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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

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स्व १ र्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः.. (१)
जो इन भूत, भविष्य तथा वर्तमान कालों को व्याप्त कर के स्थित है तथा जिस का
स्वरूप केवल प्रकाशमय है, उसी ज्येष्ठ ब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूं. (१)
स्कम्भेनेमे विष्टभिते द्यौश्च भूमिश्च तिष्ठतः.
स्कम्भ इदं सर्वमात्मन्वद् यत् प्राणन्निमिषच्च यत्.. (२)
परमात्मा के द्वारा धारण की हुई भूमि और स्वर्ग अपने स्थान पर स्थित हैं. जो सांस
लेते हैं और जो पलक झपकाते हैं, वे सब आत्मा के समान परमात्मा में व्याप्त हैं. (२)
तिस्रो ह प्रजा अत्यायमायन् न्य १ न्या अर्कमभितो ऽ विशन्त.
बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानो हरितो हरिणीरा विवेश.. (३)
तीन प्रकार की प्रजाएं अतिक्रमण करती हुई परमेश्वर को प्राप्त होती हैं. एक प्रकार की
अर्थात् सतोगुणी प्रजाएं सूर्य में प्रविष्ट होती हैं. दूसरे प्रकार की अर्थात् रजोगुणी प्रजाएं
रजौलोक को नापती हुई स्थित रहती हैं. तीसरी अर्थात् तमोगुणी प्रजाएं सब का हरण करती
हुई हरे रंग में अर्थात् अंधकार में प्रवेश करती हैं. (३)
द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत.
तत्राहतास्त्रीणि शतानि शङ्कवः षष्टिश्च खीला अविचाचला ये.. (४)
बारह अरे तथा तीन नेमियां एक पहिए से संबंधित हैं. बारह मास, बारह अरे तथा शीत,
ग्रीष्म, वर्षा, तीन ऋतुएं तीन नेमियां हैं. ये समय रूपी पहिए में स्थित हैं. इस बात को कौन
जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता. उस पहिए में तीन सौ साठ खूंटियां तथा इतनी ही कीलें
लगाई गई हैं जो स्थिर हैं. वर्ष के दिन और रात ही खूंटियां और कीलें हैं. (४)
इदं सवितर्वि जानीहि षड् यमा एक एकजः.
तस्मिन् हापित्वमिच्छन्ते य एषामेक एकजः.. (५)
हे सविता देव! तुम यह जानो कि ये एक से एक बने हुए छः जोड़े हैं. इन में जो एकएक
से बने जोड़े हैं, वे उस में समाहित होना चाहते हैं. तात्पर्य दो-दो मासों वाली छः ऋतुओं के
वर्ष अथवा काल में समाहित होने से है. (५)
आविः सन्निहितं गुहा जरन्नाम महत् पदम्.
तत्त्रेदं सर्वमार्पितमेजत् प्राणत् प्रतिष्ठितम्.. (६)
प्रकट होने वाला एवं संचार करने वाला महत्त्व पद गुफा में है. यह शरीर ही गुफा है
और आत्मा उस में संचार करने वाला महत्त्व पद है. वह महत्त्व पद अर्थात् आत्मा गतिशील
एवं सांस लेने वाला है तथा उसी में यह सारा विश्व समाहित और प्रतिष्ठित है. (६)
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एकचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा.
अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं क्व १ तद् बभूव.. (७)
बीच की नाभि वाला एक पहिया है. इस में आगेपीछे से हजार अरे लगे हुए हैं. यह
पहिया लगातार चल रहा है. इस के आधे भाग से संसार उत्पन्न हुआ है तथा इस का शेष भाग
कहां है? सूर्य ही एक नाभि वाला एक पहिया है. उस की हजार किरणें हजार अरे हैं. दिन
उस का आधा भाग है, जिस के कारण संसार गतिशील रहता है. शेष आधा भाग अर्थात् रात्रि
में वह सूर्य न जाने कहां चला जाता है? (७)
पञ्चवाही वहत्यग्रमेषां प्रष्टयो युक्ता अनुसंवहन्ति.
अयातमस्य ददृशे न यातं परं नेदीयो ऽ वरं दवीय:.. (८)
इन में जो आगे चलने वाला है, वह पंचवाही (पांच के द्वारा उठाया जाने वाला). इस में
जुड़े हुए घोड़े इसे ठीक से ले कर चलते हैं. इस का न आना दिखाई देता है और न जाना. यह
अत्यंत दूर और अत्यधिक समीप है. तात्पर्य यह है कि प्राण, अपान पांच वायुएं जीवन को
गतिशील रखती हैं. इंद्रियां ही शरीर को आगे बढ़ाने वाले घोड़े हैं. शरीर में आत्मा का आना
और जाना दृष्टिगोचर नहीं होता है. यह आत्मा अत्यंत समीप और अत्यधिक दूर है. (८)
तिर्यग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम्.
तदासत ऋषय: सप्त साकं ये अस्य गोपा महतो बभूवु:.. (९)
एक चमचा है, जिस का मुख नीचे की ओर है और जड़ अर्थात् पकड़ने वाला भाग
ऊपर की ओर है. उस में अनेक रूपों वाला यशस्वी छिपा हुआ है. वहां सात ऋषि एक साथ
बैठे हैं. वे ही अनेक रूपों वाले के रक्षक बनें. (९)
या पुरस्ताद् युज्यते या च पश्चाद् या विश्वतो युज्यते या च सर्वतः.
यया यज्ञः प्राङ् तायते तां त्वा पृच्छामि कतमा सर्चाम्.. (१०)
ऋचाओं के मध्य वह कौन सी ऋचा है जो आगे से और पीछे से जुड़ी हुई है. जो चारों
ओर से तथा सभी प्रकार जुड़ी हुई है. जिस की सहायता से पूर्व की ओर यज्ञ विस्तृत किया
गया, मैं तुम से उसी के विषय में पूछता हूं. (१०)
यदेजति पतति यच्च तिष्ठति प्राणदप्राणन्निमिषच्च यद् भुवत्.
तद् दाधार पृथिवीं विश्वरूपं तत् संभूय भवत्येकमेव.. (११)
जो कांपता है, गिरता है और स्थित रहता है; जो सांस लेता है, सांस नहीं लेता तथा सत्
है, उसी विश्व रूप ने पृथ्वी को धारण किया है. वह सब से मिल कर एक रूप हो जाता है.
(११)
अनन्तं विततं पुरुत्रा ऽ नन्तमन्तवच्चा समन्ते.
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ते नाकपालश्चरति विचिन्वन् विद्वान् भूतमृत भव्यमस्य.. (१२)
एक तत्त्व अंतहीन तथा चारों ओर विस्तृत है. दूसरा अंतहीन तथा अंत वाला है. ये दोनों
परस्पर मिले हुए हैं. स्वर्ग सुख का इच्छुक उन्हें खोजता फिरता है. वही सब जानता है तथा
भूत और भविष्य उसी के कर्म हैं. यहां पहला परमात्मा और दूसरा आत्मा है. (१२)
प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरदृश्यमानो बहुधा वि जायते.
अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः स केतुः.. (१३)
प्रजापति दिखाई न देता हुआ गर्भ में संचरण करता है तथा अनेक रूपों में जन्म लेता
है. उस के आधे भाग से सारा विश्व उत्पन्न हुआ है. उस का शेष भाग श्रद्धा है, वही उस की
पहचान है. (१३)
ऊर्ध्वं भरन्तमुदकं कुम्भेनेवोदहार्यम्.
पश्यन्ति सर्वे चक्षुषा न सर्वे मनसा विदुः.. (१४)
घड़े की सहायता से कुएं के जल को ऊपर निकालते हुए को सभी आंख से देखते हैं,
परंतु मन से नहीं जान पाते. (१४)
दूरे पूर्णेन वसति दूर ऊनेन हीयते.
महद् यक्षं भुवनस्य मध्ये तस्मै बलिं राष्ट्रभृतो भरन्ति.. (१५)
अपने को पूर्ण मानने वाले से वह बहुत दूर रहता है तथा अपने को हीन मानने वाले से
भी दूर भागता है. ऐसा महान देव अर्थात् परमात्मा संसार के मध्य व्याप्त है. राष्ट्र का
भरणपोषण करने वाला उस की सेवा करता है. (१५)
यतः सूर्य उदेत्यस्तं यत्र च गच्छति.
तदेव मन्ये ऽ हं ज्येष्ठं तदु नात्येति किं चन.. (१६)
सूर्य जहां से उदय होता है और जहां अस्त होता है, मैं उसी को सब से बड़ा मानता हूं.
कोई भी उस का अतिक्रमण नहीं करता अर्थात् कोई भी उस से महान नहीं है. (१६)
ये अर्वाङ् मध्य उत वा पुराणं वेदं विद्वांसमभितो वदन्ति.
आदित्यमेव ते परि वदन्ति सर्वे अग्नि द्वितीयं त्रिवृतं च हंसम्.. (१७)
जो पुराण, ज्ञानी एवं विद्वान् उस के पीछे, बीच में अथवा चारों ओर बताते हैं, वे सब
सूर्य की ही प्रशंसा करते हैं. वे अग्नि को दूसरा और हंस को तीसरा बताते हैं. (१७)
सहस्राह्ण्यं वियतावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पततः स्वर्गम्.
स देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा.. (१८)
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पाप का विनाश करने वाला यह हंस जब स्वर्ग की ओर गमन करता है तो इस के दोनों
पंख हजार दिनों तक फैले रहते हैं. यह सभी देवों को अपनी छाती पर बैठा कर सारे संसार
को देखता हुआ जाता है. (१८)
सत्येनोर्ध्वस्तपति ब्रह्मणा ऽ र्वाङ् वि पश्यति.
प्राणेन तिर्यङ् प्राणति यस्मिन्ज्येष्ठमधि श्रितम्.. (१९)
वह सत्य की सहायता से ऊपर तपता है तथा वेद मंत्रों के द्वारा नीचे की ओर देखता है.
वह प्राण वायु में तिरछी सांस लेता है, उसी में वह सब से महान परमात्मा स्थित है. (१९)
यो वै ते विद्यादरणी याभ्यां निर्मथ्यते वसु.
स विद्वान्ज्येष्ठं मन्येत स विद्याद् ब्राह्मणं महत्.. (२०)
जो उन दोनों अणियों को जानता है, जिस के द्वारा धन का मंथन किया जाता है, वही
विद्वान् परमात्मा को सब से महान मानता है और वही महान वेद मंत्रों को जानता है. (२०)
अपादग्रे समभवत् सो अग्रे स्व १ राभरत्.
चतुष्पाद् भूत्वा भोग्यः सर्वमादत्त भोजनम्.. (२१)
सब से पहले चरणहीन आत्मा उत्पन्न हुआ. उस ने आगे चल कर आनंद को अपने में
पूर्ण किया. उस ने चार चरणों वाला अर्थात् अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चतुर्वर्ग बन कर समस्त
भोजन को स्वीकार किया अर्थात् सारे भोग भोगे. (२१)
भोग्यो भवदथो अन्नमदद् बहु. यो देवमुत्तरावन्तमुपासातै सनातनम्..
(२२)
पहले भोग्य अर्थात् भोजन करने वाला उत्पन्न हुआ. इस के पश्चात उस ने बहुत सा अन्न
खाया. वही सनातन एवं श्रेष्ठ देव की उपासना करता है. वही भोग्य हुआ और अधिक मात्रा
में अन्न खाने लगा, जो सनातन एवं सर्वश्रेष्ठ देव परमात्मा की उपासना करता है. (२२)
सनातनमेनमाहुरुताद्य स्यात् पुनर्भवः.
अहोरात्रे प्र जायेते अन्यो अन्यस्य रूपयोः.. (२३)
इस सूर्य को सनातन कहा गया है. वह आज भी पुनः नवीन है. उसी परमात्मा से दिन
और रात उत्पन्न होते हैं जो एकदूसरे से भिन्न रूप वाले हैं. (२३)
शतं सहस्रमयुतं न्यर्बुदमसंख्येयं स्वमस्मिन् निविष्टम्.
तदस्य घ्न्त्यभिपश्यत एव तस्माद् देवो रोचत एष एतत्.. (२४)
सौ, एक हजार, दस हजार, एक अरब एवं अनगिनती दिवस इसी सूर्य में व्याप्त हैं. वे
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दिवस इस के देखतेदेखते ही आघात करते हैं. इसी कारण यह देव अर्थात् सूर्य इस विश्व को
प्रकाशित करता है. (२४)
बालादेकमणीयस्कमुतैकं नेव दृश्यते.
ततः परिष्वजीयसी देवता सा मम प्रिया.. (२५)
आत्मतत्त्व एक है. यह बाल से भी सूक्ष्म होने के कारण दिखाई नहीं देता. इस आत्मा
का आलिंगन करने वाला देवता अर्थात् परमात्मा मुझे प्रिय है. (२५)
इयं कल्याण्य १ जरा मर्त्यस्यामृता गृहे.
यस्मै कृता शये स यश्चकार जजार सः.. (२६)
यह कल्याणी आत्मा वृद्धावस्था से रहित है तथा मरणशील शरीर रूपी घर में रह कर
भी अमर है. जिस आत्मा के लिए शरीर का निर्माण हुआ है, वह इस में शयन करती है. वह
शरीर ही वृद्ध होता है. (२६)
त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी.
त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः.. (२७)
हे आत्मा! तू स्त्री है, तू ही पुरुष है. तू ही कुमार है और तू ही कुमारी है. वृद्ध होने पर तू
ही डंडे के सहारे चलता है तथा तू ही उत्पन्न होने पर सभी ओर मुख वाला बनता है. (२७)
उतैषां पितोत वा पुत्र एषामुतैषां ज्येष्ठ उत वा कनिष्ठः.
एको ह देवो मनसि प्रविष्टः प्रथमो जातः स उ गर्भे अन्तः.. (२८)
इन समस्त जीवों में पिता और पुत्र के रूप में एवं बड़े और छोटे के रूप में एक ही देव
है जो मन में प्रविष्ट है. वह सब से पहले उत्पन्न हुआ था. वही गर्भ में स्थित होता है. (२८)
पूर्णात् पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते.
