कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context३८८ ] [ कल्कि पुराण
कर बानरो के सहित लंकापुरी जा पहुंचे और रावण के पुर की प्राचीर
आदि को उन्होंने नष्ट कर डाला ॥४१॥
ततोऽनुजयुतो युधि प्रबलचण्डकोदण्डभृत्
शरै खरतरै क्रुधा गजरथाश्ववहसाकुल ।
करालकरवालत प्रबलकालजिह्वाग्रतो
निहत्य वरराक्षमान्नरपतिर्बभौ सानुगः ॥४२॥
जघान घनघोषगा़नुगगणीरसृक् प्राशनैः ।
ततोऽतिबलवानरैर्गिरिमहीरुहोद्यत्करै
करा़लतरताडनैर्जनकजारुषा नाशितान् ।
निजघ्नुनमरादं नान्तिबलान्दशास्यानुगान्
नलाङ्गदहरीश्वराऽशुगसुतर्क्षराजादयः ॥४३॥
ततोऽतिबललक्ष्मणास्त्रदशनाथशत्रु रणे
प्रहस्त विकटादिकानपि निशाचरान्व्यङ्गनान्
निकुम्भ मकराक्षकांन्निशितखड्ग पातैः क्रुधा ॥४४॥
फिर लक्ष्मण के सहित श्रीराम ने अत्यन्त उग्र बाणो को
धारण किया और गज, अश्व तथा रथादि से युक्त होकर तीक्ष्ण बाणो
और विकराल असि से अनेक राक्षसो का नाश करके कराल काल की
जिह्वा के अग्र भाग के समान अपने अनुगामियो सहित शोभा पाने लगे
॥४२॥ फिर सुग्रीव, पवनसुत हनुमान, नल, नील, अंगद और जाम-
वन्त आदि परम पराक्रमी बानरो ने वृक्ष और पर्वत शिलाएं उखाड
कर उनके प्रहार से देव-शत्रु महाबली रावण के उन सेवको को, जो
सीताजी के क्रोध से पहिले ही मरे के समान हो रहे थे, नष्ट कर दिया
॥४३॥ महाबली लक्ष्मण ने अत्यन्त घोर शब्द करने वाले रुधिरपायी
राक्षसो से समन्वित इन्द्रजित मेघनाद को मार डाला। फिर क्रोध
पूर्वक उन्होने निकुम्भ, मकराक्ष और विकटादि नामक बली निशाचरो
का भी संहार कर दिया ॥४४॥