कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतृतीय-अध्याय-३ ] [ ३८७
मृतक सस्कार किया ॥३७॥ सीताजी के वियोग से व्याकुल हुए धनुर्धरो
मे श्रेष्ठ श्रीराम लक्ष्मण के सहित नव-परिचय प्राप्त बानर सेना मे
मिले और उनकी सूर्य पुत्र बालि के छोटे भाई सुग्रीव द्वारा भेजे हुए
उसके मन्त्री हनुमान से भेट हुई ॥३८॥
ततस्तदुदितं मत पवनपुत्रसुग्रीवयो-
स्तृणाधिपतिभेदन निजनृपासनस्थापितम् ।
विविच्य व्यवसायकैर्निजसखाप्रिय बालिनम्
निहत्य हरिभूपति निजसख स रामोऽकरोत् ॥३६॥
अथोत्तरमिमा हरिजजनकजा समन्वेषयन्
जटायुसहजोदितैर्जलनिधि तरन्वायुजः ।
दशाननपुर विशञ्जनकजा समानन्दय
न्नशोकवनिकाश्रमे रघुपति पुन प्राययौ ॥४०॥
ततो हनुमता बलादमितरक्षसा नाशन
ज्वलज्ज्वलनसकुलज्वलितदग्धलङ्कापुरम् ।
विविच्य रघुनायको जलनिधि रुषा शोषयन्
बबन्ध हरियूथप. परिवृतो नगेरीश्वर ।।
बभञ्ज पुरपत्तन विविधसर्व्वदुर्गक्षमम्
निशाचरपते. क्रुधा रघुपति' कृतो सद्गति ॥४१॥
फिर सुग्रीव और हनुमान की प्रार्थना पर उन्होने ताल के सात
वृक्षो को काट गिराया और बालि का वध करके सुग्रीव को बानरो का
राजा बना कर उससे मित्रता स्थापित की ॥३६॥ फिर पवनसुत
हनुमान सीता की खोज मे गये और संपाति की प्रेरणा पर लकापुरी मे
स्थित अशोक वाटिका पहुँच कर उन्होने सीताजी को राम-सदेश से
आनन्दित किया और रामचन्द्रजी के पास लौट आये ॥ ४० ॥ फिर
श्रीरामचन्द्र ने हनुमानजी के द्वारा अनेको राक्षसो का मारा जाना और
लका का जलाया जाना सुना तो वे शिलाओ द्वारा समुद्र पर सेतु बाँध