उतो तदद्य विद्याम यतस्तत् परिषिच्यते.. (२९)
पूर्ण अर्थात् परमात्मा से ही पूर्ण अर्थात समस्त विश्व अलग होता है अर्थात् जन्म लेता
है. उसी पूर्ण के द्वारा यह विश्व सिंचित होता है अर्थात् पालन किया जाता है. आज हम उस
तत्त्व को जानें, जहां से वह सींचा जाता है अर्थात् जो इस विश्व का पालन करता है. (२९)
एषा सनत्नी सनमेव जातैषा पुराणी परि सर्वं बभूव.
मही देव्यु १ षसो विभाती सैकैनेकेन मिषता वि चष्टे.. (३०)
यह सनातन शक्ति वाला आकर्षण सनातन परमात्मा के साथ ही उत्पन्न हुआ है. वही
पुराण शक्ति सब कुछ बन गई है. वही महती, दिव्य शक्ति उषाओं को प्रकाशित करती है तथा
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वह प्रत्येक प्राणी के साथ अलगअलग दिखाई देती है. (३०)
अविर्वे नाम देवतर्तेनास्ते परीवृता.
तस्या रूपेणेमे वृक्षा हरिता हरितस्रजः.. (३१)
वही रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति है और सत्य से घिरी हुई है. उसी के रूप से वे सारे
वृक्ष हरेभरे हैं और हरे पत्तों से ढके रहते हैं. (३१)
अन्ति सन्तं न जहात्यन्ति सन्तं न पश्यति.
देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति.. (३२)
समीप से आए हुए को वह छोड़ता नहीं है तथा समीप होने पर भी वह दिखाई नहीं देता
है. उस देव अर्थात् परमात्मा का काव्य देखो जो कभी न मरता है और न वृद्ध होता है. (३२)
अपूर्वेणेषिता वाचस्ता वदन्ति यथायथम्.
वदन्तीर्यत्र गच्छन्ति तदाहुर्ब्राह्मणं महत्.. (३३)
वह परमात्मा अपूर्व है अर्थात् उस से पहले कोई नहीं था. उस ने ही इन वाणियों को
प्रेरित किया है जो वास्तविकता का वर्णन करती हैं. वर्णन करती हुई वाणियां जहां पहुंचती
हैं, उसी को महान ब्राह्मण अर्थात वेद मंत्रों का समूह कहा गया है. (३३)
यत्र देवाश्च मनुष्याश्चारा नाभाविव श्रिताः.
अपां त्वा पुष्पं पृच्छामि यत्र तन्मायया हितम्.. (३४)
मैं जल के उस कमल के विषय में पूछता हूं, जिस में सभी मनुष्य और देव इस प्रकार
आश्रित हैं, जिस प्रकार कमल में उस की पंखुड़ियां रहती हैं. माया से ढका हुआ वह कहां
रहता है? (३४)
येभिर्वात इषितः प्रवाति ये ददन्ते पञ्च दिशः सध्रीचीः.
य आहुतिमत्यमन्यन्त देवा अपां नेतारः कतमे त आसन्.. (३५)
जिन देवों से प्रेरित हो कर वायु चलती है तथा जो पांच परस्पर मिली हुई दिशाओं
अर्थात् पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊपर को प्रदान करता है. जो देव आहुति को
अत्यधिक महान मानते हैं, जलों के नेता वे देव कौन हैं. (३५)
इमामेषां पृथिवीं वस्त एको ऽ न्तरिक्षं पर्येको बभूव.
दिवमेषां ददते यो विधर्ता विश्वा आशाः प्रति रक्षन्त्येके.. (३६)
इन में से एक इस पृथ्वी पर निवास करता है तथा अंतरिक्ष में व्याप्त रहता है, जो धारण
करता है एवं इन जीवों को स्वर्ग प्रदान करता है. कुछ अर्थात् शेष देव ऐसे हैं जो सभी
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दिशाओं की रक्षा करते हैं. (३६)
यो विद्यात् सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः.
सूत्रं सूत्रस्य यो विद्यात् स विद्याद् ब्राह्मणं महत्.. (३७)
जिस में सारी प्रजाएं पिरोई हुई हैं तथा जो इस फैले हुए सूत्र अर्थात् धागे को जानता है.
संसार रूपी विस्तृत सूत्र के कारण बने हुए सूत्र अर्थात् परमात्मा को जो जानता है, वही
महान ब्रह्म को जानता है अथवा वही विशाल वेद मंत्रों का ज्ञाता है. (३७)
वेदाइं सूत्रं विततं यस्मिन्नोताः प्रजा इमाः.
सूत्रं सूत्रस्याहं वेदाथो यद् ब्राह्मणं महत्.. (३८)
मैं उस विस्तृत धागे अर्थात् परमात्मा को जानता हूं, जिस में ये सारी प्रजाएं पिरोई हुई
हैं. मैं इस संसार रूपी विस्तृत सूत्र के मूल कारण को जानता हूं, जो महान ब्रह्म अथवा
विशाल वेद मंत्रों का समूह हैं. (३८)
यदन्तरा द्यावापृथिवी अग्निरैत् प्रदहन् विश्वादाव्यः.
यत्रातिष्ठन्नेकपत्नीः परस्तात् क्वे वासीन्मातरिश्वा तदानीम्.. (३९)
इस संसार को जलाने वाली अग्नि द्यावा और पृथ्वी के मध्य आती है. वहीं पोषण करने
वाली देवियां निवास करती हैं. उस समय मातरिश्वा अर्थात् वायु कहां रहती है? (३९)
अप्सवा सीन्मातरिश्वा प्रविष्टः प्रविष्टा देवाः सलिलान्यासन्.
बृहन् ह तस्थौ रजसो विमानः पवमानो हरित आ विवेश.. (४०)
उस समय वायु जलों में प्रविष्ट थी तथा देवगण भी जलों में ही प्रवेश किए हुए थे. पृथ्वी
का निर्माण करने वाला महान ब्रह्म उस समय कहां स्थित था? उस समय वायु ने दिशाओं में
प्रवेश किया. (४०)
उत्तरेणेव गायत्रीममृते ऽ धि वि चक्रमे.
साम्ना ये साम संविदुरजस्तद् ददृशे क्व.. (४१)
जो साम मंत्रों के द्वारा परमात्मा को जानने वाले हैं, उन्होंने अंत में गायत्री रूप अमृत में
प्रवेश किया. वह अजन्मा कहां दिखाई दिया था अर्थात् कहीं नहीं. (४१)
निवेशनः संगमनो वसूनां देव इव सविता सत्यधर्मा.
इन्द्रो न तस्थौ समरे धनानाम्.. (४२)
सत्य धर्म वाले सविता उसी दिव्य परमात्मा के समान हैं. वे ही समस्त धनों के संगम हैं
अर्थात् पुण्यात्मा जन उन्हीं में प्रवेश करते हैं. धनों के समूह में अर्थात् पुण्यात्माओं में इंद्र
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प्रवेश नहीं करते. (४२)
पुण्डरीकं नवद्वारं त्रिभिर्गुणेभिरावृतम्.
तस्मिन् यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः.. (४३)
नौ द्वारों वाला कमल तीनों अर्थात् रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण से घिरा हुआ है.
उस में जो आत्मा वाला दिव्य दल है, उसे ब्रह्मज्ञानी जानते हैं. (४३)
अकामो धीरो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः.
तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम्.. (४४)
वह परमात्मा कामना रहित, धीर, मरण रहित, स्वयं उत्पन्न होने वाला तथा रस से तृप्त
है. वह कहीं से भी कम नहीं है अर्थात् सर्वथा पूर्ण है. उसी धीर, जरा अर्थात् वृद्धावस्था से
रहित तथा युवा आत्मा को जानने वाला मृत्यु से नहीं डरता. (४४)
सूक्त-९ देवता—शतौदना गौ
अघायतामपि नह्या मुखानि सपत्नेषु वज्रमर्पयैतम्.
इन्द्रेण दत्ता प्रथमा शतौदना भ्रातृव्यघ्नी यजमानस्य गातुः.. (१)
यह धेनु पापियों के मुखों को बंद करे और शत्रुओं पर इस वज्र को गिराए. इंद्र के द्वारा
दी हुई यह सब से पहली शतौदना गाय शत्रु विनाशिनी एवं यजमान का मार्गदर्शन करने वाली
है. (१)
वेदिष्टे चर्म भवतु बर्हिर्लोमानि यानि ते.
एषा त्वा रशनाग्रभीद् ग्रावा त्वैषो ऽ धि नृत्यतु.. (२)
हे शतौदना गौ! तेरे रोम कुशों के रूप में हैं और यज्ञ वेदी तेरा चर्म है. यह रस्सी तुझे
बांध रही है. यह पत्थर तेरे ऊपर नृत्य करे. (२)
बालास्ते प्रोक्षणीः सन्तु जिह्वा सं मार्ष्ट्वर्घ्ये.
शुद्धा त्वं यज्ञिया भूत्वा दिवं प्रेहि शतौदने.. (३)
हे हिंसा के अयोग्य गौ! तेरे बाल यज्ञ का प्रोक्षणी नामक पात्र बनें तथा तेरी जीभ यज्ञ
वेदी का मार्जन करे अर्थात् सफाई करे. हे शतौदना गौ! तू इस प्रकार शुद्ध और यज्ञ के योग्य
बन कर स्वर्ग को गमन कर. (३)
यः शतौदनां पचति कामप्रेण स कल्पते.
प्रीता ह्यस्यार्त्विजः सर्वे यन्ति यथायथम्.. (४)
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जो शतौदना गौ का पालन करता है, वह अपनी कामनाएं पूर्ण करता है. उस के संतुष्ट
हुए सभी ऋत्विज् जहां से आते हैं, वहीं चले जाते हैं. (४)
स स्वर्गमा रोहति यत्रादस्त्रिदिवं दिवः.
अपूपनाभिं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्... (५)
वह उस स्वर्ग में पहुंचता है जो अंतरिक्ष में स्थित है तथा जो पुए बना कर शतौदना गौ
को देता है. (५)
स तांल्लोकान्त्समाप्नोति ये दिव्या ये च पार्थिवाः.
हिरण्यज्योतिषं कृत्वा यो ददाति शतौदनाम्.. (६)
जो स्वर्ण से अलंकृत कर के शतौदना गौ का दान करता है, वह उन लोकों को प्राप्त
करता है, जो दिव्य एवं पार्थिव अर्थात् पृथ्वी से संबंधित हैं. (६)
ये ते देवि शमितारः पक्तारो ये च ते जनाः.
ते त्वा सर्वे गोप्स्यन्ति मैभ्यो भैषीः शतौदने.. (७)
हे शतौदना गौ! तेरी शांति करने वाले एवं तेरे पालन कर्ता तेरे रक्षक होंगे. तू उन से
भयभीत मत हो. (७)
वसवस्त्वा दक्षिणत उत्तरान्मरुतस्त्वा.
आदित्याः पश्चाद् गोप्स्यन्ति साग्निष्टोममति द्रव.. (८)
हे शतौदना गौ! आठ वसु, दक्षिण की ओर, उनचास मरुत् उत्तर की ओर तथा आदित्य
पीछे से तेरी रक्षा करेंगे. तू अग्निष्टोम यज्ञ के पार जा. (८)
देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये.
ते त्वा सर्वे गोप्स्यन्ति सातिरात्रमति द्रव.. (९)
हे शतौदना गौ! देव, पितर, मनुष्य, गंधर्व, और अप्सराएं—ये सभी तेरी रक्षा करेंगे. तू
अतिशय नामक यज्ञ कर्म के पार जा. (९)
अन्तरिक्षं दिवं भूमिमादित्यान् मरुतो दिशः.
लोकान्त्स सर्वान्नाप्नोति यो ददाति शतौदनाम्.. (१०)
जो शतौदना गौ का दान करता है, वह अंतरिक्ष को, स्वर्ग को, भूमि को, आदित्यों को,
मरुतों को, दिशाओं को तथा सभी लोकों को प्राप्त करता है. (१०)
घृतं प्रोक्षन्ती सुभगा देवी देवान् गमिष्यति.
पक्तारमघ्न्ये मा हिंसीर्दिवं प्रेहि शतौदने.. (११)
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घी टपकाती हुई, सौभाग्यशालिनी एवं दिव्य गुणयुक्त शतौदना गौ देवों के समीप
जाएगी. हे हिंसा के अयोग्य शतौदना गौ! तू अपने पालने वाले की हिंसा मत कर और स्वर्ग
को जा. (११)
ये देवा दिविषदो अन्तरिक्षसदश्च ये ये चेमे भूम्यामधि.
तेभ्यस्त्वं धुक्ष्व सर्वदा क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१२)
हे शतौदना गौ! जो देव स्वर्ग में स्थित हैं, जो अंतरिक्ष में हैं एवं जो पृथ्वी पर निवास
करते हैं, तू उन के लिए सदा मीठा दूध, दही और घी प्रदान कर. (१२)
यत् ते शिरो यत् ते मुखं यौ कर्णौ ये च ते हनू.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१३)
हे शतौदना गौ! तेरा जो शीश, तेरा जो मुख, तेरे जो दो कान एवं तेरी ठोड़ी है—ये सब
अंग तेरे दानदाता को दही, मधुर दूध एवं घी देते रहें. (१३)
यौ त ओष्ठौ ये नासिके ये शृङ्गे ये च ते ऽ क्षिणी.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१४)
हे शतौदना गौ! तेरे जो दोनों होंठ, तेरी नाक, तेरे जो दोनों सींग तथा जो दोनों आंखें हैं,
वे तेरे दानदाता को सदा दही, मधुर दूध एवं घी देते रहें. (१४)
यत् ते क्लोमा यद् हृदयं पुरीतत् सहकण्ठिका.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१५)
हे शतौदना गौ! तेरा क्लोम, हृदय, मलाशय और गला तेरे दानदाता को सदा दही, मधुर
दूध और घी देते रहें. (१५)
यत् ते यकृद् ये मतस्ने यदान्त्रं याश्च ते गुदाः.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१६)
हे शतौदना गौ! तेरा जिगर, तेरी आंतें तथा तेरी गुदा तेरे दानदाता को सदा दही, मीठा
दूध और घी देते रहें. (१६)
यस्ते प्लाशिर्यो वनिष्ठुर्यौ कुक्षी यच्च चर्म ते.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१७)
हे शतौदना गौ! तेरी जो तिल्ली, गुदा, दोनों आंखें और तेरा चमड़ा है, ये सब तेरे
दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१७)
यत् ते मज्जा यदस्थि यन्मांसं यच्च लोहितम्.
