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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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जीवन और मरण इन दोनों में नाम मात्र का भेद है, वस्तुतः ये एक ही पदार्थ के दो सापेक्ष्य धर्म या अङ्ग हैं। सुख बिना दुःख के या जीवन बिना मरण के एक बाल-प्रलाप है।

अतएव जो कर्म करो, उसके लिए न तो प्रशंसा की और न ख्याति की लालसा रक्खो। हम में यह निर्बलता है, अच्छा काम पीछे करते हैं, प्रशंसा पहले चाहते हैं। यदि किसी धर्म-कार्य में कुछ दान देते हैं, तो जब तक समाचारपत्रों में छप नहीं जाता, हम को चैन नहीं पड़ता। संसार में प्रायः बहुत बड़े और प्रथम श्रेणी के मनुष्य हुए हैं, जिनका कोई नाम भी नहीं जानता, इतिहास की तो कथा ही क्या है। प्रत्येक देश में ऐसे महात्मा पुरुष हुए हैं, जिन्होंने चुपचाप कर्म करते हुए अपना जीवन बिताया और चुपचाप ही अपना काम पूरा करके चल दिये। समय आया कि उनके विचार और उपदेशों ने बुद्ध और ईसा जैसी प्राकृत मूर्तियाँ धारण कीं, जिनको हम जानते हैं। बड़े आदमी नाम और प्रतिष्ठा के भूखे नहीं होते। वे अपने शुद्ध संस्कार और पवित्र विचार लोगों को दे जाते हैं। न वे कोई पन्थ चलाते हैं, न संप्रदाय बनाते हैं, न अपने नाम से कोई धार्मिक या दार्शनिक परिपाटी चलाते हैं। उनमें मान और मत्सर का लेश भी नहीं होता, वे सात्विक भावों से परिपूर्ण होते हैं। मैं एक ऐसे ही योगी को जानता हूँ, जो आर्यावर्त्त में रहता है। वह अपने शरीर और जीवन तक से निरपेक्ष है। उसने अपने आपे को बिलकुल भुला दिया है। यदि कोई जन्तु उसके एक हाथ को काटना चाहे, तो वह दूसरे हाथ को भी उसके सामने कर देता है और यह कहता है कि "परमात्मन् ! आपकी इच्छा