कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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नहीं पाते। कर्मयोगी इन व्यक्ति-गत या जाति-गत धर्मों में प्रवृत्त नहीं होता, उसका धर्म-कर्म जो कुछ है, वह सब ईश्वर की भक्ति और उसका सच्चा प्रेम है। ईश्वर सब का है, इसलिए उसका धर्म भी सबकी सेवा और सब से प्रेम करना है। जिन धर्मों का सेवन करने से सांसारिक बन्धन दृढ़ होते हैं, यदि तुम कर्मयोगी बनना चाहते हो तो, उनके लिए मत ललचो। तुम चाहे किसी धर्म का पालन करो, पर अपने मन में इस बात का अभिमान कभी न करो कि मैं इसका करनेवाला हूँ या यह मेरा धर्म या कर्म है। जहाँ तुमने मेरा कहा, बस वहीं लगाव पैदा हुआ और यह लगाव ही तुम्हारे गले की फाँसी है। जब तुम अपना सर्वस्व ही ईश्वर के अर्पण कर चुके तब तुम्हें यह अधिकार ही कब है कि तुम किसी वस्तु को (चाहे वह तुम्हारे शरीर के भीतर हो या बाहर) अपना कह सको। हम सब उसी के आज्ञानुसार काम कर रहे हैं, हमको प्रहार और उपहार (सज़ा व जज़ा) से क्या काम! यदि हम पारितोषिक लेना चाहते हैं तो हमको दण्ड भी अवश्य मिलेगा। दण्ड से बचने का केवल यह उपाय है कि पारितोषिक की मन में कल्पना भी न की जाय। दुःख से बचने का सिवा इसके और क्या उपाय हो सकता है कि हम सुख की कल्पना को सर्वथा त्याग दें। क्योंकि सुख-दुःख दोनों साथ साथ मिले रहते हैं। जहाँ सुख है वहीं दुःख भी है। जीवन के साथ मरण लगा हुआ है, जो जीना चाहता है उसके लिए अवश्य मौत है। हाँ, यदि हम जीवन की इच्छा और मोह छोड़ दें तो निस्स-न्देह मौत को जीत सकते हैं। यदि विचार-दृष्टि से देखा जावे तो
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