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आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१८)
हे शतौदना गौ! तेरी चरबी, तेरी हड्डियां, मांस और रक्त तेरे दानदाता को सदा दही,
मीठा दूध और घी देते रहें. (१८)
यौ ते बाहू ये दोषण्ी यावंसौ या च ते ककुत्.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (१९)
हे शतौदना गौ! तेरी दोनों भुजाएं, दोनों पिंडलियां, दोनों कंधे और ठाट तेरे दानदाता
को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (१९)
यास्ते ग्रीवा ये स्कन्धा या: पृष्टीर्याश्च पर्शव:.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२०)
हे शतौदना गौ! तेरी जो गरदन, तेरे जो कंधे, जो पीठ और जो पसलियां हैं, वे तेरे
दानदाता को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२०)
यौ त ऊरू अष्ठीवन्तौ ये श्रोणी या च ते भसत्.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२१)
हे शतौदना गौ! तेरे पैर, तेरे घुटने, तेरे कूल्हे और प्रजनन अंग सदा तेरे दानदाता को
दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२१)
यत् ते पुच्छं ये ते बाला यदूधो ये च ते स्तना:.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२२)
हे शतौदना गौ! तेरी जो पूंछ, तेरे जो बाल, तेरा जो ऐन एवं जो थन हैं, वे तेरे दानदाता
को सदा दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२२)
यास्ते जङ्घा या: कुष्ठिका ऋच्छरा ये च ते शफा:.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२३)
हे शतौदना गौ! तेरी जो जंघाएं, जो घुटने, कूल्हे और खुर हैं, वे सदा तेरे दानदाता को
दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२३)
यत् ते चर्म शतौदने यानि लोमान्यघ्न्ये.
आमिक्षां दुहतां दात्रे क्षीरं सर्पिरथो मधु.. (२४)
हे शतौदना गौ! तेरा जो चमड़ा है, हे हिंसा के अयोग्य! तेरे जो बाल हैं, वे सदा तेरे
दानदाता को दही, मीठा दूध और घी देते रहें. (२४)
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क्रोडौ ते स्तां पुरोडाशावाज्येनाभिघारितौ.
तौ पक्षौ देवि कृत्वा सा पक्तारं दिवं वह.. (२५)
हे शतौदना गौ! तेरे पिछले दोनों भाग घी से सिंचित हैं एवं पुरोडाश हैं. हे देवी! उन्हें
पंख बना कर तू पालनकर्ता को स्वर्ग में ले जा. (२५)
उलूखले मुसले यश्च चर्मणि यो वा शूर्पे तण्डुलः कणः.
यं वा वातो मातरिश्वा पवमानो ममाथाग्निष्टद्धोता सुहुतं कृणोतु.. (२६)
जो ओखली और मूसल हैं, जो चमड़े, जो सूप, चावल और चावलों के टूटे हुए भाग हैं
तथा जिन को पवित्र करने वाली वायु ने मथा है, उन्हें होता अग्नि की उत्तम आहुति बनाएं.
(२६)
अपो देवीर्मधुमतीर्घृतश्रुतो ब्रह्मणां हस्तेषु प्रपृथक् सादयामि.
यत्काम इदमभिषिञ्चामि वो ऽ हं तन्मे सर्वं सं पद्यतां वयं स्याम पतयो
रयीणाम्.. (२७)
मधु से युक्त एवं घी टपकाने वाले जल हम ब्राह्मणों के हाथों में अलग-अलग डालते हैं.
जिस कामना से हम ब्राह्मणों के हाथों को धुलाते हैं, हमारी वह कामना पूर्ण हो तथा हम धनों
के स्वामी बनें. (२७)
सूक्त-१० देवता—वशा गौ
नमस्ते जायमानायै जाताया उत ते नमः.
बालेभ्यः शफेभ्यो रूपाया ऽ घ्न्ये ते नमः.. (१)
हे हिंसा न करने योग्य गौ! तुझ जन्म लेती हुई को एवं उत्पन्न होती हुई को नमस्कार है.
तेरे बालों के लिए, खुरों के लिए तथा रूप के लिए नमस्कार है. (१)
यो विद्यात् सप्त प्रवतः सप्त विद्यात् परावतः.
शिरो यज्ञस्य यो विद्यात् स वशां प्रति गृह्णीयात्.. (२)
जो वशा गौ के समीप रहने वाली सात वस्तुओं और दूर रहने वाली सात वस्तुओं को
जानता हो तथा यज्ञ का शीश जानता हो, वही वशा गौ का दान स्वीकार करे. (२)
वेद़ाहं सप्त प्रवतः सप्त वेद परावतः.
शिरो यज्ञस्याहं वेद सोमं चास्यां विचक्षणम्.. (३)
मैं वशा गौ के समीप रहने वाली सात वस्तुओं और दूर रहने वाली सात वस्तुओं को
जानता हूं. मैं यज्ञ के शीश को जानता हूं तथा वशा गौ में होने वाले प्रकाशशील सोम को भी
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जानता हूं. (३)
यया द्यौर्यया पृथिवी ययापो गुपिता इमाः.
वशां सहस्रधारां ब्रह्मणाच्छावदामसि.. (४)
जिस के द्वारा द्यौ, जिस के द्वारा पृथ्वी तथा जिस के द्वारा ये जल सुरक्षित हैं, दूध की
हजार धाराएं बहाने वाली वशा की हम वेद मंत्रों द्वारा प्रशंसा करते हैं (४)
शतं कंसाः शतं दोग्धारः शतं गोप्तारो अधि पृष्ठे अस्याः.
ये देवास्तस्यां प्राणन्ति ते वशां विदुरेकधा.. (५)
इस वशा गौ की पीठ पर दुग्ध पात्र लिए हुए सौ दूध काढ़ने वाले एवं सौ रक्षक हैं. जो
देव इस गौ के कारण सांस लेते हैं अर्थात् जीवित हैं, एकमात्र वे ही इस गौ को जानते हैं. (५)
यज्ञपदीराक्षीरा स्वधाप्राणा महीलुका. वशा पर्जन्यपत्नी देवां अप्येति
ब्रह्मणा.. (६)
जिस वशा गौ को यज्ञ में स्थान प्राप्त है, जो अत्यधिक दूध देती है, स्वधा जिस के प्राण
हैं तथा जो धरती पर परम प्रसिद्ध है, उस का वर्षा के कारण उत्पन्न घास से पालनपोषण
होता है, वह वशा गौ यज्ञ के द्वारा देवों को तृप्त करती है. (६)
अनु त्वाग्निः प्राविशदनु सोमो वशे त्वा.
ऊधस्ते भद्रे पर्जन्यो विद्युतस्ते स्तना वशे.. (७)
हे वशा गौ! अग्नि ने तुझ में प्रवेश किया था तथा सोम भी तुझ में प्रविष्ट हुआ था.
