कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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हैं जो एकदम संसार को छोड़ कर उससे विरक्त हो जाते हैं; जैसे साँप केचुली को छोड़ कर उससे अलग हो जाता है। ऐसे लोगों के लिए कर्मयोग का विधान नहीं है। यह सड़क प्रायः उन्हीं लोगों के लिए बनाई गई है कि जो संसार की एषणाओं को सहसा नहीं त्याग सकते। सांसारिक सुखों का अनुभव करते हुए जो मुक्ति की ओर जाना चाहते हैं, ऐसे लोगों को कर्मयोग बतलाता है कि वे किस प्रकार कर्म के द्वारा अपने अभीष्ट को सिद्ध कर सकते हैं।
कर्मयोग हमें शिक्षा देता है कि "उत्साह के साथ कर्म किये जाओ परन्तु बेलाग बने रहो। उसके फल में अपने को न लपेटो, अपने मन को वश में रक्खो।" तुम देखते हो, संसार में सुख-दुःख का चक्र चल रहा है। कभी हर्ष है, कभी शोक है। ये आगन्तुक अवस्थायें हैं, इनसे हमारे आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं। हमारा आत्मा सुख-दुःख से परे है। ये सब इन्द्रिय और मन के विकार हैं, जिनको मूर्खता से हम आत्मा में आरोपित कर लेते हैं। दुःख केवल संसर्ग से उत्पन्न होता है; कर्म से नहीं। जब हम किसी कर्म के फल में लिपट जाते हैं तभी दुःख का अनुभव करने लगते हैं। किन्तु यदि हम उससे अलग रह सकें, तो रात-दिन कर्म करते हुए भी कभी दुःखी न होंगे। दूसरे के घर में आग लगने से हमें दुःख नहीं होता, परन्तु जब हमारे घर में आग लगती है तो हम रोते हैं। हज़ारों मनुष्य प्रति दिन मरते रहते हैं, हमें मालूम भी नहीं होता, परन्तु जब कोई हमारा सम्बन्धी या आत्मीय मर जाता है तो हम शोक से विह्वल हो जाते हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण केवल ममता है। जिन पदार्थों में हमारी ममता है अर्थात् जिनको