कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextचतुर्थ अध्याय-३ ] [ ३६५
अग्निवर्ण हुए ।३।। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्र हुए, वे अत्यन्त विक्रम
वाले ही मेरे पिता थे । मैं उन्हीं शीघ्र का पुत्र मरु हूँ । कुछ लोग मुझे
बुद्ध और कुछ सुमित्र कहते है ।।४।। अब तक मैं कलाप ग्राम में निवास
करता हुआ तपस्या में रत था । सत्यवती सूनु व्यास जी के मुख से मुझे
आपके अवतार का समग्र ज्ञान हुआ और तब मैं कलियुग की एक लाख
वर्ष तक प्रतीक्षा करने पश्चात् आपके समीप उपस्थित हुआ हूँ । क्योंकि
आप परमात्मा का सामीप्य प्राप्त होने से करोड़ों जन्मों के पापों का नाश
हो जाता है तथा धर्म-यश की वृद्धि और सभी कामनाओं की पूर्ति
होती है ।।५-६।।
ज्ञातस्तवान्वयस्त्वञ्च सूर्यवंशसमुद्भवः ।
द्वितीय कोऽपर श्रीमान्महापुरुषलक्षण ।७।
इति कल्किवचः श्रुत्वा देवापिर्मधुराक्षराम् ।
वाणी विनयसम्पन्नः प्रवक्तुमुपचक्रमे ।८।
प्रलयान्ते नाभिद्मात्तवाभूच्चतुराननः ।
तदोयत नयादत्रे श्चन्द्रस्तस्मात्ततो बुधः ।६।
तस्मात्पुरूरवा जज्ञे ययातिर्नहुषस्ततः . .
देवयान्यां ययातिस्तु यदुं तुर्वसुमेव च ।१०।
शर्मिष्ठायां दना द्रुह्युञ्चानु पूरुञ्च सतते ।
जनयामास भूतादिर्भूतानांव सिसृक्षया ।११।
पूरोज्जन्मेजयस्तस्मात्प्रविन्वानभवत्ततः ।
प्रवीरस्तन्मनस्युर्वै तस्माच्चाभयदोऽभवत् ।१२।
उरुक्षयाच्च त्रय्यरुणस्ततोऽभूत्सुकरोहरिणः ।
वृहत्क्षेत्रादभूद्धस्ती यन्नाम्ना हस्तिनापुरम् ।१३।
कल्कि बोले—तुम्हारी वंशावली सुनकर मैं यह जान गया कि
तुम सूर्यवंश में उत्पन्न हुए हो । परन्तु तुम्हारे साथ यह महापुरुषों के
लक्षणों से सम्पन्न एवं श्रीमान् पुरुष दूसरे कौन हैं ? ।।७।। यह सुन
कर देवापि ने विनयपूर्वक मधुर वाणी से निवेदन किया । वे बोले —