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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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प्रथम अध्याय-२ ] [ ३८५
दिखाने का निष्फल प्रयत्न किया ॥३०॥ फिर महाराज दशरथने अयोध्या
पहुँच कर अपने मन्त्रियो के परामर्श से सीतापत्ति राम को अयोध्या के
राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त करने का विचार किया । अभिषेक के
लिए सम्पूर्ण सामग्री एकत्र होकर जब पूर्ण तैयारी हो गई, तब श्रीराम
का अभिषेक करने मे तत्पर राजा दशरथ को कैकेयी ने वरदान माँग कर
रोक दिया ॥ ३१ ॥ तब महाराज की आज्ञा सुन कर जनक सुता
और सुमित्रा पुत्र-लक्ष्मण सहित श्रीराम वन मे गये । साथ चलते हुए
पुरवासियो को आगे चल कर छोड़ दिया तथा गुह के घर मे जाकर
राजकीय वस्त्राभूषणो का परित्याग कर जटावल्कल धारण कर
लिया ॥३२॥
प्रियानुजयुतस्ततो मुनिमतो वने पूजितः
स पञ्चवटिकाश्रमे भरतमातुर सगतम् ।
नि-वार्य मरण पितु समवधार्य्य दुःखानुर-
स्तपोवनगतोऽवसद्रघुपतिस्ततस्ता समाः ॥३३॥
दशाननसोदरा विषमबाणवेधातुरां-
समीक्ष्य वररूपिणी प्रहसती सती सुन्दरीम् ।
निजाश्रयमभीप्सती जनकजापतिर्लक्ष्मणा-
त्करालकरवालत समकरोद्विरूपा तत ॥३४॥
समाप्य पथि दानव खरशरै शनैर्नाशयन्
चतुर्दशसहस्रक समहनन्खर सानुगम् ।
दशाननवशानुग कनकचारुच्छन्मृग
प्रियाप्रियकरो वने समवधीद्बलाद्राक्षसम् ॥३५॥
सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ मुनिवेश धारी श्री राम
पूजा-सम्पन्न होकर विविध मे वनो निवास करने लगे । इसके
पश्चात् कातरता पूर्वक भरतजी वहाँ आये । उनसे पिता का मरण
सुन कर श्रीराम को बडा दुःख हुआ और भरत जी को समझा कर
लौटा दिया और तपोवन मे रहने लगे ॥३३॥ फिर कामबाण से बिद्ध