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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

३. चित्तवग्गो (चित्त वर्ग)

२६ ] धम्मपदं [ ४।१४
अनुवाद—फूलकी सुगंध हवासे उलटी ओर नहीं जाती, न चन्दन,
तगर या चमेली (की गंध ही वैसा करती है);
किन्तु सज्जनोंकी सुगंध हवासे उलटी ओर जाती है,
सत्पुरुष सभी दिशाओंमें (सुगंध) बहाते हैं।
५५-चन्दनं तगरं वापि उप्पलं अथ वस्सिकी।
एतेसं गन्धजातानं सीलगन्धो अनुत्तरो ॥१२॥
(चन्दनं तगरं वापि उत्पलं अथ वार्षिकी।
एतेषां गन्धजातानां शीलगन्धोऽनुत्तरः ॥१२॥)
अनुवाद—चन्दन या तगर, कमल या जूही, इन सभी (की) सुगंधों-
से सदाचारकी सुगंध उत्तम है।
राजगृह (वेणुवन) महाकस्सप
५६—अप्पमत्तो अयं गन्धो या'यं तगरचन्दनी।
यो च सीलवतं गन्धो वाति देवेसु उत्तमो ॥१३॥
(अल्पमात्रोऽयं गन्धो योऽयं तगरचन्दनी।
यश्च शीलवतां गन्धो वाति देवेषु उत्तमः ॥१३॥)
अनुवाद—तगर और चन्दनकी जो यह गंध फैलती है, वह अल्प-
मात्र है; और जो यह सदाचारियोंकी गंध है, (वह) उत्तम
(गंध) देवताओंमें फैलती है।
राजगृह (वेणुवन) गोधिक (थेर)
५७-तेसं सम्पन्नसीलानं अप्पमादविहारिनं ।
सम्मदञ्ञाविमुत्तानं मारो मग्गं न विन्दति ॥१४॥

४।१६ ] पुप्फवग्गो [ २७
(तेषां सम्पन्नशीलानां अप्रमाद-विहारिणाम् ।
सम्यग्-ज्ञा-विमुक्तानां मारो मार्गं न विन्दति ॥१४॥ )
अनुवाद—( जो ) वे सदाचारी निरालस हो विहरनेवाले, यथार्थ
ज्ञान द्वारा मुक्त ( हो गये हैं ), ( उनके ) मार्गको मार
नहीं पकड सकता ।
जेतवन गरहादिन्न
५८-यथा संकारधानस्मिं उज्झितस्मिं महापथे ।
पदुमं तत्थ जायेथ सुचिगन्धं मनोरमं ॥१५॥
( यथा संकारधान उज्झिते महापथे ।
पद्म तत्र जायेत शुचिगन्धं मनोरमम् ॥१५॥ )
५६-एवं संकारभूतेसु अन्धभूते पृथुज्जने ।
अतिरोचति पञ्ञाय सम्मासम्बुद्धसावको ॥१६॥
( एवं संकारभूते अन्धभूते पृथग्जने ।
अतिरोचते प्रज्ञया सम्यक्-संबुद्ध-श्रावकः ॥१६॥ )
अनुवाद—जैसे महापथपर फेंके कूड़ेके ढेरपर मनोरम, शुचिगंध,
गुलाब ( =पद्म ) उत्पन्न होवे, इसी प्रकार कूड़े समान
अन्धे अज्ञजनों ( =पृथग्-जनों ) में सम्यक्-संबुद्ध ( =यथार्थ
ज्ञानी ) का अनुगामी ( अपनी ) प्रज्ञासे प्रकाशमान
होता है ।
४-पुष्पवर्ग समाप्त

५'—बालवग्गो
श्रावस्ती ( जेतवन ) दरिद्र सेवक
६०-दीघा जागरतो रत्ति दीघं सन्तस्स योजनं ।
दीघो बालानं संसारो सद्धम्मं अविजानतं ॥ १॥
( दीर्घा जाग्रतो रात्रिः दीर्घं श्रान्तस्य योजनम् ।
दीर्घो बालानां संसारः सद्धर्मं अविजानताम् ॥१॥ )
अनुवाद—जगतेको रात लम्बी होती है, थकेके लिये योजन लम्बा
होता है, सच्चे धर्मको न जाननेवाले मूढोंके लिये संसार
( = आवागमन ) लम्बा है।
राजगृह सार्द्धविहारी (=शिष्य )
६१-चरञ्चे नाधिगच्छेय्य सेय्यं सदिसमत्तनो ।
एकचरियं दळ्हं कयिरा नत्थि बाले सहायता ॥२॥
( चरन् चेत् नाधिगच्छेत् श्रेयांसं सदृशं आत्मनः ।
एकचर्यां दृढं कुर्यात् नास्ति बाले सहायता ॥२॥ )
२८ ]

