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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

About this granth

The Kalki Purana (कल्कि पुराण) is an Upapurana devoted to Kalki, the tenth avatar of Vishnu, who is to appear at the close of the Kali Yuga. Tradition attributes it to Vedavyasa. It is arranged in three amshas (parts) and opens as an account of things to come, told by Shuka to Markandeya and other sages.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi translation. A note at the front points out that the Purana speaks of future events in the past tense, saying that Kalki 'was born' in the village of Shambhala. The contents include the miseries of the Kali age, Kalki's birth and the weapons he receives from Shiva, the story of Padma and the parrot, Kalki's journey to Simhala and his marriage to Padma, the tale of the sage Ananta, battles with the Bauddhas and the demoness Kuthodari, the coming of Maru and Devapi, the lunar dynasty, the return of the Satya Yuga and the war with King Shashidhvaja.

The page numbering begins at 257, which suggests the text was printed as part of a larger collection. The 259 scanned pages are paired with their text.

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३७८ ] कल्कि पुराण
पावन तीर पर अपनी सेना सहित निवास किया ॥४६॥ अपने परिजनो
के सहित कल्किजी ने वह रात्रि वही बिताई और प्रात काल उठने पर
गगा स्नान के निमित्त आये हुए मुनिगण उनके दर्शनार्थ आते हुए
दिखाई दिये ॥४७ ॥ वे हरिद्वार मे गगातट के समीप स्थित पिण्डारक
बन मे अपनी सेना के सहित निवास करने लगे । एक दिन, जब वे
कलिमल-नाशिनी भगवती जाह्नवी की स्तोत्रो के द्वारा स्तुति कर रहे
थे, तभी मुनिगण उनके दर्शनार्थ वहां आये और विविध शब्दो से युक्त
स्तोत्र करने लगे ॥ ४८ ॥

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तृतीयांश—
तृतीय अध्याय
सुस्वागतान्मुनीन् दृष्ट्वा कल्किक परम धर्मवित् ।
पूजावित्वा च विधिवत्सुखासीनानुवा चतान् ॥१॥
कयूय सूर्यसङ्काशा मम भाग्यादुपस्थिताः ।
तीर्थाटनोत्सुका लोकत्रयाणामुपकारकाः ॥२॥
वय लोके पुण्यवन्तो भाग्यवन्तो यशस्विनः ।
यत कृपाकटाक्षेण युष्माभिरवलोकिताः ॥३॥
ततस्ते वामदेवऽत्रिवं सष्ठो गालवो भृगुः ।
पराशरो नारदोऽश्वत्थामा रामः कृपक्षितः ॥४॥
दुर्वासा देवलः कण्वो वेदप्रमितिरङ्गिराः ।
एते चान्ये च बहबी मुनय, सशितव्रताः ॥५॥
कृत्वाग्रे मरुदेवापी च चन्द्रसूर्यकुलोद्भवौ ।
राजानौ तौ महावीर्यौ तपस्याभिरतौ चिरम् ॥६॥
ऊचुः प्रहृष्टमनसः कल्कि कल्कविनाशनम् ।
महोदधेस्तोरगत विष्णु सुरगणा यथा ॥७॥
परम धर्मविद कल्किजी ने उन मुनिगण को सुखपूर्वक वहाँ
आये हुए देखकर स्वागत, आसन और विधिवत् पूजन करके उनसे
बोले ॥१॥ सूर्य के समान अत्यन्त तेजस्वी, तीर्थाटन मे उत्सुक एवं
तीनो लोको के कल्याण रूप उपकार की कामना वाले आप कौन हैं ?
जो मेरे सौभाग्यवश यहाँ पधारे हैं ॥२॥ आपके द्वारा कृपा-कटाक्ष
पूर्वक देखे जाने से मैं आज इस लोक मे अपने को पुण्यवान्, भाग्यवान्

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३८० ] [ कल्कि पुराण
और यशवान् ही मानता हूँ ॥ ३ । फिर वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ,
गालव, भृगु, पराशर, नारद, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, त्रित, दुर्वासा,
देवल, कण्व, वेद प्रमिति और अंगिरा आदि यह सब तथा अन्यान्य
श्रेष्ठ व्रत वाले मुनिगण चन्द्र सूर्यवंश मे उत्पन्न, महा वीर्यवान एव
तपोनिष्ठ राजा मरु और देवापि उनको सामने देख कर, जैसे प्रसन्न मनसे
देवताओ ने महोदधि के तीर पर भगवान् विष्णु से कहा था, वैसे ही
पापो का नाश करने वाले कल्किजी के प्रति बोले ॥४-७ ॥
जयाशेषजगन्नाथ ! विदिताखिलमानस ! ।
सृष्टिस्थितिलयाध्यक्ष ! परमात्मन्प्रसीद नः ॥८॥
कालकर्मगुणावास प्रसारितनिजक्रिय ! ।
ब्रह्मादिनुतपादाब्ज ! पद्मानाथ प्रसीद नः ॥६॥
इति तेषा वच श्रुत्वा कल्किः प्राह् जगत्पति ।
कावेतौ भवतामग्रे महासत्वौ तपस्विनौ ॥१०॥
कथमत्रागतौ स्तुत्वा गङ्गा मुदितमानसौ ।
का वा स्तुतिस्तु जाह्नव्या युवयोर्नामनी च के ॥११॥
तयोर्मरुः प्रमुदितः कृताञ्जलिपुटः कृती ।
आदावुवाच विनयी निजवंशानुकीर्त्तनम् ॥१२॥
मुनियो ने कहा - हे सर्व विजयी जगदीश ! हे सम्पूर्ण विश्व
के जीवो के घट-घट के ज्ञाता ! हे सृष्टि स्थिति और प्रलय के स्वामिन् !
हे परमात्मदेव ! प्रसन्न होइये ॥८॥ हे पद्मा के पते ! काल, कर्म
और गुण के आप ही आश्रय हैं । ब्रह्मादि देवता भी आपके ही चरणार-
विन्दो की पूजा किया करते हैं । आप हम पर प्रसन्न होइये ॥ ६ ॥
मुनियो के यह वचन सुन कर कल्किजी ने उनसे कहा- हे मुनियो !
आपके आगे यह महान् बल सम्पन्न एवं तपस्वी कौन हैं ? ॥१०॥
गगाजी की स्तुति करके अत्यन्त प्रसन्न हृदय से यह यहाँ क्यो पधारे
हैं ? यह किस कारण भगवती जान्हवी की स्तुति मे लगे हैं ? इनके
नाम क्या-क्या हैं ? ॥११॥ तब वे दोनो मरु देवादि प्रसन्न हृदयसे हाथ

