कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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कर्मयोग
कोई सिद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। यह "कर्मयोग" है, इसमें उत्साह और तीव्रता के साथ कर्म करना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य के लिए कर्म करना आवश्यक है। केवल वे लोग जो सदा आत्मा के ही ध्यान में निमग्न रहते हैं, आत्मा के सिवा न किसी को देखते, न सुनते और न अनुभव करते हैं। जिनका सब कुछ आत्मा ही है, वे अलबत्ता कर्म के बन्धन से मुक्त हैं; अन्य सबको कर्म करना ही पड़ता है। पानी की लहर ज़ोर के साथ चलती है और किसी गहरी जगह में पहुँच कर भँवर बन जाती है और बार बार चक्कर लगा कर फिर ज़ोर के साथ वह निकलती है और स्वतन्त्र लहर बन जाती है। मनुष्य का जीवन एक निरन्तर बहनेवाला प्रवाह है, जिसमें इच्छाओं की अनेक लहरें उठा करती हैं, जो उसको मोह के गम्भीर भँवर में फँसा देती हैं, जिसमें पड़ा हुआ मनुष्य चक्कर खाया करता है। देश, काल और निमित्त के संयोग से कुछ दिन इसको इस भँवर में फँसा रहना पड़ता है। माता, पिता, भ्राता और पुत्रादि के मोह तथा ख्याति और प्रशंसा के लोभ में तड़पना होता है। पर अन्त में जाकर वह उससे निकल भागता है और स्वतन्त्र लहर के समान उस अवस्था में पहुँच जाता है, जिसमें फिर कोई बन्धन नहीं रहता।
चाहे हम इसको जानें या न जानें, मूर्ख हों या पण्डित; पर इसमें संदेह नहीं हो सकता कि हम सब लोग संसार के बन्धन से मुक्त होने के लिए कर्म करते रहते हैं। मनुष्य का अनुभव उसके जीवन की नौका को भवसागर से पार लगाने के लिए पतवार का काम देता है। सारा संसार कर्म कर रहा है, जड़ से लेकर चेतन तक