५।२ ] बालवग्गो [ २९
अनुवाद—यदि विचरण करते अपने अनुरूप भलेमानुषको न पाये,
तो दृढ़ताके साथ अकेला ही विचरे, मूर्खसे मित्रता
नहीं निभ सकती ।
श्रावस्ती आनन्द ( सेठ )
६२—पुत्ता म'त्थि धनम्म'त्थि इति बालो विहञ्ञति ।
अत्ता हि अत्तनो नत्थि कुतो पुत्तो कुतो धनं ॥३॥
( पुत्रा मे सन्ति धनं मे ऽस्ति इति बालो विहन्यते ।
आत्मा हि आत्मनो नास्ति कुतः पुत्रः कुतो धनम् ॥३॥ )
अनुवाद—"पुत्र मेरा है", "धन मेरा है" ऐसा ( करके ) अज्ञ
( नर ) उत्पीड़ित होता है, जब आत्मा ( = शरीर ) ही
अपना नहीं, तो कहाँसे पुत्र और धन ( अपना होगा ) ।
जेतवन गिरहकट चोर
६३—यो बालो मञ्ञती बाल्यं पण्डितो चापि तेन सो ।
बालो च पण्डितमानी, स वे बालो'ति वुच्चति ॥४॥
( यो बालो मन्यते बाल्यं पण्डितश्चापि तेन स ।
बालश्च पंडितमानी स, वै बाल इत्युच्यते ॥४॥ )
अनुवाद—जो ( कि वह ) अज्ञ होकर ( अपनी ) अज्ञताको जानता
है, इस ( अंश ) से वह पंडित ( = जानकार ) है । वस्तुतः
अज्ञ होकर भी जो पंडित होनेका दम भरता है, वही अज्ञ
( =बाल ) कहा जाता है ।

३० ] धम्मपदं [ ५।७
श्रावस्ती ( जेतवन ) उदायी ( थेर )
६४-यावजीवम्पि चे बालो पण्डितं पयिरुपासति ।
न सो धम्मं विजानाति दब्बी सूपरसं यथा ॥ ५॥
( यावज्जीवमपि चेद् बालः पंडितं पर्युपास्ते ।
न स धर्मं विजानाति दर्वी सूपरसं यथा ॥५॥ )
अनुवाद—चाहे बाल ( = जड; अज्ञ ) जीवन भर पंडितकी सेवामें
रहे ( तो भी ) वह धर्मको ( वैसे ही ) नहीं जान सकता,
जैसे कि कलछी ( = दब्बी = दयली ) सूप ( = दाल
आदि ) के रसको ।
श्रावस्ती ( जेतवन ) भद्रवर्गीय ( भिक्षुलोग )
६५-मुहुत्तमपि चे विञ्ञू पण्डितं पयिरुपासति ।
खिप्पं धम्मं विजानाति जिह्वा सूपरसं यथा ॥६॥
( मुहूर्त्तमपि चेद् विज्ञः पंडितं पर्युपास्ते ।
क्षिप्रं धर्मं विजानाति जिह्वा सूपरसं यथा ॥६॥ )
अनुवाद—चाहे विज्ञ ( पुरुष ) एक मुहूर्त ही पंडितकी सेवामें
रहे, ( तो भी वह ) शीघ्र ही धर्मको जान सकता है, जैसे
कि जिह्वा सूपके रसको ।
राजगृह ( वेणुवन ) सुप्पबुद्ध ( कोढ़ी )
६६-चरन्ति बाला दुम्मेधा अमित्तेनेव अत्तना ।
करोन्तो पापकं कम्मं यं होति कटुकप्फलं ॥७॥
( चरन्ति बाला दुर्मेधसोऽमित्रेणेवात्मना ।
कुर्वन्तः पापकं कर्म यद् भवति कटुकफलम् ॥७॥ )

५।१० ] बालवग्गो [ ३१
अनुवाद—पाप कर्मको—जो कि कटु फल देनेवाला होता है—करते
दुष्ट बुद्धि अज्ञ ( जन ) अपने ही अपने शत्रु बनते हैं।
जेतवन कोई कस्सप
६७-न तं कम्मं कतं साधु यं कत्वा अनुतप्पति ।
यस्स अस्सुमुखो रोदं विपाकं पटिसेवति ॥८॥
( न तत् कर्म कृतं साधु यत् कृत्वाऽनुतप्यते ।
यस्याश्रुमुखो रुदन् विपाकं प्रतिसेवते ॥८॥ )
अनुवाद—उस कामका करना ठीक नहीं, जिसे करके ( पीछे )
अनुताप करना पड़े, और जिसके फलको अश्रुमुख रोते
भोगना पड़े।
( वेणुवन ) सुमन ( माली )
६८-तञ्च कम्मं कतं साधु यं कत्वा नानुतप्पति ।
यस्स प्रतीतो सुमनो विपाकं पटिसेवति ॥६॥
( तच्च कर्म कृतं साधु यत् कृत्वा नानुत्तप्यते ।
यस्य प्रतीतः सुमना विपाकं प्रतिसेवते ॥९॥ )
अनुवाद—उसी कामका करना ठीक है, जिसे करके अनुताप करना
( = पछताना ) न पड़े, और जिसके फलको प्रसन्न मनसे
भोग करे ।
जेतवन उप्पलवण्णा ( थेरी )
६६-मधू'व मञ्ञति बालो याव पापं न पच्चति ।
यदा च पच्चती पापं अथ दुक्खं निगच्छति ॥१०॥