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प्रथम अध्याय ३ ] [ ३८१
जोड कर बिनय पूर्वक अपने वंश का यश-वर्णन करने लगे ॥ १२ ॥
सर्ववेत्तिस परात्मापि अन्तर्यामिन्हृदि स्थिति ।
तवाज्ञया सर्वमेतत्कथयामि श्रृणु प्रभो । १३॥
तव नाभेरभूद्ब्रह्मा मरीचिस्तत्सुतोऽभवत् ।
ततो मनुम्तत्सुतोऽभूदिक्ष्वाकु सत्यविक्रम ॥१४॥
युवनाश्व इति ख्यातो मान्धाता तत्सुतोऽभवत् ।
पुरुकुत्सस्तत्सुतोऽभूदनरण्यो महामतिः ॥१५॥
त्रसदस्यु. पिता तस्माद्धर्य्यश्वश्चायरुणस्तत ।
त्रिशङ्कुस्तत्सुतो धीमान्हरिश्चन्द्रः प्रतापवान् ॥१६॥
हरितस्तत्सुतस्तस्माद्भरुकस्तत्सुतो वृकः ।
तत्सुत सगरस्तस्मादसमञ्जास्तोऽशुमान् ॥१७॥
मनु बोले — हे प्रभो ! आप तो अन्तर्यामी एव घट-घट मे
निवास करने वाले है, आपको सब कुछ ज्ञात है। मै आपकी आज्ञा के
अनुसार सब कहता हूँ, उसे सुनिये ॥१३॥ आपके नाभि कमल से ही
ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए हैं । ब्रह्मा के पुत्र मरीचि, मरीचि के मनु और
मनु के सत्य विक्रम इक्ष्वाकु हुए । १४॥ इक्ष्वाकु का पुत्र युवनाश्व,
युवनाश्व का मान्धाता, मान्धाता का पुरुकुत्स और पुरुकुत्स का पुत्र
अनरण्य हुआ ॥१५॥ अनरण्य का त्रसदस्यु, त्रसदस्यु का हर्यश्व,
हर्यश्व का अरुण, अरुण का त्रिशंकु हुआ तथा त्रिशंकु के पुत्र महा-
प्रतापी राजा हरिश्चन्द्र हुए ॥ १६॥ राजा हरिश्चन्द्र का पुत्र हरित,
हरित का भरुक, भरुक का वृक, वृक का सगर, सगर का असमजा और
असमजा का पुत्र अं शुमान हुआ ॥१७॥
ततो दीलीपस्तत्पुत्रो भगीरथ इति स्मृतः ।
येनानीता जन्हवीयं ख्याता भागीरथी भुवि ।
स्तुता नुता पूजितेय तव पादमुसद्भवा ॥१८॥
भगीरथात्सुतस्तस्मान्नाभस्तस्मादभूद्बली ।
सिन्धुद्वीपसुतस्तस्मादायतायुस्ततोऽभवत् ॥१९॥

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३८२ ] [ कल्कि पुराण
ऋतुपर्णास्तत्सुतोऽभूत्सुदासस्तन्सुतोऽभवत् ।
सौदासस्तत्सुतो धीमानश्मकस्तत्सुतो मत ॥२०॥
मूलकात्स दशरथस्तस्मादेडविडस्तत ।
राजा विश्वसहस्तस्मात्खट्वाङ्गो दीर्घबाहुकः ॥२१॥
ततो रघुरजस्तस्मात्सुतो दशरथःकृती ।
तस्माद्रामो हरिः साक्षादाविर्भूतो जगत्पति ॥२२॥
अंशुमान के पुत्र दिलीप, दिलीप के परम प्रसिद्ध पुत्र भगीरथ
हुए । वही भगवती जाह्नवी को भूतल पर लाये थे इसी लिए गंगा
उनके नाम से भागीरथी कहलाई । आपके चरणों से उत्पन्न होने के
कारण ही प्राणी इन गंगा जी की स्तुति, प्रणाम तथा पूजन करने में
तत्पर रहते हैं ।।१८।। भागीरथ का पुत्र नाभ हुआ । नाभ का महाबली
सिन्धुद्वीप और सिन्धुद्वीप का पुत्र आयुतायु हुआ ।।१६।। अयुतायु का
पुत्र ऋतुपर्ण हुआ । ऋतुपर्ण का सुदास, सुदास का सौदास और
सौदास का पुत्र मेधावी अश्मक हुआ ॥२०॥ अश्मक से मूलक और
मूलक का दशरथ हुआ । दशरथ का एडविड, और एडविड का विश्वसह,
विश्वसह का खट्वाग और खट्वाग का पुत्र दीर्घबाहु हुआ था ॥२१॥
दीर्घबाहु के पुत्र रघु हुए, रघु के अज और अज के दशरथ हुए । इन्हीं
दशरथ के पुत्र रूप मे साक्षात् जगदीश्वर विष्णु ने अवतार लिया ॥२२॥
रामावतारमाकर्ण्य कल्कि परमहर्षित ।
मरु प्राह विस्तरेण श्रीरामचरित वद ॥२३॥
सीतापते कर्म वक्तुं कः समर्थोऽस्ति भूतले ।
शेषः सहस्त्रवदनैरपि लालायितो भवेत् ॥२४॥
तथापि शेमुषी मेऽस्ति वर्णयामि तवाज्ञया ।
रामस्य चरितं पुण्यं पापतापप्रमोचम् ॥२५ ॥
अब्जादिविबुधार्थितोऽजनि चतुर्भिरंशैः कुले
रवेरजासुतादजो जगति यातुधानक्षयः।
शिशुः कुशिकजाध्वरक्षमकरक्षयो यो बला-
द्दवलीललितकन्धरो जयति जानकीवल्लभः ॥२६॥

