैं बेलाग रहूँगा”। ऐसे लोग अपने अनुभव और विवेक के अनुसार काम करते हैं। जो लोग ईश्वर-भक्त हैं, उनके लिए वैराग्य का दूसरा मार्ग है और जो पहले की अपेक्षा कठिन नहीं है। वे अपने कर्म-फल को ईश्वरार्पण करते हैं। वे कर्म अवश्य करते हैं, पर उसके फल की इच्छा नहीं रखते। वे जो कुछ करते, देखते और सुनते हैं, वह सब ईश्वर के लिए है। यदि कोई अच्छा काम हम करें तो हमको उसका अभिमान न करना चाहिए और न प्रशंसा की आशा रखनी चाहिए। क्योंकि हम उसका फल ईश्वर के अर्पण कर चुके हैं या हमको यह समझना चाहिए कि हमने कुछ भी काम नहीं किया है। जैसे कोई नौकर अपने स्वामी के लिए काम करता है और वह स्वामी का ही काम कहलाता है और वही उसके यश का भागी भी होता है; सेवक को कोई जानता भी नहीं, वैसे ही हम उस ईश्वर के सेवक और उपासक हैं। हम काम करने के निमित्त मात्र हैं। प्रेरक व नियोजक हमारा वही है। हम सेवक-वत् उसकी आज्ञा का पालन करते हैं, इसलिए हमारा उस पर

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६० | कर्मयोग

कोई स्वत्व नहीं है। जो कुछ तू देखता है, जो कुछ तू करता है और जो कुछ तेरे अधिकार में है, सब उसको अर्पण कर दे। यहाँ तक कि अपना तन-मन भी उसी की सेवा में अर्पण कर दे। यही सब यज्ञों में बड़ा आत्म-यज्ञ है। जो अपनी आहुति इस यज्ञ में देते हैं और परमात्मा से यह प्रार्थना करते हैं कि “हे परमात्मन्! सारे संसार को धन की इच्छा है, मेरा धन तू है। तेरे सिवा और कोई मेरी सम्पत्ति नहीं। मैं तेरे नाम पर अपनी भेंट चढ़ाता हूँ। किसी को अपने इष्ट की चाह है, मेरा इष्टतम तू है, तेरे बिना मेरा जीवन निष्फल है, मैं तुझ पर अपने आप को वलि देता हूँ। मुझ को मेरा कुछ नहीं चाहिए। बुरा हो या भला या इन दोनों से विलक्षण; मुझे किसी की परवा नहीं। मैं सब कुछ तुझ पर और तेरे नाम पर समर्पित करता हूँ।” रात-दिन इसी मन्त्र का जाप करते रहो और उसके प्रेम और भक्ति में अपने आपे को भुला दो। यही सच्चा त्याग है और इसी को पूर्ण वैराग्य कहते हैं।

कर्मयोग हमें यद्यपि कर्म करने की शिक्षा देता है तथापि उसका उद्देश हमें कर्म के बन्धन से मुक्त करना है। वह तटस्थ होकर साधारण धर्मों के पालन करने का विरोधी नहीं, तथापि उन्हीं में आसक्त होकर उनके तुच्छ-फल के मूल्य में अपने अमूल्य जीवन को बेच देना यह उसको अभिमत नहीं है। धार्मिक या लौकिक आचारों का पालन करना वहीं तक अच्छा है, जहाँ तक मनुष्यों को उनसे अपने कर्त्तव्य-पालन में सहायता मिलती है या जहाँ तक उनसे स्वार्थ, आग्रह, राग और द्वेष के संस्कार उभरने

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कर्मयोग ६१

नहीं पाते। कर्मयोगी इन व्यक्ति-गत या जाति-गत धर्मों में प्रवृत्त नहीं होता, उसका धर्म-कर्म जो कुछ है, वह सब ईश्वर की भक्ति और उसका सच्चा प्रेम है। ईश्वर सब का है, इसलिए उसका धर्म भी सबकी सेवा और सब से प्रेम करना है। जिन धर्मों का सेवन करने से सांसारिक बन्धन दृढ़ होते हैं, यदि तुम कर्मयोगी बनना चाहते हो तो, उनके लिए मत ललचो। तुम चाहे किसी धर्म का पालन करो, पर अपने मन में इस बात का अभिमान कभी न करो कि मैं इसका करनेवाला हूँ या यह मेरा धर्म या कर्म है। जहाँ तुमने मेरा कहा, बस वहीं लगाव पैदा हुआ और यह लगाव ही तुम्हारे गले की फाँसी है। जब तुम अपना सर्वस्व ही ईश्वर के अर्पण कर चुके तब तुम्हें यह अधिकार ही कब है कि तुम किसी वस्तु को (चाहे वह तुम्हारे शरीर के भीतर हो या बाहर) अपना कह सको। हम सब उसी के आज्ञानुसार काम कर रहे हैं, हमको प्रहार और उपहार (सज़ा व जज़ा) से क्या काम! यदि हम पारितोषिक लेना चाहते हैं तो हमको दण्ड भी अवश्य मिलेगा। दण्ड से बचने का केवल यह उपाय है कि पारितोषिक की मन में कल्पना भी न की जाय। दुःख से बचने का सिवा इसके और क्या उपाय हो सकता है कि हम सुख की कल्पना को सर्वथा त्याग दें। क्योंकि सुख-दुःख दोनों साथ साथ मिले रहते हैं। जहाँ सुख है वहीं दुःख भी है। जीवन के साथ मरण लगा हुआ है, जो जीना चाहता है उसके लिए अवश्य मौत है। हाँ, यदि हम जीवन की इच्छा और मोह छोड़ दें तो निस्स-न्देह मौत को जीत सकते हैं। यदि विचार-दृष्टि से देखा जावे तो

