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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 126 of 259

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Page 126

तृतीयांश—
तृतीय अध्याय
सुस्वागतान्मुनीन् दृष्ट्वा कल्किक परम धर्मवित् ।
पूजावित्वा च विधिवत्सुखासीनानुवा चतान् ॥१॥
कयूय सूर्यसङ्काशा मम भाग्यादुपस्थिताः ।
तीर्थाटनोत्सुका लोकत्रयाणामुपकारकाः ॥२॥
वय लोके पुण्यवन्तो भाग्यवन्तो यशस्विनः ।
यत कृपाकटाक्षेण युष्माभिरवलोकिताः ॥३॥
ततस्ते वामदेवऽत्रिवं सष्ठो गालवो भृगुः ।
पराशरो नारदोऽश्वत्थामा रामः कृपक्षितः ॥४॥
दुर्वासा देवलः कण्वो वेदप्रमितिरङ्गिराः ।
एते चान्ये च बहबी मुनय, सशितव्रताः ॥५॥
कृत्वाग्रे मरुदेवापी च चन्द्रसूर्यकुलोद्भवौ ।
राजानौ तौ महावीर्यौ तपस्याभिरतौ चिरम् ॥६॥
ऊचुः प्रहृष्टमनसः कल्कि कल्कविनाशनम् ।
महोदधेस्तोरगत विष्णु सुरगणा यथा ॥७॥
परम धर्मविद कल्किजी ने उन मुनिगण को सुखपूर्वक वहाँ
आये हुए देखकर स्वागत, आसन और विधिवत् पूजन करके उनसे
बोले ॥१॥ सूर्य के समान अत्यन्त तेजस्वी, तीर्थाटन मे उत्सुक एवं
तीनो लोको के कल्याण रूप उपकार की कामना वाले आप कौन हैं ?
जो मेरे सौभाग्यवश यहाँ पधारे हैं ॥२॥ आपके द्वारा कृपा-कटाक्ष
पूर्वक देखे जाने से मैं आज इस लोक मे अपने को पुण्यवान्, भाग्यवान्