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३८३ ] [ कल्कि पुराण
रामावतार का प्रसग आने पर भगवान् कल्कि अत्यन्त हर्षित
हुए और उन्होने मरु से कहा कि राम चरित्र का विस्तार सहित वर्णन
करिये ॥२३॥ मरु बोले-सीतापति श्रीराम के कर्मों का वर्णन करने
में समर्थ इस पृथिवी पर कौन है ? क्योकि सहस्रवदन शेष भी उनका
यश वर्णन करने मे समर्थ नही है। फिर भी मैं आपकी आज्ञा के
कारण भगवान् श्रीराम का पाप-ताप नाशक चरित्र को अपनी बुद्धि के
अनुसार कहता हूँ ।।२४-२५ ।। पुराकाल की बात है—ब्रह्मादि देवताओ
के द्वारा राक्षसो के विनाशार्थ प्रार्थना किये जाने पर राम, लक्ष्मण,
भरत, शत्रुघ्न के रूप मे सीतापति भगवान् रामचन्द्र जी ने सूर्यवंश मे
अवतार लिया था। अपने शिशु-काल मे ही उन्होने विश्वामित्र जी के
यज्ञ मे विघ्न उपस्थित करने वाले राक्षसो का बलपूर्वक संहार
किया था।।२६।।
मुनेरनुसहानुजो निखिलशस्त्रविद्यातिगो ।
ययावतिवनप्रभो जनकराजराजत्सभाम् ॥२७॥
विधाय जनमोहनद्युतिमतीव कामद्रुहं ।
प्रचण्डकरचण्डिमा भवनभजने जन्मिनः ॥
तम प्रतिमतेजस दशरथात्मज सानुज
मुनेरनु यथा विधे शशिवदादिदेव परम् ।
निरीक्ष्य जनको मुदा क्षितिसुतापत्ति समत
निजोचितपणक्षम मनसि भत्स्यन्नाययौ ॥२८॥
स भूपपरिपूजितो जनकजेक्षितैरर्चितः
करालकठिनं धनु करसोरुहे सहितम् ।
विभज्य बलहृढ जय रघूवद्हेत्युच्चकैर्ध्वनि
त्रिजगतीगत र्पारविधाय रामो वभौ ॥२६॥
ततो जनकभूपतिर्दशरथात्मजेभ्यो ददौ
चतस्र उषतीर्मुदा वरचतुर्म्य उद्वाहने ।
स्वलकृतनिजात्मजा. पथि ततो बल भार्गव-

द्वितीय अंश: अध्याय ४-७ (राजा शशध्वज भक्ति व रमा विवाह)

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प्रथम अध्याय-३ ] [ ३८४
श्रकार उररीनिज रघुपतौ महोग्र त्यजन् ॥३०॥
जिनकी महिमा से कामना पूर्ति वाले ससार मे पुर्नजन्म की
प्राप्ति नही होती । वे महाबली, प्रभायुक्त तथा सम्पन्न शस्त्र विद्या-
विशारद भगवान श्रीराम ससार को मोहित करने वाला रूप धारण
किये हुए, लक्ष्मण और मुनियो के सहित जनक की राज सभा मे गये
॥२७॥ ब्रह्माजी के पीछे सुशोभित चन्द्रमा के समान तेज वाले श्री राम
अपने भाई लक्ष्मण के सहित मुनिवर विश्वामित्र के पीछे बैठ गये ।
तब आदि देव जगदीश्वर को देख कर जनक सोचने लगे कि यह सीता
के योग्य श्रेष्ठ वर हैं । तब उन्होने अपने द्वारा किये हुए प्रण की
कठोरता देख कर अपनी भर्त्सना की और फिर श्री राम के समीप गये
॥२८॥ तब राजा जनक से आदर प्राप्त कर तथा सीता जी के कटाक्ष
से प्रेम-पूजित होकर श्री राम ने उस घोर धनुष को हाथ मे उठाया
और उसके दो टुकडे कर दिये । तब श्रीराम अत्यन्त शोभा को प्राप्त
हुए और उनके जय-घोष से तीनो लोक व्याप्त हो गये ॥२६॥
ततः स्वपुरमागतो दशरथस्तु सीतापर्ति
नृप सचिवसयुतो निजविचित्रसिंहासने ।
विधातुममलप्रभ परिजनै क्रियाकारिभिः
समुद्यतमतिं तवा द्रुतमवारयत्कैकयी :।३१॥
ततो गुरुनिदेशतो जनकराजकन्यायुत.
प्रयाणमकरोत्सुधीर्यदनुजः सुमित्रासुत.
वनं निजगण त्यजन्गृहगृहे वसन्नादरात्
विसृज्य नृपलाञ्छन रघुपतिर्जटाचीरभृत् ॥३२॥
तब राजा जनक ने अपनी चारो कन्या—सीता, उर्मिला,
माण्डवी और श्रुतिकीर्ति सब प्रकार से अलंकृत करके दशरथ जी
के चारो पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न को क्रमशः दान कर दी ।
विवाह के पश्चात् जब यह सब अयोध्या नगरी के लिए लोट रहे थे,
तब मार्ग मे परशुरामजी मिले और उन्होने श्रीरामको अपना अपार बल

