कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
Page 96 of 115
Read in context६० | कर्मयोग
कोई स्वत्व नहीं है। जो कुछ तू देखता है, जो कुछ तू करता है और जो कुछ तेरे अधिकार में है, सब उसको अर्पण कर दे। यहाँ तक कि अपना तन-मन भी उसी की सेवा में अर्पण कर दे। यही सब यज्ञों में बड़ा आत्म-यज्ञ है। जो अपनी आहुति इस यज्ञ में देते हैं और परमात्मा से यह प्रार्थना करते हैं कि “हे परमात्मन्! सारे संसार को धन की इच्छा है, मेरा धन तू है। तेरे सिवा और कोई मेरी सम्पत्ति नहीं। मैं तेरे नाम पर अपनी भेंट चढ़ाता हूँ। किसी को अपने इष्ट की चाह है, मेरा इष्टतम तू है, तेरे बिना मेरा जीवन निष्फल है, मैं तुझ पर अपने आप को वलि देता हूँ। मुझ को मेरा कुछ नहीं चाहिए। बुरा हो या भला या इन दोनों से विलक्षण; मुझे किसी की परवा नहीं। मैं सब कुछ तुझ पर और तेरे नाम पर समर्पित करता हूँ।” रात-दिन इसी मन्त्र का जाप करते रहो और उसके प्रेम और भक्ति में अपने आपे को भुला दो। यही सच्चा त्याग है और इसी को पूर्ण वैराग्य कहते हैं।
कर्मयोग हमें यद्यपि कर्म करने की शिक्षा देता है तथापि उसका उद्देश हमें कर्म के बन्धन से मुक्त करना है। वह तटस्थ होकर साधारण धर्मों के पालन करने का विरोधी नहीं, तथापि उन्हीं में आसक्त होकर उनके तुच्छ-फल के मूल्य में अपने अमूल्य जीवन को बेच देना यह उसको अभिमत नहीं है। धार्मिक या लौकिक आचारों का पालन करना वहीं तक अच्छा है, जहाँ तक मनुष्यों को उनसे अपने कर्त्तव्य-पालन में सहायता मिलती है या जहाँ तक उनसे स्वार्थ, आग्रह, राग और द्वेष के संस्कार उभरने