धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
१२. अत्तवग्गो (आत्म वर्ग)
१४।१८ ] बुद्धवग्गो [ ८९
( तान् तादृशान् पूजयतो निर्वृतान् अकुतोभयान् ।
न शक्यं पुण्यं संख्यातुं एवम्मात्रमपि केनचित् ॥ १८ ॥)
अनुवाद—पूजनीय बुद्धों, अथवा ( उनके ) अनुगामियों—जो संसार
को अतिक्रमणकर गये हैं, जो शोक भयको पारकर गये
हैं—की पूजाके, ( या ) उन ऐसे मुक्त और निर्भय (पुरुषों)
की पूजाके, पुण्यका परिमाण "इतना है"—यह नहीं कहा
जा सकता ।
१४-बुद्धवर्ग समाप्त
१५—सुखवग्गो
शाक्य नगर जाति कलहके उपशमनार्थ
१६७-सुसुखं वत ! जीवाम वेरिनेसु अवेरिनो ।
वेरिनेसु मनुस्सेसु विहराम अवेरिनो ॥ १॥
( सुसुखं बत ! जीवामो वैरिष्ववैरिणः ।
वरिषु मनुष्येषु विहरामोऽवैरिणः ॥१॥ )
१६८-सुसुखं वत ! जीवाम आतरेसु अनातुरा ।
आतरेसु मनुस्सेसु विहराम अनातुरा ॥२॥
( सुसुखं बत ! जीवाम आतुरेष्वनातुराः ।
आतुरेषु मनुष्येषु विहरामोऽनातुराः ॥२॥ )
१६६-सुसुखं वत ! जीवाम उस्सुकेसु अनुस्सुका ।
उस्सुकेसु मनुस्सेसु विहराम अनुस्सुका ॥३॥
( सुसुखं बत ! जीवाम उत्सुकेष्वनुत्सुकाः ।
उत्सुकेषु मनुष्येषु विहराम अनुत्सुकाः ॥३॥ )
९० ]
१५।५ ] सुखवग्गो [ ९१
अनुवाद—वैरियोंके प्रति ( भी ) अवैरी हो, अहो ! हम ( कैसा )
सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; वैरी मनुष्योंके बीच अवैरी
होकर हम विहार करते हैं। भयभीत मनुष्योंमें अभय हो,
अहो ! हम सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; भयभीत मनुष्यों
के बीच निर्भय होकर हम विहार करते हैं । उत्सुकौं
(=आसक्तों) में उत्सुकता-रहित हो० ।
पंचसाला ( ब्राह्मणग्राम, मगध ) मार -
२००-सुसुखं वत ! जीवाम येसं नो नत्थि किञ्चनं ।
पीतिमक्खा भविस्साम देवा आभस्सरा यथा ॥४॥
( सुसुखं वत ! जीवामो येषां नो नास्ति किंचन ।
प्रीतिभक्ष्या भविष्यामो देवा आभास्वरा यथा ॥४॥ )
अनुवाद—जिन हम ( लोगों ) के पास कुछ नहीं, अहो ! वह हम
कितना सुखसे जीवन बिता रहे हैं। हम आभास्वर देवताओं
की भाँति प्रीतिभक्ष्य (=प्रीति ही भोजन है जिनका ) हैं ।
जेतवन कोसलराज
२०१-जयं वेरं पसवति दुक्खं सेति पराजितो ।
उपसन्तो सुखं सेति हित्वा जयपराजयं ॥५॥
( जयो वैरं प्रसूते दुःखं शेते पराजितः ।
उपशान्तः सुखं शेते हित्वा जयपराजयौ ॥५॥ )
अनुवाद—विजय वैरको उत्पन्न करती है, पराजित ( पुरुष ) दुःखकी
( नींद ) सोता है; ( राग आदि दोष जिसके ) शान्त ( हैं,
१२ ] धम्मपदं [ १५/७
वह पुरुष ) जय ओर पराजयको छोड़ सुखकी (नींद)
सोता है।
जेतवन कोई कुलकन्या
२०२—नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि ।
नत्थि खन्धसमा दुक्खा नत्थि सन्तिपरं सुखं ॥६॥
( नास्ति रागसमोऽग्निः, नास्ति द्वेषसमः कलिः ।
नास्ति स्कन्धसमा दुःखाः, नास्ति शान्तिपरं सुखम् ॥६॥ )
अनुवाद—रागके समान अग्नि नहीं, द्वेषके समान मल नहीं, (पाँच)