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प्रथम अध्याय-२ ] [ ३८५
दिखाने का निष्फल प्रयत्न किया ॥३०॥ फिर महाराज दशरथने अयोध्या
पहुँच कर अपने मन्त्रियो के परामर्श से सीतापत्ति राम को अयोध्या के
राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त करने का विचार किया । अभिषेक के
लिए सम्पूर्ण सामग्री एकत्र होकर जब पूर्ण तैयारी हो गई, तब श्रीराम
का अभिषेक करने मे तत्पर राजा दशरथ को कैकेयी ने वरदान माँग कर
रोक दिया ॥ ३१ ॥ तब महाराज की आज्ञा सुन कर जनक सुता
और सुमित्रा पुत्र-लक्ष्मण सहित श्रीराम वन मे गये । साथ चलते हुए
पुरवासियो को आगे चल कर छोड़ दिया तथा गुह के घर मे जाकर
राजकीय वस्त्राभूषणो का परित्याग कर जटावल्कल धारण कर
लिया ॥३२॥
प्रियानुजयुतस्ततो मुनिमतो वने पूजितः
स पञ्चवटिकाश्रमे भरतमातुर सगतम् ।
नि-वार्य मरण पितु समवधार्य्य दुःखानुर-
स्तपोवनगतोऽवसद्रघुपतिस्ततस्ता समाः ॥३३॥
दशाननसोदरा विषमबाणवेधातुरां-
समीक्ष्य वररूपिणी प्रहसती सती सुन्दरीम् ।
निजाश्रयमभीप्सती जनकजापतिर्लक्ष्मणा-
त्करालकरवालत समकरोद्विरूपा तत ॥३४॥
समाप्य पथि दानव खरशरै शनैर्नाशयन्
चतुर्दशसहस्रक समहनन्खर सानुगम् ।
दशाननवशानुग कनकचारुच्छन्मृग
प्रियाप्रियकरो वने समवधीद्बलाद्राक्षसम् ॥३५॥
सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ मुनिवेश धारी श्री राम
पूजा-सम्पन्न होकर विविध मे वनो निवास करने लगे । इसके
पश्चात् कातरता पूर्वक भरतजी वहाँ आये । उनसे पिता का मरण
सुन कर श्रीराम को बडा दुःख हुआ और भरत जी को समझा कर
लौटा दिया और तपोवन मे रहने लगे ॥३३॥ फिर कामबाण से बिद्ध

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३८६ ] कल्कि पुराण
सुन्दर रूप वाली, हास्यवदना, वर की कामना करती हुई रावण की
बहिन शूर्पणखा को आते देख कर लक्ष्मण जी को सकेत किया, जिसके
अनुसार लक्ष्मण जी ने तीक्ष्ण तलवार से उस राक्षसी का रूप भ्रष्ट
कर दिया ॥३४॥ फिर उन्होंने मार्ग मे एक दानव का मार कर,
चौदह हजार सेना के अधिपति एव रावण के अनुगामी खरदूषण को
सेना सहित नष्ट कर दिया । फिर सीता जी की इच्छा से स्वर्ण-मृग
रूपी राक्षस को मार डाला ॥३५॥
ततो दशमुखस्त्वरस्तमभिवीक्ष्य राम रुषा
व्रजन्तमन्तुलक्ष्मण जनकजा जहाराश्रमे ।
ततो रघुपतिः प्रिया दलकुटीरसस्थापिता
न वोक्ष्य तु विमूर्च्छितो वह विलप्य सीतेति ताम् ॥३६॥
वने निजगणाश्रमे नगतले जले पल्वले
विचित्य पतित खग पथि ददर्श सौमित्रिणा ।
जटायुवचनोत्ततो दशमुखाद्दता जानकी
विविच्य कृतवान्मृते पितरि वत्कृत्य प्रभु ॥३७॥
प्रियाविरहकातराऽनुजपुर सरो राघवो
धनुर्धरन्धरो हरिबल नवालापिनम् ।
ददर्श ऋषभाचलाद्रविजवालिराजानुज-
प्रिय पवननन्दनं परिणतं हित प्रेषितम् ॥३८॥
फिर राम लक्ष्मण को गया हुआ देख कर रावण ने उनके
आश्रम से अकेली सीताजी का हरण कर लिया । तदनन्तर श्रीराम ने
वहाँ आकर जब सीता को न देखा, तब वे 'हा सीते' 'हा सीते' आदि
शोक युक्त शब्दो मे विलाप करते हुए मूर्च्छा को प्राप्त हो गये ॥ ३६ ॥
फिर वे ऋषियो के आश्रम, पर्वतो की गुफा, जल और स्थल आदि
विविध स्थानो मे सीताजी को ढू ढने लगे । आगे चलने पर उन्हें
माग मे जटायु पडा मिला । उससे उन्हे सीता हरण का समाचार
प्राप्त हुआ । जटायु के मरने पर उन्होंने अपने पिता के समान उसका

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तृतीय-अध्याय-३ ] [ ३८७
मृतक सस्कार किया ॥३७॥ सीताजी के वियोग से व्याकुल हुए धनुर्धरो
मे श्रेष्ठ श्रीराम लक्ष्मण के सहित नव-परिचय प्राप्त बानर सेना मे
मिले और उनकी सूर्य पुत्र बालि के छोटे भाई सुग्रीव द्वारा भेजे हुए
उसके मन्त्री हनुमान से भेट हुई ॥३८॥
ततस्तदुदितं मत पवनपुत्रसुग्रीवयो-
स्तृणाधिपतिभेदन निजनृपासनस्थापितम् ।
विविच्य व्यवसायकैर्निजसखाप्रिय बालिनम्
निहत्य हरिभूपति निजसख स रामोऽकरोत् ॥३६॥
अथोत्तरमिमा हरिजजनकजा समन्वेषयन्
जटायुसहजोदितैर्जलनिधि तरन्वायुजः ।
दशाननपुर विशञ्जनकजा समानन्दय
न्नशोकवनिकाश्रमे रघुपति पुन प्राययौ ॥४०॥
ततो हनुमता बलादमितरक्षसा नाशन
ज्वलज्ज्वलनसकुलज्वलितदग्धलङ्कापुरम् ।
विविच्य रघुनायको जलनिधि रुषा शोषयन्
बबन्ध हरियूथप. परिवृतो नगेरीश्वर ।।
बभञ्ज पुरपत्तन विविधसर्व्वदुर्गक्षमम्
निशाचरपते. क्रुधा रघुपति' कृतो सद्गति ॥४१॥
फिर सुग्रीव और हनुमान की प्रार्थना पर उन्होने ताल के सात
वृक्षो को काट गिराया और बालि का वध करके सुग्रीव को बानरो का
राजा बना कर उससे मित्रता स्थापित की ॥३६॥ फिर पवनसुत
हनुमान सीता की खोज मे गये और संपाति की प्रेरणा पर लकापुरी मे
स्थित अशोक वाटिका पहुँच कर उन्होने सीताजी को राम-सदेश से
आनन्दित किया और रामचन्द्रजी के पास लौट आये ॥ ४० ॥ फिर
श्रीरामचन्द्र ने हनुमानजी के द्वारा अनेको राक्षसो का मारा जाना और
लका का जलाया जाना सुना तो वे शिलाओ द्वारा समुद्र पर सेतु बाँध