पर्जन्य अर्थात् बादल ने तेरे एन में और बिजली ने तेरे थनों में निवास किया था. (७)
अपस्त्वं धुक्षे प्रथमा उर्वरा अपरा वशे. तृतीयं राष्ट्रं धुक्षे ऽ नं क्षीरं वशे
त्वम्.. (८)
हे वशा गौ! सब से पहले तू जलों को दोहन के रूप में प्रदान करती है. इस के पश्चात
भूमि को उपजाऊ बना कर हमें अन्न देती है. तीसरे तू राष्ट्र को शक्तिरूपी क्षीर प्रदान करती
है. (८)
यदादित्यैर्हूयमानोपातिष्ठ ऋतावरि. इन्द्रः सहस्रं पात्रान्तसोमं त्वापाययद्
वशे.. (९)
हे ऋतावरी अर्थात् दूध देने वाली गौ! तू आदित्यों द्वारा बुलाए जाने पर समीप आई थी.
हे वशा गौ! तब इंद्र ने हजारों पात्र ले कर तुझे सोमरस पिलाया था. (९)
यदनूचीन्द्रमैरात् त्व ऋषभो ऽ ह्वयत्.
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तस्मात् ते वृत्रहा पयः क्षीरं क्रुद्धो हरद् वशे.. (१०)
हे वशा गौ! जब तू अनुकूल बन कर इंद्र के समीप जाती है, तब बैल तुझे समीप से
बुलाता है. इस कारण इंद्र क्रोधित हो कर तेरे मधुर दूध को दुहता है. (१०)
यत् ते क्रुद्धो धनपतिरा क्षीरपहरद् वशे. इदं तदद्य नाकस्त्रिषु पात्रेषु
रक्षति.. (११)
हे वशा गौ! जब क्रोध में भरा हुआ धनपति अर्थात् कुबेर तेरा दूध लेता है, तो उसे स्वर्ग
तीन पात्रों में सुरक्षित रखता है. (११)
त्रिषु पात्रेषु तं सोममा देव्य हरद् वशा.
अथर्वा यत्र दीक्षितो बर्हिष्यास्त हिरण्यये.. (१२)
जहां दीक्षा धारण करने वाला अथर्ववेदी यजमान स्वर्णमय कुशों के आसन पर बैठा
था, वहां दिव्य गुणों वाली वशा गौ ने तीन पात्रों में सोमरस को भर दिया. (१२)
सं हि सोमेनागत समु सर्वेण पद्धता.
वशा समुद्रमध्यष्ठाद् गन्धर्वैः कलिभिः सह.. (१३)
वह वशा गौ चरणों वाले सभी मनुष्यों के साथ सोमरस ले कर आई. वह गौ कलह करने
वाले गंधर्वों के साथ सागर में प्रतिष्ठा पाती रही. (१३)
सं हि वातेनागत समु सर्वैः पतत्रिभिः.
वशा समुद्रे प्रानृत्यदृचः सामानि बिभ्रती.. (१४)
ऋचाओं और सामवेद के मंत्रों को धारण करती हुई वशा गौ सभी पक्षियों के साथ वायु
के पास गई और सागर पर नृत्य करने लगी. (१४)
सं हि सूर्येणागत समु सर्वेण चक्षुषा.
वशा समुद्रमत्यख्यद् भद्रा ज्योतींषि बिभ्रती.. (१५)
सभी नेत्रों के साथ वशा गौ सूर्य से मिली. कल्याणकारिणी उस गौ ने प्रकाश को धारण
करते हुए सागर से भी अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की. (१५)
अभीवृता हिरण्येन यदतिष्ठ ऋतावरि.
अश्वः समुद्रो भूत्वा ऽ ध्यस्कन्दद् वशे त्वा.. (१६)
हे ऋतावरी अर्थात् अधिक मात्रा में दूध देने वाली गौ! तू जब सोने के आभूषणों से
ढकी हुई खड़ी थी, तो हे वशा गौ! सागर घोड़ा बन कर अर्थात् घोड़े के समान तेज चाल से
तेरे समीप आ गया था. (१६)
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तद् भद्राः समगच्छन्त वशा देष्ट्र्यथो स्वधा.
अथर्वा यत्र दीक्षितो बर्हिष्यास्त हिरण्यये.. (१७)
यज्ञ में दीक्षित अथर्ववेद के मंत्रों का ज्ञाता ब्राह्मण जहां स्वर्णमय कुशों के आसन पर
बैठता है, वहां भद्र पुरुष अथवा कल्याणकारी तत्त्व एकत्र होते हैं, वहां वशा गौ अन्न देने
वाली एवं यज्ञ के साधन के रूप में उपस्थित होती है. (१७)
वशा माता राजन्यस्य वशा माता स्वधे तव.
वशाया यज्ञ आयुधं ततश्चित्तमजायत.. (१८)
हे वशा गौ! तू क्षत्रिय की माता है. हे स्वधा अर्थात् अन्न! वशा गौ तेरी माता है. यज्ञ वशा
गौ का आयुध है. वशा गौ में ही चित्त अर्थात् बुद्धि उत्पन्न हुई है. (१८)
ऊर्ध्वो बिन्दुरुदचरद् ब्रह्मणः ककुदादधि.
ततस्त्वं जज्ञिषे वशे ततो होताजायत.. (१९)
ब्रह्म के ककुद अर्थात् ऊपर वाले भाग से एक बूंद उछली. हे वशा गौ! तू उसी बूंद से
उत्पन्न हुई है तथा उसी बूंद से हवन करने वाले होता उत्पन्न हुए हैं. (१९)
आस्नस्ते गाथा अभवन्नुष्णिहाभ्यो बलं वशे.
पाजस्याज्जज्ञे यज्ञ स्तनेभ्यो रश्मयस्तव.. (२०)
हे वशा गौ! तेरे मुख से गाथाएं उत्पन्न हुईं तथा तेरी गरदन से बल की उत्पत्ति हुई. तेरे
ऐन से यज्ञ उत्पन्न हुआ तथा तेरे थनों से किरणें उत्पन्न हुईं. (२०)
ईर्माभ्यामयनं जातं सक्थिभ्यां च वशे तव.
आन्त्रेभ्यो जज्ञिरे अत्रा उदरादधि वीरुधः.. (२१)
हे वशा गौ! तेरे बाहुओं अर्थात् अगली टांगों और पिछले पैरों से तेरा चलना होता है.
तेरी आंतों से अनेक पदार्थ उत्पन्न हुए तथा तेरे पेट से वृक्ष उत्पन्न हुए. (२१)
यदुदरं वरुणस्यानुप्राविशथा वशे.
ततस्त्वा ब्रह्मोदह्वयत् स हि नेत्रमवेत् तव.. (२२)
हे वशा गौ! वरुण के उदर में तेरा प्रवेश हुआ. इस के पश्चात ब्रह्म ने तेरा आह्वान किया.
वही तेरा नेत्र जानता है. (२२)
सर्वे गर्भादवेपन्त जायमानादसूस्र्वः.
ससूव हि तामाहुर्वशेति ब्रह्माभिः क्लृप्तः स ह्यस्या बन्धुः.. (२३)
प्राणहीन उत्पन्न होने वाले गर्भ से सभी कांपने लगे. उस ने कहा कि हे वशा! तू बच्चे
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को जन्म दे. ब्राह्मणों ने उसी को वशा का बंधु निश्चित किया. (२३)
युध एकः सं सृजति यो अस्या एक इद् वशी.
तरांसि यज्ञा अभवन् तरसां चक्षुरभवद् वशा.. (२४)
एक योद्धा इस के समीप आता है, जो एक मात्र एक गौ को वश में करने वाला है. यज्ञ
ही पार करने वाले बने. वशा गौ ही पार करने वालों की आंख बनी. अर्थात् वशा गौ के पीछे
चल कर ही सब ने दुःख को पार किया. (२४)
वशा यज्ञं प्रत्यगृह्णाद् वशा सूर्यमधारयत्.