स्कन्धो* के (=समुदाय) समान दुःख नहीं, शान्तिसे
बढ़कर सुख नहीं।
आलवी एक उपासक
२०३—जिघच्छा परमा रोगा, सङ्घारा परमा दुखा ।
एतं ञत्वा यथाभूतं निब्बाणं परमं सुखं ॥७॥
( जिघत्सा परमो रोगः, संस्काराः परमं दुःखम् ।
एतद् ज्ञात्वा यथाभूतं निर्वाणं परमं सुखम् ॥७॥ )
अनुवाद—भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुःख हैं,
- रूप, वेदना, सञ्ञा, सस्कार, विञ्ञान यह पाँच स्कन्ध हैं। वेदना, सञ्ञा,
सस्कार विञ्ञानके अन्दर हैं । पृथिवी, जल, अग्नि, वायु ही रूप स्कध
है। जिसमें न भारीपन है, और जो न जगह घेरता है, वह विञ्ञान स्कध
है। रूप (=Matter) और विञ्ञान (=Mind) इन्हींके मेळसे सारा
ससार बना है।
१५।१० ] सुखवग्गो [ ९३
यह जान, यथार्थ निर्वाणको सबसे बड़ा सुख (कहा
जाता है)।
जेतवन ( पसेनदि कोसलराज )
२०४-आरोग्यपरमा लाभा सन्तुट्ठी परमं धनं ।
विस्सासपरमा ञाती निब्बाणं परमं सुखं ॥८॥
( आरोग्यं परमो लाभः, सन्तुष्टिः परमं धनम् ।
विश्वासः परमा ज्ञातिः, निर्वाणं परमं सुखम् ॥८॥ )
अनुवाद—निरोग होना परम लाभ है, सन्तोष परम धन है, विश्वास
सबसे बड़ा बन्धु है, निर्वाण परम (=सबसे बड़ा) सुख है।
वैशाली तिस्स (थेर)
२०५-पविवेकरसं पीत्वा रसं उपसमस्स च ।
निद्दरो होति निष्पापो धम्मपीतिरसं पिवं ॥६॥
( प्रविवेकरसं पीत्वा रसं उपशमस्य च ।
निर्दरो भवति निष्पापो धर्म प्रीतिरसं पिवन् ॥९॥ )
अनुवाद—एकान्त (चिन्तन)के रस, तथा उपशम (=शान्ति)के
रसको पीकर (पुरुष), निडर होता है, (और) धर्मका
प्रेमरस पानकर निष्पाप होता है।
बेल्लुवग्राम (वेणुग्राम, वैशालीके पास) सक्क (देवराज)
२०६-साधु दस्सनमरियानं सन्निवासो सदा सुखो ।
अदस्सनेन बालानं निच्चमेव सुखी सिया ॥१०॥
९४ ] धम्मपदं [ १५।१२
( साधु दर्शनमार्याणां सन्निवासः सदा सुखः ।
अदर्शनेन बालानां नित्यमेव सुखी स्यात् ॥१०)
२०७-बालसंगतिचारी हि दीघमद्धानं सोचति ।
दुक्खो बालेहि संवासो अमित्तेनेव सब्बदा ।
धीरो च सुखसंवासो ञातीनं 'व समागमो ॥११॥
( बालसंगतिचारी हि दीर्घमध्वानं शोचति ।
दुःखो बालैः संवासोऽमित्रेणैव सर्वदा ।
धीरश्च सुखसंवासो ज्ञातीनामिव समागमः ॥११॥)
अनुवाद—आर्यों* (=सत्पुरुषों) का दर्शन सुन्दर है, सन्तोंके साथ
निवास सदा सुखदायक होता है; मूढ़ोंके न दर्शन होनेसे
(मनुष्य) सदा सुखी रहता है। मूढ़ोंकी संगतिमें रहने-
वाला दीर्घ काल तक शोक करता है, मूढ़ोंका सहवास
शत्रु की तरह सदा दुःखदायक होता है, बन्धुओंके समागम-
की भाँति धीरोंका सहवास सुखद होता है।
वेलुवगाम सक्क (देवराज)
२०८-तस्मा हि धीरं च पञ्ञञ्च बहुस्सुतं च
धोरय्हसीलं वतवन्तमरियं ।
तं तादिसं सप्पुरिसं सुमेधं
भजेथ नक्खत्तपथं 'व चन्दिमा ॥१२॥
*निर्वाणके पथपर अविचल रूपसे आरूढ़ स्रोतआपन्न, सकृदागामी,
अनागामी तथा निर्वाण-प्राप्त=अर्हत् इन चार प्रकारके पुरुषोंको आर्य कहते हैं।