कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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कर्मयोग कहता है कि स्वार्थ की जड़ काट कर फेंक दो। जब तुम इसको अपने हृदय में अवकाश ही न दोगे तब इसकी लहरें तुम पर अपना कुछ भी प्रभाव न कर सकेंगी। जब यह अवस्था प्राप्त हो जायगी तब संसार में जहाँ चाहो वहाँ जाओ, जो चाहो सो करो; तुम निर्लेप रहोगे। कमल पानी में रहता है, पर पानी उसके पत्तों को तर नहीं कर सकता। ऐसे ही तुम संसार में रहते हुए और कर्म करते हुए उसके प्रभाव से बचे रहो। बस, यही सच्चा वैराग्य है। मैं तुमसे कह चुका हूँ कि किसी प्रकार का योग बिना वैराग्य के नहीं हो सकता। खाना-पीना छोड़ने से या जङ्गल में जाने से वैराग्य नहीं होता। जब तक शरीर है, उसकी रक्षा के लिए मनुष्य को कर्म करना पड़ेगा और यह उसका धर्म है। वैराग्य का सम्बन्ध शरीर से नहीं है, किन्तु मन से है। बिना मन को वश में किये शरीर सुखा देने से कोई वैरागी नहीं बन सकता। जिसका मन मेरा और तेरा-पन की ज़ंजीर से निकल गया है, वह यद्यपि शरीर-यात्रा के लिए सब कुछ उपाय काम में लाता हो, तथापि उनमें आसक्त न होने से वह वैरागी है। विपरीत इसके वह मनुष्य जो इन्द्रियों से काम करना छोड़ देता है, परन्तु मन से विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह रागी है और जब तक उसका मन विषयों से उपरत न होगा, केवल इन्द्रियों को रोकने से वह वैराग्य का अधिकारी नहीं हो सकता *। सम्भव है, एक मनुष्य राज-
- "कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥"
जो कर्मेन्द्रियों को रोक कर मन से विषयों का चिन्तन करता है वह मिथ्याचारी (धोखा देने वाला) है।
—भगवद्गीता।