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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

Page 85 of 115

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छठा अध्याय

७६

समान उत्पन्न हो जाते हैं। यह एक प्रत्यक्ष बात है। संस्कृत में इसी को "व्याप्ति" कहते हैं। बाह्य और आन्तरिक जगत् में सर्वत्र यह सिद्धान्त समान रूप से काम करता है। एक भाव के पश्चात् दूसरे भाव का आना या युगपत् अनेक सम्बद्ध भावों का प्रादुर्भूत होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

दूसरी बात विचारणीय यह है कि यह कर्म का सिद्धान्त एक-देशी है या सर्वदेशी। यह पृथिवी, जिस पर हम रहते हैं, इस अपरिमित ब्रह्माण्ड का—जो देश काल और निमित्त के संयोग से बना है—एक छोटा सा भाग है। इससे स्पष्ट है कि यह संसार नैमित्तिक है। इससे आगे चल कर फिर कोई नियम (कानून) या उसका प्रभाव (असर) नहीं रहता। जब हम संसार का वर्णन करते हैं तब उससे हमारा अभिप्राय ब्रह्माण्ड के उस भाग से होता है, जिसको हमारे मन ने आक्रान्त (सीमाबद्ध) कर रक्खा है। और यह ऐन्द्रिय जगत् है जिसमें हम देखते, छूते, सुनते, अनुभव करते, सोचते और समझते हैं। इससे आगे चल कर फिर कार्य-कारण का नियम नहीं रहता। जो वस्तु हमारे मन और इन्द्रियों से परे है, वहाँ न प्रत्यक्ष का गम्य है न अनुमान का। इस सृष्टि में जहाँ तक नाम-रूप की छाप लगी हुई है वहीं तक कार्य-कारण-भाव की सीमा है और वहीं प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द काम करते हैं। इसी जगत् में प्राकृत नियम अपना काम करते हैं। यद्यपि यहाँ अपनी मानसिक शक्ति से हम काम लेते हैं, तथापि पूरी स्वतन्त्रता के न होने से हमारी आत्मिक-शक्ति दबी रहती है। यहाँ हमारा ज्ञान भी उस सीमा के भीतर और उन्हीं प्राकृत नियमों के अनुसार होता