वशायामन्तरविशदोदनो ब्रह्मणा सह.. (२५)
वशा गौ ने यज्ञ को स्वीकार किया तथा सूर्य को धारण किया. ब्रह्म अर्थात् ज्ञान के साथ
ओदन अर्थात् भात वशा गौ में प्रविष्ट हुआ. (२५)
वशामेवामृतमाहुर्वशां मृत्युमुपासते.
वशेदं सर्वमभवद्देवा मनुष्या ३ असुराः पितर ऋषयः.. (२६)
वशा गौ को ही अमृत कहा गया है. मृत्यु समझ कर भी वशा गौ की उपासना की जाती
है. वशा ही यह सब हुई जैसे—देव, मनुष्य, असुर, पितर और ऋषि. (२६)
य एवं विद्यात् स वशां प्रति गृह्णीयात्.
तथा हि यज्ञः सर्वपाद् दुहे दात्रे ऽ नपस्फुरन्.. (२७)
जो इस बात को जानता है, वही वशा गौ का दान स्वीकार करेगा. यश सभी चरणों से
गति करता हुआ अर्थात् स्थिर हो कर वशा गौ का दान देने वाले को सभी पुण्य फल प्रदान
करता है. (२७)
तिस्रो जिह्वा वरुणस्यान्तर्दीद्यत्यासनि.
तासां या मध्ये राजति सा वशा दुष्प्रतिग्रहा.. (२८)
वरुण के मुख में तीन जिह्वाएं दीप्त हैं. उन के मध्य में जो विराजमान है, वही वशा है.
उस को दान के रूप में स्वीकार करना कठिन काम है. (२८)
चतुर्धा रेतो अभवद् वशायाः.
आपस्तुरीयममृतं तुरीयं यज्ञस्तुरीयं पशवस्तुरीयम्.. (२९)
वशा गौ का वीर्य अर्थात् बल चार भागों में विभाजित हुआ. जल, अमृत, यज्ञ और पशु
उस के चौथे भाग हैं. (२९)
वशा द्यौर्वशा पृथिवी वशा विष्णुः प्रजापतिः.
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वशाया दुग्धमपिबन्त्साध्या वसवश्च ये.. (३०)
वशा गौ द्यौ, पृथ्वी, विष्णु और प्रजापति हैं. जो साध्य और वायु हैं, उन्होंने वशा गौ का
दूध पिया. (३०)
वशाया दुग्धं पीत्वा साध्या वसवश्च ये.
ते वै ब्रध्नस्य विष्टपि पयो अस्या उपासते.. (३१)
जो साध्य और वसु थे, वे वशा गौ का दूध पी कर स्वर्ग के स्थान में पहुंचे और सदा वशा
गौ का दूध पीते हैं. (३१)
सोममेनामेके दुहे घृतमेक उपासते.
य एवं विदुषे वशां ददुस्ते गतास्त्रिदिवं दिवः.. (३२)
कुछ ने इस वशा गौ से सोम का दोहन किया. कुछ ने इस के घृत की उपासना की
अर्थात् घृत प्राप्त किया. जो इस प्रकार जानने वाले को वशा गौ का दान करते हैं, वे देवों के
स्वर्ग में जाते हैं. (३२)
ब्राह्मणेभ्यो वशां दत्त्वा सर्वाँल्लोकान्त्समश्रुते.
ऋतं ह्यस्यामार्पितमपि ब्रह्माथो तपः.. (३३)
मनुष्य ब्राह्मणों को वशा गौ दे कर सभी लोकों का सुख भोगता है. वशा गौ में सत्य,
ज्ञान एवं तप आश्रित है. (३३)
वशां देवा उप जीवन्ति वशां मनुष्या उत.
वशेदं सर्वमभवद् यावत् सूर्यो विपश्यति.. (३४)
देवगण एवं मनुष्य वशा गौ के सहारे जीवित रहते हैं. जहां तक सूर्य का प्रकाश है, वहां
तक यह वशा गौ ही है. (३४)
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सूक्त-१ देवता—ब्रह्मौदन

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ग्यारहवां कांड
सूक्त-१ देवता—ब्रह्मौदन
अग्ने जायस्वादिर्तिनाथितेयं ब्रह्मौदनं पचति पुत्रकामा.
सप्तऋषयो भूतकृतस्ते त्वा मन्थन्तु प्रजया सहेह.. (१)
हे अग्नि देव! तुम अरणि मंथन से उत्पन्न हुए हो. यह देव माता अदिति पुत्र की कामना
से इस ब्रह्मौदनासव नामक कर्म में ब्राह्मणों को खिलाने के हेतु भात पकाना चाहती है. मरीच
आदि सप्त ऋषि पृथ्वी आदि को बनाने वाले हैं. वे इस देवयज्ञ में मंथन के द्वारा तुम्हें यजमान
के पुत्र, पौत्र आदि के साथ उत्पन्न करें. (१)
कृणुत धूमं वृषणः सखायोऽद्रोघाविता वाचमच्छ.
अयम्अग्निः पृतनाषाट् सुवीरो येन देवा असहन्त दस्यून्.. (२)
हे कामना पूर्ण करने वाले एवं जगत् के मित्र सप्त ऋषियो! तुम अरणि मंथन के द्वारा
धुआं उत्पन्न करो. ये अग्नि देव स्तुति रूपी ऋचाएं सुन कर उत्तम चरित्र वाले यजमानों की
शत्रुओं से रक्षा करते हैं. देवों सहित ये अग्नि देवशत्रु सेनाओं को पराजित करते हैं. अग्नि की
सहायता से देवों ने राक्षसों को पराजित किया था. (२)
अग्ने ऽ जनिष्ठा महते वीर्याय ब्रह्मौदनाय पक्तवे जातवेदः.
सप्त ऽ ऋषयो भूतकृतस्ते त्वा ऽ जीजनन्नस्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ.. (३)
हे उत्पन्न होने वाले प्राणियों के ज्ञाता अग्नि देव! तुम परम सामर्थ्य के लिए अरणि मंथन
से उत्पन्न होते हो. पृथ्वी आदि की रचना करने वाले सप्त ऋषियों ने तुम्हें ब्रह्मौदन पकाने के
लिए उत्पन्न किया था. तुम इस पत्नी को पुत्र, पौत्र आदि वीरों से युक्त धन प्रदान करो. (३)
समिद्धो अग्ने समिधा सामिध्यस्व विद्वान् देवान् यज्ञियाँ एह वक्षः.
तेभ्यो हविः श्रपयं जातवेद उत्तमं नाकमधि रोहयेमम् .. (४)
हे प्रज्वलित अग्नि! तुम समिधाओं के द्वारा अधिक दीप्त बनो एवं यज्ञ के योग्य देवों
को जानते हुए उन्हें यहां लाओ. हे जातवेद अग्नि! उन देवों के निमित्त ब्रह्मौदन रूपी हवि
पकाते हुए तुम इस यजमान को उत्तम स्वर्गलोक में पहुंचाओ. (४)
त्रेधा भागो निहितो यः पुरा वो देवानां पितॄणां मर्त्यानाम्.