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३८८ ] [ कल्कि पुराण
कर बानरो के सहित लंकापुरी जा पहुंचे और रावण के पुर की प्राचीर
आदि को उन्होंने नष्ट कर डाला ॥४१॥
ततोऽनुजयुतो युधि प्रबलचण्डकोदण्डभृत्
शरै खरतरै क्रुधा गजरथाश्ववहसाकुल ।
करालकरवालत प्रबलकालजिह्वाग्रतो
निहत्य वरराक्षमान्नरपतिर्बभौ सानुगः ॥४२॥
जघान घनघोषगा़नुगगणीरसृक् प्राशनैः ।
ततोऽतिबलवानरैर्गिरिमहीरुहोद्यत्करै
करा़लतरताडनैर्जनकजारुषा नाशितान् ।
निजघ्नुनमरादं नान्तिबलान्दशास्यानुगान्
नलाङ्गदहरीश्वराऽशुगसुतर्क्षराजादयः ॥४३॥
ततोऽतिबललक्ष्मणास्त्रदशनाथशत्रु रणे
प्रहस्त विकटादिकानपि निशाचरान्व्यङ्गनान्
निकुम्भ मकराक्षकांन्निशितखड्ग पातैः क्रुधा ॥४४॥
फिर लक्ष्मण के सहित श्रीराम ने अत्यन्त उग्र बाणो को
धारण किया और गज, अश्व तथा रथादि से युक्त होकर तीक्ष्ण बाणो
और विकराल असि से अनेक राक्षसो का नाश करके कराल काल की
जिह्वा के अग्र भाग के समान अपने अनुगामियो सहित शोभा पाने लगे
॥४२॥ फिर सुग्रीव, पवनसुत हनुमान, नल, नील, अंगद और जाम-
वन्त आदि परम पराक्रमी बानरो ने वृक्ष और पर्वत शिलाएं उखाड
कर उनके प्रहार से देव-शत्रु महाबली रावण के उन सेवको को, जो
सीताजी के क्रोध से पहिले ही मरे के समान हो रहे थे, नष्ट कर दिया
॥४३॥ महाबली लक्ष्मण ने अत्यन्त घोर शब्द करने वाले रुधिरपायी
राक्षसो से समन्वित इन्द्रजित मेघनाद को मार डाला। फिर क्रोध
पूर्वक उन्होने निकुम्भ, मकराक्ष और विकटादि नामक बली निशाचरो
का भी संहार कर दिया ॥४४॥

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तृतीय अध्याय-३ ] [ ३८६

दतो दशमुखो रणे गजरथाश्वपत्तीश्वरै-
रलङ्घ्यगुणकोटिभि परिवृतो युयोभायुधैः ।
कपीश्वरचमूपते पतिमनन्तदिव्यायुध
रघूद्वहमनिन्दितं सपदि सङ्गतो दुर्जय ॥४५॥
दशाननमरिं ततो विधिवरस्मयावर्द्धितम्
महाबलपराक्रमं गिरिमिवाचल संयुगे ।
जघान रघुनायको निशितसायकैरूद्धतम्
निशाचरचमूपति प्रबलकुम्भकर्ण ततः ॥४६॥
तयोः खरतरै शरैर्गगनमच्छमाच्छादित
बभौ घनघटासमं मुखरमत्तडिद्वन्हिभिः ।
धनुर्गु रामहाशनिध्वनिभिरावृत भूतलं
भयङ्करनिरन्तर रघुपतेश्च रक्षःपतेः ॥४७॥

फिर रावण अपने करोडो गज, रथ, अश्व युक्त तथा पदाति
सैनिको के सहित रणभूमि मे उपस्थित हुआ और उसने कपीश्वर
सुग्रीव के भी स्वामी दिव्यायुध धारी श्रीराम से घोर संग्राम किया
॥४५॥ तब रघुनायक श्रीराम ने ब्रह्माजी के वर से प्रबल हुए महा
पराक्रमी और युद्ध क्षेत्र मे पर्वत के समान अडिग रहने वाले ˝राक्षसपति
रावण और उसके भाई कुम्भकर्ण को अपने बाणो से रुद्ध कर दिया
।४६।। फिर राम-रावण के उस युद्ध मे तीक्ष्ण बाणो से गगन मण्डल
उसी प्रकार आच्छादित हो गया, जिस प्रकार मेघो की घटा से हो
जाता है। बाणो के परस्पर टकराने से जो शब्द युक्त अग्नि की
चिंगारियाँ निकलती थी, वह ऐसी प्रतीत होती थी, जैसे गर्जन करती
हुई बिजली चमक उठती है । विद्युत-गर्जन के समान धनुष की टकार से
व्याप्त हुई रणभूमि अत्यन्त भयानक लगने लगी ॥४७॥

ततो धरणिजारुषा विविधरामबाणौजसा
पपात भुवि राणस्त्रिदशनाथविद्रावणः ।
ततोऽतिकुतुकौ हरिज्वलनरक्षिता जानकी