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जीवन और मरण इन दोनों में नाम मात्र का भेद है, वस्तुतः ये एक ही पदार्थ के दो सापेक्ष्य धर्म या अङ्ग हैं। सुख बिना दुःख के या जीवन बिना मरण के एक बाल-प्रलाप है।

अतएव जो कर्म करो, उसके लिए न तो प्रशंसा की और न ख्याति की लालसा रक्खो। हम में यह निर्बलता है, अच्छा काम पीछे करते हैं, प्रशंसा पहले चाहते हैं। यदि किसी धर्म-कार्य में कुछ दान देते हैं, तो जब तक समाचारपत्रों में छप नहीं जाता, हम को चैन नहीं पड़ता। संसार में प्रायः बहुत बड़े और प्रथम श्रेणी के मनुष्य हुए हैं, जिनका कोई नाम भी नहीं जानता, इतिहास की तो कथा ही क्या है। प्रत्येक देश में ऐसे महात्मा पुरुष हुए हैं, जिन्होंने चुपचाप कर्म करते हुए अपना जीवन बिताया और चुपचाप ही अपना काम पूरा करके चल दिये। समय आया कि उनके विचार और उपदेशों ने बुद्ध और ईसा जैसी प्राकृत मूर्तियाँ धारण कीं, जिनको हम जानते हैं। बड़े आदमी नाम और प्रतिष्ठा के भूखे नहीं होते। वे अपने शुद्ध संस्कार और पवित्र विचार लोगों को दे जाते हैं। न वे कोई पन्थ चलाते हैं, न संप्रदाय बनाते हैं, न अपने नाम से कोई धार्मिक या दार्शनिक परिपाटी चलाते हैं। उनमें मान और मत्सर का लेश भी नहीं होता, वे सात्विक भावों से परिपूर्ण होते हैं। मैं एक ऐसे ही योगी को जानता हूँ, जो आर्यावर्त्त में रहता है। वह अपने शरीर और जीवन तक से निरपेक्ष है। उसने अपने आपे को बिलकुल भुला दिया है। यदि कोई जन्तु उसके एक हाथ को काटना चाहे, तो वह दूसरे हाथ को भी उसके सामने कर देता है और यह कहता है कि "परमात्मन् ! आपकी इच्छा

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छठा अध्याय

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पूर्ण हो।" उसकी दृष्टि में सब कुछ ईश्वर का है और उसी के लिए है। वह सब सङ्ग और सम्बन्धों से पृथक् होने पर भी प्रेम और पवित्रता का आदर्श है।

इनके पश्चात् उन लोगों का नम्बर आता है जो रजोगुणी अर्थात् राजस-वृत्तिवाले हैं। इनमें उत्साह, आन्दोलन और प्रयत्न की शक्ति होती है। ये सात्विक-भाववालों का अनुकरण करते हैं, संसार को उनका उपदेश सुनाते हैं। प्रथम कक्षा के लोग चुपचाप शान्ति के साथ सच्चे और शुद्ध भावों को इकट्ठा कर जाते हैं। दूसरी कक्षा के लोग अपने उद्योग और पुरुषार्थ द्वारा उनका संदेश लोगों को पहुँचाते हैं। गौतम-बुद्ध के जीवन-चरित्र में हमने कई बार पढ़ा है कि २४ बुद्ध उससे पहले हो चुके हैं और वह २५वाँ है। उन २४ बुद्धों के नाम तक को कोई नहीं जानता। किन्तु गौतम-बुद्ध, जो ऐतिहासिक बुद्ध है, स्पष्ट कहता है कि उसने अपने प्रचार का काम उनके उपदेशों के आधार पर आरम्भ किया है। उच्चकक्षा के मनुष्य सदा शान्त और प्रसन्न-चित्त रहते हैं। वे उच्च भावों की शक्ति को जानते हैं। उनको विश्वास है कि यदि वे अपनी गुफा के द्वार बन्द करके पाँच उच्च-कोटि के सिद्धान्त भी मनुष्यों के वास्ते छोड़ जायँगे तो भी, जब तक सृष्टि है, उनका यह पवित्र स्मारक संसार में बना रहेगा। वस्तुतः ये सिद्धान्त पहाड़ों को छेदते हुए, समुद्रों को चीरते हुए, संसार में परिक्रमण करते रहेंगे और अवसर पाकर मनुष्यों के हृदय और मस्तिष्क में प्रवेश करके उन्हें पवित्र और उच्च बना देंगे, जिनके प्रताप से मानुष-जीवन का उद्देश सफल और पूर्ण हो जायगा। ये सात्विक मनुष्य ईश्वर के

