अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextवशाया दुग्धमपिबन्त्साध्या वसवश्च ये.. (३०)
वशा गौ द्यौ, पृथ्वी, विष्णु और प्रजापति हैं. जो साध्य और वायु हैं, उन्होंने वशा गौ का
दूध पिया. (३०)
वशाया दुग्धं पीत्वा साध्या वसवश्च ये.
ते वै ब्रध्नस्य विष्टपि पयो अस्या उपासते.. (३१)
जो साध्य और वसु थे, वे वशा गौ का दूध पी कर स्वर्ग के स्थान में पहुंचे और सदा वशा
गौ का दूध पीते हैं. (३१)
सोममेनामेके दुहे घृतमेक उपासते.
य एवं विदुषे वशां ददुस्ते गतास्त्रिदिवं दिवः.. (३२)
कुछ ने इस वशा गौ से सोम का दोहन किया. कुछ ने इस के घृत की उपासना की
अर्थात् घृत प्राप्त किया. जो इस प्रकार जानने वाले को वशा गौ का दान करते हैं, वे देवों के
स्वर्ग में जाते हैं. (३२)
ब्राह्मणेभ्यो वशां दत्त्वा सर्वाँल्लोकान्त्समश्रुते.
ऋतं ह्यस्यामार्पितमपि ब्रह्माथो तपः.. (३३)
मनुष्य ब्राह्मणों को वशा गौ दे कर सभी लोकों का सुख भोगता है. वशा गौ में सत्य,
ज्ञान एवं तप आश्रित है. (३३)
वशां देवा उप जीवन्ति वशां मनुष्या उत.
वशेदं सर्वमभवद् यावत् सूर्यो विपश्यति.. (३४)
देवगण एवं मनुष्य वशा गौ के सहारे जीवित रहते हैं. जहां तक सूर्य का प्रकाश है, वहां
तक यह वशा गौ ही है. (३४)
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