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३६० ] कल्कि-पुराण
समर्प्य रघुपूङ्गवे निजपुरी ययौ हर्षितः ॥४८॥
पुरन्दरकथादर सपदि तत्र रक्ष पतिम् ।
बिभीषणमभीषणं समकरोत्ततो राघव. ॥४६॥
दृगीश्वरगणावृतोऽवनिसुतायुत सानुजा
रथे शिवसखेरिते सुविमले लसत्पुष्पके ।
मुनीश्वरगणार्च्चितो रघुपतिस्त्वयोध्या ययौ
विवच्य मुमिलाञ्छन गुहगृहेऽतिसख्य स्मरन् ॥५०॥
फिर इन्द्र को त्रस्त करने वाला रावण जानकी जी के क्रोध
से व्याप्त एव श्रीराम के अस्त्रानल से दग्ध होकर धराशायी हो गया ।
रावण की मृत्यु हो जाने पर वानर श्रेष्ठ हनुमान जानकीजी को शुद्ध
करके लाये और उन्हें श्रीराम को समर्पित कर दिया । फिर प्रसन्न
चित्त से अपने स्थान को गये ॥४८॥ फिर देवराज के कहने से श्रीराम
ने रावण के भाई विभीषण को राक्षसो के राज्य पर अभिषिक्त किया
॥४६॥ फिर भगवान् रामचन्द्र जी वानर आदि तथा सीताजी और
लक्ष्मण को साथ लेकर अत्यन्त सुशोभित पुष्पक यान पर चढ कर
अयोध्या नगरी के लिए चले । मार्ग मे चलते हुए जब मध्य वन मे
पहुँचे तब उन्हें अपने मुनिवेष और गुह के गृह तथा उसकी मित्रता
का स्मरण हुआ । तभी मुनियो ने उनके समीप आकर उनका पूजन
किया ॥ ५० ॥
ततो निजगणावृतो भरतमातुर सान्त्वयन्
स्वमातृगणवाक्यतः पितृनिजासने भूपति ।
वसिष्ठमुनिपुङ्गवै कृतानिजाभिषेको विभु-
समस्त जनपालक. सुरपतिर्यथा सबभौ ॥५१॥
नरा बहुधनाकरा द्विजवरास्तपस्तत्पराः
स्वधर्म्मकृतनिश्चवाः स्वजनसङ्गता निर्भयाः ।
घनाः सुबहुवर्षिणो वसुमती सदा हर्षिता
भवत्यतिबले नृपे रघुपतावभूत्सज्जगत् ॥५२॥

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तृतीय अध्याय ३ ] [ ३६१
गतायुतसमाः प्रियैर्निजगणै प्रजा रञ्जयन्
निजा रघुपति. प्रिया निजमनोभवैर्मोहयन् ।
मुनीन्द्रगणसयुतोऽप्ययजदादिदेवान्मखै-
र्धनैर्विपुलदक्षिणैरतुलवाजिमेधैस्त्रिभि ।।५३।।
फिर अपने जनो से आवृत्त होकर दुख से कातर हुए भरतजी
को सान्त्वना दी और माताओ की आज्ञा से अपने पिता के राज्य
सिहासन पर अभिषिक्त हुए । उस समय वसिष्ठ आदि महर्षियो ने
उनका अभिषेक किया और तब वे लोको के स्वामी श्रीराम इन्द्र के
समान शोभा पाने लगे ।।५१।। फिर प्रजाजन धन से सम्पन्न हो गए,
द्विजवर तपस्या मे मग्न रहने लगे । सभी परस्पर प्रेम-भाव पूर्वक
भय-रहित चित्त से रहते हुए अपने-अपने धर्म मे तत्पर हो गए । मेघो
द्वारा समय पर वृष्टि होने से पृथिवी मुदित हो गई । इस प्रकार अत्यन्त
पराक्रमी श्रीराम के राज्य को प्राप्त होने से सम्पूर्ण विश्व सत्पथ का
अनुगामी हो गया । ५२। भगवान् श्रीराम अपने गुणो से प्रजा को
प्रसन्न रखने और अपनी प्राणप्रिया सीताजी के मन को भी आनन्दित
करने लगे । उन्होने महर्षियो के महयोग से बहुत प्रकार की दक्षिणा
और दान-यज्ञादि के द्वारा देवताओ को प्रसन्न करते हुए तीन अश्वमेध
यज्ञ निर्विघ्न रूप से पूर्ण किये । इस प्रकार उन्होने दस हजार वर्ष तक
राज्य किया ।५३।
तत किमपि कारण मनसि भावयन्भूपति-
र्जहौ जनकजा वने रघुवरस्तदा निर्घृणः ।
ततो निजमत स्मरन्गमनयत्प्रचेत. सुतो
निजाश्रममुदारधीरघुपते प्रिया 'दुःखिताम् ।।५४।।
तत' कुशलवौ सुतौ प्रसुषुबे धरित्रीसुता
महाबलपराक्रमौ रघुपतेर्यशोग़ायनौ ।
स तामपि सुतान्विता मुनिवरस्तु रामान्तिकॆ
समर्पयदनिन्दिता सुरवरै सदा वन्दिताम् ।।५५।।

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३६२ ] [ कल्कि पुराण
ततो रघुपतिस्तु ता सुतयुता रुदन्ती पुरो
जगाद दहने पुन प्रविश शोधनायात्मन. ।
इतीरितमवेक्ष्य सा रघुपते पदाब्जे नता
विवेश जनोयुता मणिगणोज्वल भूतलम् ॥५६॥
फिर किसी कारण वश श्रीराम को अपना हृदय कठोर करना
पडा और उन्होन जानकीजी को परित्याग का वन मे पहुँचा दिया । तब
महर्षि बाल्मीकि अपने द्वारा रचित रामायण का स्मरण करके दु खित
चित्त होते हुए जानकीजी का अपने आश्रम मे लिवा लाये ॥५४॥
फिर जानकीजी के कुश और लव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए । इन दोनो
राज पुत्रो ने श्रीराम के समीप पहुंच कर उनका यश गाया । फिर महर्षि
वाल्मीकि ने अनिन्दित एव देव-पूजिता जानकीजी को इन दोनो पुत्रो
के सहित श्रीराम को समर्पित कर दिया ॥५५॥ दोनो पुत्रो के सहित
रोती हुई जानकी को अपने सामने खडी देख कर श्रीराम उनसे बोले—
सीते ! तुम अपनी शुद्धि के लिये पुनः अग्नि-प्रवेश करो । उनके यह
वचन सुन कर जानकीजी ने उनके चरणारविन्दो मे प्रणाम किया आदर
अपनी माता पृथिवी के साथ पाताल मे प्रविष्ट हो गईं ॥५६॥
निरीक्ष्य रघुनायको जनकजाप्रयाण स्मरन्
वन्शिष्ठगुरुयोगतोऽनुजयुतोऽगमरस्व पदम् ।
पुर.स्थितजन.स्वकै पशुभिरीश्वर सस्पृशन्
मुदा सरयुजीवन रथवरे परीतो विभुः ॥५७॥
ये शृण्वन्ति रघूद्वहस्य चरित कर्णामृत सादरात्
ससारार्णवशोषणाञ्च पठतामामोदद मोक्षदम् ।
रोगाणामिह शान्तये धनजनस्वर्गादिसम्पत्तये
वंशानामपि वृद्धये प्रभवति श्रीशः परेश प्रभुः ॥५८.।
जानकीजी को इस प्रकार पाताल में गई देख कर रामचन्द्र भी
उनका स्मरण करते हुए अपने गुरु वसिष्ठ, अनुजगण तथा परिजनो