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६४ कर्मयोग

इतने समीप होते हैं कि इनको आन्दोलन, उपदेश और कर्त्तव्य-कर्मों के पालन करने का अवकाश ही नहीं रहता।

उत्साह से कर्म करनेवाले चाहे कितने ही धर्मात्मा हों, फिर भी उनमें कुछ न कुछ अज्ञान का लेश रहता ही है। जब तक हम में अपूर्णता है, तभी तक हम कर्म करते हैं। कर्म में फिर भी कुछ न कुछ स्वार्थ या सम्बन्ध का योग रहता ही है। जिनकी सब इच्छायें ईश्वर में अर्पित हो गई हैं और जिनका आत्मा ईश्वरमय हो गया है, उनके लिए कर्म नहीं है। वे चाहे स्वाभाविक कर्म करते रहें, परन्तु कर्तृत्व का व्यपदेश उनमें नहीं होता। ऐसे ही लोग उस सबसे बड़े पद—मोक्ष—के अधिकारी हैं। हम में से बहुत से मनुष्य ऐसे होंगे जो अपने को बड़ा आदमी समझते हैं, किन्तु अपने आप को बड़ा समझने से कोई बड़ा नहीं होता। बड़ा वह है जिसको संसार बड़ा कहे। हम जब संसार को छोड़ देते हैं, पाँच मिनट में संसार हमको भूल जाता है। परन्तु ईश्वर की सत्ता अपरिमित है। यदि उसकी इच्छा न हो तो कौन जी सकता है। वह आत्माओं का आत्मा है। प्राकृत और अप्राकृत सारी शक्तियाँ उसमें हैं और उसकी हैं। उसीकी आज्ञा से वायु चलता है, सूर्य चमकता है, पृथ्वी भ्रमण करती है और मृत्यु प्राणियों को अपना भक्ष्य बनाता है। वह सब में है और सब कुछ है। तुम जो कुछ कर सकते हो, उसके लिए करो, अपने लिए फल की वासना मत रक्खो। यही सच्चा त्याग है, इसी से कर्म-बन्धन की फाँसी कटती है और यही मुक्ति का सीधा मार्ग है, जिसकी पहली सीढ़ी कर्मयोग है।

सातवाँ अध्याय

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सातवाँ अध्याय

कर्मयोग का आदर्श

वेदान्त का यह एक बड़ा गम्भीर सिद्धान्त है कि हम भिन्न भिन्न मार्गों से एक ही सर्वाभिमत स्थान पर पहुँच जाते हैं। वे भिन्न भिन्न मार्ग आंशिक रीति पर तो बहुत से हैं, परन्तु उनमें चार मुख्य हैं, जिनमें सब आ जाते हैं। पहला कर्म, दूसरा भक्ति या प्रेम, तीसरा विज्ञान और चौथा ज्ञान। पर तुमको स्मरण रखना चाहिए कि ये मार्ग ऐसे नहीं हैं कि इनका परस्पर एक दूसरे से कुछ सम्बन्ध न हो। ये सब आपस में मिले-जुले हैं। तुम को संसार में ऐसा कोई भी मनुष्य न मिलेगा जो केवल कर्म ही करता हो। न ऐसा ही जन दृष्टि पड़ेगा जो केवल ईश्वर-पूजा और भक्ति में ही अपना सारा समय लगाता हो और न कोई ऐसी ही व्यक्ति मिलेगी जो केवल आत्मिक ज्ञान में ही रमण करती हो और उसको कर्म और भक्ति से कुछ लगाव न हो। यह विभाग केवल अवस्था और अधिकार-भेद से है। हम यह कह चुके हैं कि ये चारों मार्ग मिलकर एक हो जाते हैं। सब धर्म और कर्म के सारे अनुष्ठान और पूजा के सारे अङ्ग एक ही अभिमत स्थान पर पहुँचाने का प्रबन्ध करते हैं।

मैंने तुमको उस अभीष्ट स्थान के समझाने की भी चेष्टा की है। वह केवल मोक्ष है, जिसको स्वातन्त्र्य की पराकाष्ठा कहना