कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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देष्टा तुम्हें केवल उपाय बतलाता है, जब तक तुम्हारा आन्तरिक उपदेशक आत्मा—जो तुम्हारे अन्तःकरण में विद्यमान है—उनको ग्रहण या आचरण न करेगा, तुम उनसे कुछ भी लाभ नहीं उठा सकते। यद्यपि तुम्हारा आत्मा तुमको प्रत्येक समय उपदेश करता रहता है, तथापि जब तक तुम्हारा मन एकाग्र नहीं होता तब तक तुम उसके उपदेश पर ध्यान नहीं देते। इसलिए जब तुम अपने मन को एकाग्र कर लोगे तब तुम्हें अपने आत्मा में ही सब कुछ दीखने लगेगा और तुम्हारे सारे संदेह और विकल्प स्वयं निवृत्त हो जायँगे। अभ्यास इस एकाग्रता को दृढ़ करता है। अभ्यास से पहले अनुभव, फिर इच्छा और फिर काम करने की शक्ति उत्पन्न होती है और इस शक्तिसे शरीर की सब नाड़ी और नसें संचालित होती हैं। यहाँ तक कि सारा शरीर निष्काम कर्मयोग का साधन बन जाता है और तब साधक को त्याग और वैराग्य की सिद्धि प्राप्त होती है। यह सिद्धि किसी सिद्धान्त, विश्वास या विशेष प्रकार की शिक्षा पर निर्भर नहीं है। चाहे साधक किसी मत पर विश्वास रखनेवाला या किसी सम्प्रदाय पर चलनेवाला हो, अभ्यास और एकाग्रता से समान लाभ उठा सकता है। किन्तु प्रश्न केवल यह है कि क्या तुम में निष्काम भाव है ? यदि है तो तुम बिना किसी धर्म-पुस्तक को पढ़ने के भी धर्मात्मा बन सकते हो। चाहे मन्दिर, मसजिद या गिरजे में जाओ या न जाओ; कर्मयोग में इनकी आवश्यकता नहीं। वहाँ केवल तुम्हारा हृदय-मन्दिर ही उपासनालय है। हमारे संपूर्ण योग बिना जाति, देश और धर्म-भेद के मनुष्य-मात्र को इसी स्थान पर पहुँचाते हैं। क्योंकि उन