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तृतीया अध्याय-३ ] [ ३६३
और पशुओ के साथ सरयू तट पर गये और प्रसन्न हृदय से जल का
स्पर्श करके दिव्य विमान मे आरूढ होकर अपने लोक को गये ॥५७॥
कानो के लिए अमृत के समान इस राम चरितामृत को जो आदर
सहित सुनेगे उनकी सभी बाधाएँ श्रीराम-कृपा के दूर हो जायेंगी।
रोग नष्ट होगे, वंश-वृद्धि, धन-जन की समृद्धि और स्वर्ग रूप ऐश्वर्य
की प्राप्ति होगी। जो इसका पाठ करेगे, उनके लिए यह ससार-सागर
शुष्क होकर अत्यन्त आनन्द तथा मोक्ष-रूप परम पुरुषार्थ की प्राप्ति
होगी ॥५८॥

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तृतीयांश-
चतुर्थ अध्याय
रामात्कुशोऽभूदतिथिस्ततोऽभून्निषधान्नभ ।
तस्मादभूत्पुण्डरीक' क्षेमधन्वाऽभवत्तत ।१।
देवानीकस्ततो हीन' परिपात्रोऽथ हीनत ।
बलाहकस्ततोऽकंश्र्च रजनाभस्ततोऽभवत ।२।
खगणाद्विधृतस्तस्माद्धिरण्मनाभसङ्गित' ।
तत पुष्पादध्रुवस्तस्मात्स्यन्दनोऽथा म्नवणक. । ३।
तस्माच्छीघ्रोऽभवत्पुत्र पिता मेऽतुलविक्रम. ।
तस्मान्मरु मां केऽपीह बुधउच्चापि सुमित्रकम् ।४।
कलापग्राममासाद्य विद्धि सत्तपसि स्थितम् ।
तवावतार विज्ञाय व्यासात्सत्यवतीसुतात् ।
प्रतीक्ष्य काल लक्षाब्द कले प्राप्तस्तवान्तिकम् ।
जन्मकोट्य घसा राशेर्नाशन वमंशासनम् ।
वंश'कीर्तिकर सर्वकामपूर परात्मन ।६।
उन श्रीराम के पुत्र कुश हुए। कुश के अतिथि, अतिथि के
निषध, निषध के नभ, नभ के पुण्डरीक और पुण्डरीक के पुत्र क्षेमधन्वा
हुए ॥१॥ क्षेमधन्वा के पुत्र देवानीक, देवानीक के हीन, हीन के परि-
पात्र, परिपात्र के बलाहक, बलाहक के अर्क और अर्क के पुत्र रजनाभ
हुए ॥ २।। रजनाभ के खगण, खगण के विधृत, विधृत के हिरण्यनाभ,
हिरण्यनाभ के पुष्प, पुष्प ध्रुव, के ध्रुव के स्यन्दन और स्यन्दन के पुत्र
३६४

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चतुर्थ अध्याय-३ ] [ ३६५
अग्निवर्ण हुए ।३।। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्र हुए, वे अत्यन्त विक्रम
वाले ही मेरे पिता थे । मैं उन्हीं शीघ्र का पुत्र मरु हूँ । कुछ लोग मुझे
बुद्ध और कुछ सुमित्र कहते है ।।४।। अब तक मैं कलाप ग्राम में निवास
करता हुआ तपस्या में रत था । सत्यवती सूनु व्यास जी के मुख से मुझे
आपके अवतार का समग्र ज्ञान हुआ और तब मैं कलियुग की एक लाख
वर्ष तक प्रतीक्षा करने पश्चात् आपके समीप उपस्थित हुआ हूँ । क्योंकि
आप परमात्मा का सामीप्य प्राप्त होने से करोड़ों जन्मों के पापों का नाश
हो जाता है तथा धर्म-यश की वृद्धि और सभी कामनाओं की पूर्ति
होती है ।।५-६।।
ज्ञातस्तवान्वयस्त्वञ्च सूर्यवंशसमुद्भवः ।
द्वितीय कोऽपर श्रीमान्महापुरुषलक्षण ।७।
इति कल्किवचः श्रुत्वा देवापिर्मधुराक्षराम् ।
वाणी विनयसम्पन्नः प्रवक्तुमुपचक्रमे ।८।
प्रलयान्ते नाभिद्मात्तवाभूच्चतुराननः ।
तदोयत नयादत्रे श्चन्द्रस्तस्मात्ततो बुधः ।६।
तस्मात्पुरूरवा जज्ञे ययातिर्नहुषस्ततः . .
देवयान्यां ययातिस्तु यदुं तुर्वसुमेव च ।१०।
शर्मिष्ठायां दना द्रुह्युञ्चानु पूरुञ्च सतते ।
जनयामास भूतादिर्भूतानांव सिसृक्षया ।११।
पूरोज्जन्मेजयस्तस्मात्प्रविन्वानभवत्ततः ।
प्रवीरस्तन्मनस्युर्वै तस्माच्चाभयदोऽभवत् ।१२।
उरुक्षयाच्च त्रय्यरुणस्ततोऽभूत्सुकरोहरिणः ।
वृहत्क्षेत्रादभूद्धस्ती यन्नाम्ना हस्तिनापुरम् ।१३।
कल्कि बोले—तुम्हारी वंशावली सुनकर मैं यह जान गया कि
तुम सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हो । परन्तु तुम्हारे साथ यह महापुरुषों के
लक्षणों से सम्पन्न एवं श्रीमान् पुरुष दूसरे कौन हैं ? ।।७।। यह सुन
कर देवापि ने विनयपूर्वक मधुर वाणी से निवेदन किया । वे बोले —

