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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 136

तृतीय अध्याय-३ ] [ ३८६

दतो दशमुखो रणे गजरथाश्वपत्तीश्वरै-
रलङ्घ्यगुणकोटिभि परिवृतो युयोभायुधैः ।
कपीश्वरचमूपते पतिमनन्तदिव्यायुध
रघूद्वहमनिन्दितं सपदि सङ्गतो दुर्जय ॥४५॥
दशाननमरिं ततो विधिवरस्मयावर्द्धितम्
महाबलपराक्रमं गिरिमिवाचल संयुगे ।
जघान रघुनायको निशितसायकैरूद्धतम्
निशाचरचमूपति प्रबलकुम्भकर्ण ततः ॥४६॥
तयोः खरतरै शरैर्गगनमच्छमाच्छादित
बभौ घनघटासमं मुखरमत्तडिद्वन्हिभिः ।
धनुर्गु रामहाशनिध्वनिभिरावृत भूतलं
भयङ्करनिरन्तर रघुपतेश्च रक्षःपतेः ॥४७॥

फिर रावण अपने करोडो गज, रथ, अश्व युक्त तथा पदाति
सैनिको के सहित रणभूमि मे उपस्थित हुआ और उसने कपीश्वर
सुग्रीव के भी स्वामी दिव्यायुध धारी श्रीराम से घोर संग्राम किया
॥४५॥ तब रघुनायक श्रीराम ने ब्रह्माजी के वर से प्रबल हुए महा
पराक्रमी और युद्ध क्षेत्र मे पर्वत के समान अडिग रहने वाले ˝राक्षसपति
रावण और उसके भाई कुम्भकर्ण को अपने बाणो से रुद्ध कर दिया
।४६।। फिर राम-रावण के उस युद्ध मे तीक्ष्ण बाणो से गगन मण्डल
उसी प्रकार आच्छादित हो गया, जिस प्रकार मेघो की घटा से हो
जाता है। बाणो के परस्पर टकराने से जो शब्द युक्त अग्नि की
चिंगारियाँ निकलती थी, वह ऐसी प्रतीत होती थी, जैसे गर्जन करती
हुई बिजली चमक उठती है । विद्युत-गर्जन के समान धनुष की टकार से
व्याप्त हुई रणभूमि अत्यन्त भयानक लगने लगी ॥४७॥

ततो धरणिजारुषा विविधरामबाणौजसा
पपात भुवि राणस्त्रिदशनाथविद्रावणः ।
ततोऽतिकुतुकौ हरिज्वलनरक्षिता जानकी