कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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हम अपना समझते हैं, उनके वियोग से हमें दुःख होता है और जहाँ ममत्व बुद्धि नहीं है, वहाँ न संयोग से सुख और न वियोग से दुःख होता है। जिस घर या मनुष्य को हमने अपना मान रक्खा था, उसके नष्ट होने से हमको दुःख होता है और जिस घर या मनुष्य से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है, उसके नष्ट होने से हमें कुछ भी दुःख नहीं होता। इससे सिद्ध है कि सम्बन्ध ( लगाव ) ही सारे दुःखों की जड़ है। सम्बन्ध ही से स्वार्थ उत्पन्न होता है और स्वार्थ दुःख का मूल है। चित्त में मेरे-पन और तेरे-पन की जितनी लहरें उठती हैं, उनके साथ पराधीनता की बेड़ियाँ लगी रहती हैं, जो मनुष्य को जकड़ कर बाँध लेती हैं। इसलिए कर्म-योग हमको बतलाता है कि तुम संसार के सब पदार्थों को देखो और उनसे प्रसन्नता-लाभ करो, परन्तु उनको अपना कभी मत समझो, यहाँ तक कि अपने शरीर पर भी ममत्व-बुद्धि न करो। यह कभी न कहो कि यह वस्तु मेरी है। जिसको तुम अपना कहोगे वही तुम्हारे दुःख का कारण बन जायगी। मेरा पुत्र, मेरा घर, मेरा शरीर ये सब बन्धन और दुःख की परिभाषायें हैं, जो अज्ञानी लोगों ने बना ली हैं। वास्तव में न हमारा कोई है और न हम किसी के हैं। हम केवल साक्षी मात्र बन कर संसार में आते हैं, पर अविद्या से वादी और प्रतिवादी बन जाते हैं और इसीसे सारे झगड़े पैदा होते हैं। यह शरीर क्या है ? आत्मा का एक कल्पित चित्र या मूर्त्ति है। जैसे किसी चित्र या मूर्त्ति के टूटने फूटने से शरीर को कुछ हानि नहीं पहुँचती वैसे ही इस शरीर के नष्ट होने से आत्मा का कुछ नहीं बिगड़ता।