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३६६ ] [ कल्कि पुराण

हे प्रभो ! प्रलय का अन्त होने पर आपके नाभिकमल से ब्रह्माजी की
उत्पत्ति हुई थी । उन ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि हुए । अत्रि के चन्द्रमा,
चन्द्रमा के बुध, बुध के पुरूरवा, पुरूरबा के नहुष और नहुष के पुत्र
ययाति हुए । उन ययाति ने अपनी पत्नी देवयानी के गर्भ से यदु और
तुर्वम नामक दो पुत्रो को जन्म दिया ॥६-१०॥ हे सत्पते ! उन्ही
ययाति ने शर्मिष्ठा नाम को पत्नी से द्रह्यु, अनु और पुरु नामक तीन
पुत्र उत्पन्न किये । जैसे सृष्टिकाल मे भूतादि के द्वारा पचभूतो की
उत्पत्ति होती है, वैसे ही ययाति से इन पाँच पुत्रो की उत्पत्ति हुई
॥११॥ पुरु का पुत्र जन्मेजय हुआ, जन्मेजय के प्रचिन्वान्, प्रचिन्वान्
के प्रवीर, प्रवीर के मनस्यु, मनस्यु के अभयदा अभयदा के उरुक्षय उनके
त्रयरुणि, त्रयरुणि के पुष्करारुणि, पुष्करारुणि के वृहत्क्षेत्र और वृहत्क्षेत्र,
के पुत्र हस्ती हुए । इन हस्ती नामक राजा के नाम पर ही हस्तिनापुर
नामक नगर की स्थापना हुई ॥१२-१३॥
अजमीढोऽहिमीढश्च पुरुमीढस्तु तत्सुताः ।
कजमीढादभूदृक्षस्तस्मात्संवरणात्कुरु ।१४।
कुरोः परिक्षित्सुधनुर्जन्हुर्निषध एव च ।
सुहोत्रोऽभूत्सुधनुषश्चवनाच्च तत कृती ।१५।
ततो बृहद्रथस्तस्मात्कुशाग्रादृषभोऽभवत् ।
तत सत्यजितः पुत्र पुष्पवान्नहुषस्तत ।१४।
बृहद्रथान्यभार्यायां जरासन्ध परन्तप ।
सहदेवस्ततस्मान्सोमापियंच्छु तश्रवा ।१७।
सुरथाद्विदूरथस्तस्मात्सार्वभौमोऽभवत्तत ।
जयसेनाद्रथानोकोऽभूद्यु तायुश्च कोपनः ।१८।
हस्ती के तीन पुत्र हुए । उनके नाम अजमीढ, अहिमीढ और
पुरुमीढ हुए । अजमीढ़ के पुत्र ऋक्ष, ऋक्ष के सवरण और सवरण के
पुत्र कुरु हुए ।१४। कुरु के पुत्र परीक्षित, परीक्षित के सुधनु, जन्हु और
निषध—यह तीन पुत्र हुए । सुधनु के पुत्र सुहोत्र और सुहोत्र के पुत्र

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चतुर्थ अध्याय-४ ] [ ३६७
च्यवन हुए ।१५। च्यवन के बृहद्रथ बृहद्रथ के कुशाग्र, कुशाग्र के ऋषभ,
ऋषभ के सत्यजीत, सत्यजीत के पुष्पवान् तथा पुष्पवान् के पुत्र नहुष
हुए ।१६। बृहद्रथ की द्वितीय पत्नी के गर्भ से शत्रु पीडक जरासन्ध हुए ।
जरासन्ध के सहदेव, सहदेव के सोमापि और सोमापि के पुत्र श्रुतश्रवा
हुए ।१७। श्रुतश्रवा के पुत्र सुरथ हुए । सुरथ के विदूरथ, विदूरथ के
सार्वभौम, सार्वभौम के जयसेन, जयसेन के रथानीक और रथानीक के
पुत्र क्रोधी स्वभाव के युतायु हुए ।१८।
तस्माद्देवातिथिस्तस्मादृक्षस्तस्माद्दिलीपकः ।
तस्मात्प्रतीपकस्तस्य देवापिरहमोश्वर ! ।१६।
राज्य शान्तनवे दत्वा तपस्येकधिया चिरम् ।
कलापग्राममासाद्य त्वा दिदृक्षुरिहागत ।२०।
मरुणाऽनेन मुनिभिरेभिः प्राप्य पदाम्बुजम् ।
तव कालकरालास्याद्यास्याम्यात्मवता पदम् ।२१।
तयोरेव वच श्रुत्वा कल्किः कमलोचनः ।
प्रहस्य मरुदेवापी समाश्वास्य समब्रवीत् ।२२।
युवा परमधर्म्मज्ञौ राजानौ विदितावुभौ ।
मदादेशकरौ भूत्वा निजराज्यं भरिष्यथ . ।२३।
युतायु के पुत्र देवातिथि हुए ! देवातिथि के ऋक्ष, ऋक्ष के दिलीप
और दिलीप के पुत्र प्रतीपक हुए । हे प्रभो ! मैं उन्ही प्रतीपक का पुत्र
देवापि हूँ ।१६। मैंने शान्तनु को अपने राज्य पर आसीन किया और
स्वयं कलाप ग्राम मे रह कर एकचित्त हो तपस्या करता था । अब
आपके दर्शन की कामना से ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ ।२०। मैंने मरु
और मुनिवरो के सहित यहाँ आकर आपके चरणारबिन्द को प्राप्त
किया है । इसके फल स्वरूप मैं काल के कराल गाल मे गिरने से बच
गया, आत्म तत्वज्ञो का पद हमे मिल जायगा ।२१। मरु और देवापि की
बातो को सुन कर पद्माक्ष कल्किजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होने
आश्वासन भरे शब्दो मे उनसे कहा । कल्कि बोले—मै जान गया कि