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अंशान्जानीध्वं वि भजामि तान् वो यो देवानां स इमां पारयाति.. (५)
तुम्हारे लिए अर्थात् अग्नि आदि देवों के लिए, पितरों के लिए और मनुष्यों के लिए
पहले जो भाग तीन से विभाजित किए गए हैं, हे देव! पितर एवं मनुष्य! उन भागों को जानो.
मैं तुम्हारे लिए उन भागों को अलगअलग करता हूं. उन में देवों का जो भाग है, वह अग्नि में
हवि के रूप में हवन किया जा रहा है. वह देव भाग इस यजमान पत्नी को इष्ट फल प्रदान
करे. (५)
अग्ने सहस्वानभिमूरभीदसि नीचो न्युब्ज द्विषतः सपत्नान्.
इयं मात्रा मीयमाना मिता च सजातांस्ते बलिहृतः कृणोतु .. (६)
हे अग्नि देव! तुम सामर्थ्य वाले होने के कारण शत्रुओं को पराजित करते हो. तुम बुरे
कर्म करने वाले हमारे शत्रुओं को नीचे की ओर मुंह कर के गिराओ. हे यजमान! कारीगर के
द्वारा बनाई गई यह शाला तुझे भेंट लाने वाले पुत्र, पौत्र आदि से संपन्न करे. (६)
साकं सजातैः पयसा सहैध्युदुब्जैनां महते वीर्याय.
ऊर्ध्वो नाकस्याधि रोह विष्टपं स्वर्गो लोक इति यं वदन्ति .. (७)
हे यजमान! तू समान जन्म वाले पुरुषों के साथ कर्मफल के सहित वृद्धि को प्राप्त हो
एवं इस पत्नी को अधिक वीर्य प्राप्त करने हेतु स्वाभिमानी बने. हे यजमान! तू देहांत के
पश्चात उस स्वर्ग में पहुंच, जिसे उत्तम कर्मों का फल कहा जाता है. (७)
इयं मही प्रति गृह्णातु चर्म पृथिवी देवी सुमनस्यमाना.
अथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम् .. (८)
देवगण की यह भूमि बिछे हुए चर्म को स्वीकार करे एवं हमारे प्रति कोमल हृदय बन
कर दया करे. पृथ्वी की कृपा के कारण हम यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त होने वाले स्वर्ग में
पहुंचें. (८)
एतौ ग्रावाणौ सयुजा युङ्ग्धि चर्मणि निर्भिन्ध्यंशून् यजमानाय साधु.
अवघ्नती नि जहि य इमां पृतन्यव ऊर्ध्वं प्रजामुद्धरन्त्युदूह.. (९)
हे ऋत्विज्! सामने रखे हुए एवं लोहे के समान दृढ़ उलूखल और मूसल को एक साथ
मिला कर बिछे हुए बैल के चमड़े पर रख लो तथा यजमान के लिए सोमलता के अंशों से बने
हुए धानों को कूटो. हे पत्नी! उलूखल और मूसल से धान को कूटती हुई तू हमारी संतान को
सेना की सहायता से मारने के इच्छुक शत्रुओं को बाधा पहुंचा. तू मूसल उठाती हुई हमारी
संतान को उन्नत स्थान प्राप्त करो. (९)
गृहाण ग्रावाणौ सकृतौ वीर हस्त आ ते देवा यज्ञिया यज्ञमगुः.
त्रयो वरा यतमां स्त्वं वृणीषे तास्ते समृद्धीरिह राधयामि.. (१०)
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हे वीर अध्वर्यु! अपने हाथ में उत्तम कर्म वाले उलूखल और मूसल नाम के दो पत्थर
ग्रहण करो. प्रसिद्ध एवं यज्ञ के योग्य देव तुम्हारे यज्ञ में आए हैं. हे यजमान! तू यज्ञ कर्म की
समृद्धि, सांसारिक सुखों की समृद्धि और परलोक की समृद्धि— इन तीन वरों की कामना
करता है. मैं इस यज्ञ के द्वारा इन तीन समृद्धियों की साधना करता हूं. (१०)
इयं ते धीतिरिदमु ते जनित्रं गृह्णातु त्वामदितिः शूरपुत्रा.
परा पुनीहि य इमां पृतन्यवो ऽ स्यै रयिं सर्ववीरं नि यच्छ.. (११)
हे सूप! चावलों से भूसी को अलग करना तेरा कार्य है और यही तेरे जन्म का कारण है.
शूर पुत्रों वाली देवमाता अदिति इस कार्य के लिए तुझे हाथ में लें. जो शत्रु इस पत्नी की हिंसा
करने के लिए सेना ले कर आए हैं, उन की हिंसा करने के लिए तू चावलों से भूसी को अलग
कर. तू इस पत्नी के लिए वीर पुत्रों एवं पौत्रों से युक्त धन अधिक मात्रा में प्रदान कर. (११)
उपश्वसे द्रुवये सीदता यूयं वि विच्यध्वं यज्ञियासस्तुषैः.
श्रिया समानानति सर्वान्त्स्यामाधस्पदं द्विषतस्पादयामि.. (१२)
हे चावलों! मैं स्थिर एवं उत्तम फल वाले कर्म के निमित्त तुम्हें अधिक बना रहा हूं.
इसीलिए तुम सूप में बैठ जाओ. यज्ञ में उपयोग के योग्य तुम भूसी से अलग हो जाओ. हम
भी तुम्हारे कारण उत्पन्न संपत्ति से अपने समान जन्म वाले पुरुषों की अपेक्षा श्रेष्ठ हो जाएं
और द्वेष करने वाले शत्रुओं को अपने पैरों में गिराएं. (१२)
परेहि नारि पुनरेहि क्षिप्रमपां त्वा गोष्ठो ऽ ध्यरुक्षद् भराय.
तासां गृह्णीताद् यतमा यज्ञिया असन् विभाज्य धीरीतरा जहीतात्.. (१३)
हे नारी! तू मुझ से विमुख हो कर जल भरने जा और जल ले कर शीघ्र लौट आ. उस
समय गायों के जल पीने का जलाशय जल भरने के हेतु तेरे शीष पर चढ़े अर्थात् उस
जलाशय से जल ले कर तू जल पात्र सिर पर रख ले. जलाशय के जलों में जो जल यज्ञ के
योग्य हैं, उन्हें ग्रहण करना. हे बुद्धिमती! तू यज्ञ के योग्य जलों को अलग कर के त्याग देना.
(१३)
एमा अगुर्योषितः शुम्भमाना उत्तिष्ठ नारि तवसं रभस्व.
सुपत्नी पत्या प्रजया प्रजावत्या त्वागन् यज्ञः प्रति कुम्भं गृभाय.. (१४)
हे पत्नी! शोभन अलंकारों से युक्त ये नारियां जल भरने के लिए आ गई हैं. तू भी उठ
कर जल भरने के लिए तैयार हो जा. तू उत्तम पति के कारण श्रेष्ठ पत्नी एवं संतान के कारण
प्रजावती है. यज्ञ तुझे जल के रूप में प्राप्त हुआ है. तू जल से भरा हुआ घड़ा ले कर आ जा.
(१४)
ऊर्जो भागो निहितो यः पुरा व ऋषिप्रशिष्टाप आ भरैताः.
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