कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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इतने समीप होते हैं कि इनको आन्दोलन, उपदेश और कर्त्तव्य-कर्मों के पालन करने का अवकाश ही नहीं रहता।
उत्साह से कर्म करनेवाले चाहे कितने ही धर्मात्मा हों, फिर भी उनमें कुछ न कुछ अज्ञान का लेश रहता ही है। जब तक हम में अपूर्णता है, तभी तक हम कर्म करते हैं। कर्म में फिर भी कुछ न कुछ स्वार्थ या सम्बन्ध का योग रहता ही है। जिनकी सब इच्छायें ईश्वर में अर्पित हो गई हैं और जिनका आत्मा ईश्वरमय हो गया है, उनके लिए कर्म नहीं है। वे चाहे स्वाभाविक कर्म करते रहें, परन्तु कर्तृत्व का व्यपदेश उनमें नहीं होता। ऐसे ही लोग उस सबसे बड़े पद—मोक्ष—के अधिकारी हैं। हम में से बहुत से मनुष्य ऐसे होंगे जो अपने को बड़ा आदमी समझते हैं, किन्तु अपने आप को बड़ा समझने से कोई बड़ा नहीं होता। बड़ा वह है जिसको संसार बड़ा कहे। हम जब संसार को छोड़ देते हैं, पाँच मिनट में संसार हमको भूल जाता है। परन्तु ईश्वर की सत्ता अपरिमित है। यदि उसकी इच्छा न हो तो कौन जी सकता है। वह आत्माओं का आत्मा है। प्राकृत और अप्राकृत सारी शक्तियाँ उसमें हैं और उसकी हैं। उसीकी आज्ञा से वायु चलता है, सूर्य चमकता है, पृथ्वी भ्रमण करती है और मृत्यु प्राणियों को अपना भक्ष्य बनाता है। वह सब में है और सब कुछ है। तुम जो कुछ कर सकते हो, उसके लिए करो, अपने लिए फल की वासना मत रक्खो। यही सच्चा त्याग है, इसी से कर्म-बन्धन की फाँसी कटती है और यही मुक्ति का सीधा मार्ग है, जिसकी पहली सीढ़ी कर्मयोग है।